~> डॉ. विकास मानव
बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान ने उड़ान भरी पर वह अपेक्षित ऊंचाई तक नहीं चढ़ पाया। इस में पहला संदेह तो जहाज के इंजन पर होता है। इस बोइंग जहाज में जीई कंपनी के ट्विन इंजन लगते हैं। यदि किसी कारणवश एक इंजन के कंप्रेसर में या सेंसर में कोई तकनीकी समस्या आई होती और उससे थ्रस्ट मिलना कम हो जाता तो जहाज दूसरे इंजन के थ्रस्ट के कारण घूमने लगता (याॅ करने लगता)। पर जहाज की जो तस्वीरें और वीडियो देखे हैं उनमें ऐसा कुछ नहीं लग रहा और जहाज क्रेश होने के पहले भी एकदम सीधा ही उड़ रहा है।

तो क्या दोनों ही इंजन एक साथ फेल हो गए। ये होना बहुत दुर्लभ है। हालांकि कभी कभी जब बड़ी चिड़िया इंजन में फस जाती है तब इंजन में आग पकड़ लेती है और दोनों इंजन भी एक साथ बंद हो जाते हैं। पर बोइंग के इस हवाई क्रेश में इंजन में कोई विस्फोट या आग नहीं दिखाई देती। इसके अलावा कोई बड़े मेकेनिकल फेलियर से भी अचानक से दोनों इंजन बंद हो सकते हैं पर उस समय विमान तेज़ी से नीचे गिरेगा। इस केस में तो विमान के क्रेश होने तक भी इंजन में फारवर्ड थ्रस्ट मौजूद लग रहा है। इसलिए ये इंजन फेल्योर का मामला नहीं लगता है।
फिर सवाल ये उठता है कि जब दोनों इंजन काम कर रहे थे तो लिफ्ट क्यों नहीं मिल रही थी। अपेक्षित लिफ्ट नहीं मिलने के कारण ही संभवतः पायलटों ने 600 फीट की ऊंचाई से एटीसी को मदद भी मांगी थी। ऐसा हो सकता है की चढ़ाई के समय विमान के विंग पर लगे फ्लेप सर्फेस का जो कान्फिगरेशन होना चाहिए वह सेट नहीं किया गया हो। ये विमान को तैयार करने वाले और उसका निरीक्षण करने वाले ग्रुप की ग़लती हो सकती है। या फिर चढ़ाई के कान्फिगरेशन को पायलट ने ठीक से जांचा नहीं, गलत सेट कर दिया और आटो वार्निंग को भी नज़रंदाज़ कर दिया। इंजन के सही काम करने के बावजूद यदि विंग पर लगे सर्फेस ठीक से काम ना करें या उन्हें सही से सेट ना किया गया हो तो अपेक्षित लिफ्ट नहीं मिलेगी।
लिफ्ट नहीं मिलने के कारण चालू होता है क्रू मेंबर्स का पेनिक। क्यूंकि जहाज ज्यादा ऊंचा नहीं उड़ा है, इसलिए चीजों को समझने और सही करने का समय कम रहता है। शायद इस पैनिक में ही क्रेश के वक्त भी जहाज का लैंडिंग गियर भी खुला हुआ था जिससे और ड्रेग पैदा हुआ होगा और लिफ्ट बाधित हुई होगी।
या ये भी मुमकिन है की लैंडिंग गियर में कोई तकनीकी त्रुटि आई हो जिसको सही करने में जुटे क्रू के बीच पैनिक शुरू हुआ हो और इस सबमें पायलट विमान के सर्फेस वाली समस्या पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाए जो मुख्य समस्या थी। अक्सर ऐसा भी होता है की लिफ्ट ना मिलने की सूरत में पायलट पहले इंजन के आटो थ्रोटल वगैरह को सही करने में लग जाते हैं जबकि समस्या कहीं और रहती है जैसे विंग कान्फिगरेशन में अथवा लैंडिंग गियर में।
कुलमिलाकर फिलहाल तो यह मामला ओवर स्ट्रेस्ड क्रू, ट्रेनिंग की कमी, विमान मेंटेनेंस और रेडीनेस में लापरवाही, स्टाफ द्वारा कुछ जरूरी चेक्स स्किप करना और अंततः पैनिक के समय समस्या कहीं और इलाज कहीं और वाला दिखाई पड़ता है। विमान थोड़ा और ऊंचाई पर होता तो कुछ समय होता जिसमें ग्राउंड कंट्रोल के मार्गदर्शन में ऐसे हादसे से बचा भी जा सकता था।
बोइंग और जीई जैसी बड़ी कंपनियां मुनाफे पर जितना ध्यान देती हैं, यदि और बेहतर वैमानिक सुरक्षा पर करें तो ऐसे हादसे टाले जा सकते हैं। हादसे का मूल कारण तो फ्लाइट डाटा रिकार्डर की इनफार्मेशन से ही पता चलेगा परंतु कार्पोरेट कांम्पटीशन के कारण शायद उसको पब्लिक के साथ साझा ना किया जाए।
(एक विमानन कम्पनी में कार्यरत मित्र पराग वर्मा से हुए संवाद पर अधारित लेख)