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वोबड़े और अरोरा दोनों ने ही अपना ईमान खूंटी पर टांग संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन किया

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सुभाष रानाडे
दो महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख पद से दो व्यक्ति पिछले दिनों निवृत्त हुए । ये दो व्यक्ति हैं, मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोरा और प्रधान न्यायाधीश शरद बोबडे । यह तय करना मुश्किल है कि सबंधित संवैधानिक संस्थाओं , यानि क्रमशः निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट के अवमूल्यन में इन दोनों में किसकी हिस्सेदारी अधिक है । अरोरा ने  चुनाव  आयोग को ऐसे स्तर तक पहुंचा दिया जैसे वह कोई सरकारी विभाग हो । उनके कारण ही चुनाव आयोग महज एक पिलपिली रीढ़विहीन संस्था बन गई और सत्ताधारियों ने तो उसे लगभग ‘ पालतू ‘ ही बना डाला ।

संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति जब अपना ईमान खूंटी पर टांग देता है , तब यही होता है  । मालिक के प्रति वफ़ादारी निभाने के लिए अरोरा निवृत्त होते ही तत्काल पुरस्कृत भी हो गए । उन्हें गोवा का राज्यपाल बना दिया गया ।   अरोरा के सरकारपरस्त करम प्रत्यक्ष थे तो प्रधान न्यायाधीश अदृश्य । इससे भारत की संवैधानिक संस्कृति का जो नुकसान हुआ है , वह अत्यधिक गंभीर है और इसलिए इसका संज्ञान लिया जाना चाहिए । ऐसे वक्त में जब देश चुनौतियों से जूझ रहा हो  संवैधानिक पद पर आसीन इन दोनों व्यक्तियों ने अपनी भूमिका  निभाने का ऐतिहासिक अवसर खो दिया । शरद बोबडे जब प्रधान न्यायाधीश बने तब उनके पूर्ववर्ती ने न्यायपालिका की गरिमा को पतन के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था । बोबडे साहब के पास उसे थामने का मौका था , जो उन्होंने खो दिया । 2019 के नवंबर में बोबडे साहब प्रधान न्यायाधीश के पद पर विराजमान हुए । उस समय सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऐसे कई प्रकरण थे जिनमें संवैधानिक मूल्य और  मुद्दे निहित थे ।

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में अनुच्छेद 370 रद्द करने और राज्य के विभाजन का विवादित मुद्दा ( विवादित इसलिए कि विधानसभा में तत्संबंध में प्रस्ताव लाना पड़ता है , इस मामले में ऐसा हुआ नहीं ) , संशोधित नागरिकता कानून का विवाद और उससे जुड़े तनाव , देश पर आया कोरोना का संकट और उसमें स्थलांतरितों की दयनीय अवस्था , किसान आंदोलन आदि । कोई भी नहीं कह सकता की इनमें से किसी भी एक मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना संवैधानिक कर्त्तव्य निभाया है । बोबडे साहब के प्रधान न्यायाधीश पद के कार्यकाल में उनकी तरफ से इन मुद्दों की अवहेलना ही हुई । मिसाल के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत वर्ष 24 मार्च को अचानक घोषित देशव्यापी लॉकडाउन से स्थलांतरित मजदूरों का हुआ बुरा हाल और उनकी दयनीय अवस्था का संज्ञान न्यायालय ले , इन मजदूरों को भत्ता दिया जाए जैसी मांग पर ” उन्हें खाना मिल रहा हो तो पैसे क्यों चाहिए ” जैसे आशय के संवेदनाविहीन ,रूखे उद्गार सर्वोच्च न्यायपीठ से व्यक्त किए गए । 

  इसी तरह प्रधान न्यायाधीश ने चुनावी बॉण्ड के मुद्दे को भी आवश्यक गंभीरता से नहीं लिया  s।  ऐन चुनाव के समय चुनावी बॉण्ड लाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया । स्वाभाविक रूप से इस निर्णय को चुनौती दी गई । इस पर शीघ्र सुनवाई की अपेक्षा थी , लेकिन सुप्रीम कोर्ट में वह नहीं हुई । इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है , क्योकि यह प्रधान न्यायधीश का अधिकार है । लेकिन इस पर फैसला देते समय न्यायालय ने जो स्पष्टीकरण दिया वह किसी नैतिक झटके से कम नहीं था । इस संबंध में कहा गया , ” यह बॉण्ड इतने समय से जारी किए जा रहे हैं इसका अर्थ है कि उसमें आवश्यक पारदर्शिता है ।” यह तर्क प्रधान न्यायाधीश पद पर आसीन व्यक्ति के लिए आवश्यक बुद्धिमत्ता को शोभा देने वाला नहीं था ।

लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार है

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