शशिकांत गुप्ते
सिक्के के दो पहलू होतें हैं। एक ओर अंक अंकित होता है। दूसरी ओर राष्ट्र के प्रतीक की छाप होती है।
प्रायः लोग अंक पर ही ज्यादा ध्यान देतें हैं। अंक से ज्ञात होता है कि,सिक्का कितनी क़ीमत का है।
सिक्के के दो पहलू होतें हैं,यह वाक्य मानव के जीवन पर भी लागू होता है। अंधेरा-उजाला,सुख-दुख,
रात-दिन,अच्छा-बुरा,जीवन-मरण आदि।
सिर्फ एक ही पहलू को देख कर कभी भी कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए।
उक्त बात राजनीति में भी लागू होती है। पक्ष और विपक्ष।
पक्ष और विपक्ष का महत्व लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही निहित है।
बगैर विपक्ष के लोकतंत्र मजबूत हो ही नहीं सकता है। यदि देश में सिर्फ और सिर्फ एक ही पक्ष का वर्चस्व बना रहे तो,लोकतंत्र पर ही
प्रश्न उपस्थित होता है?
किसी एक ही पक्ष में किसी एक ही व्यक्ति का वर्चस्व बढ़ने से उस पक्ष के आंतरिक लोकतंत्र पर सवाल उपस्थित होता है? साथ ही एक पक्ष में एक ही व्यक्ति का महत्व बढ़ेगा,तो वह व्यक्ति अपनी जवाबदेही का निर्वाह कैसे कर पाएगा?
पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में चेहरा महत्वपूर्ण हो गया है।
चेहरे को कुछ समाचार माध्यम बहुत महत्व देतें हैं।
यदि हरएक राजनैतिक दल में किसी एक ही चेहरा का महत्व बढ़ जाएगा तो व्यवहारिक दृष्टि से दल के अन्य सदस्यों की योग्यता सवालों के घेरें में आएगी?
उपर्युक्त सारे मुद्दों पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता ही नहीं,अनिवार्यता है।
हाल ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नोट बंदी के एक पक्ष पर ही अपना निर्णय दिया है।
नोटबन्दी का दूसरा पक्ष राष्ट्रव्यापी बहस का मुद्दा है। यह मुद्दा मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा है। नोट बंदी के बाद देश की और आमजन की आर्थिक स्थिति, आंतकवाद और काला कहलाने वाला धन का क्या हुआ यह अनुत्तरित सवाल ही बने हुएं हैं?
सिक्के के दोनों पहलुओं पर गम्भीरता से विचार विमर्श होना चाहिए।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

