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आदि’दर्शन के विज्ञान की दृष्टि में ब्राह्मण्ड

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पुष्पा गुप्ता

आकाश के जिस भाग में हमारा सौर मण्डल है, उसका नाम अण्ड है। अम् गतौ अमति + डच् अण्ड गति प्रेरक, गत्याश्रय, गतिमार्ग, गतिपथ, गतिकोश आकाश के इस भाग में पहले जीवन नहीं था। अर्थात् यह अण्ड पूर्णतः मृत था। निर्जीव अण्ड होने से यह मृत + अण्ड= मृताण्ड / मर्ताण्ड कहलाया। इस मर्ता से सर्वप्रथम सूर्य की उत्पत्ति हुई।
इससे सूर्य को मार्तण्ड कहा गया कथन है :
मृतेऽण्ड एष एतस्मिन् यदभूत् ततो मार्तण्ड इति व्यपदेशः ॥”
(भागवत ५/२०/४४)

सूर्य के पहले न दिशा थी, न स्वर्ग, न नरक, न भूलोक, न द्युलोक, न नीचे के लोक, न ऊपर के लोक, न आकाश, न कोई भाग (मेरु आदि पर्वत)।
वाक्य है :
सूर्येण हि विभज्यन्ते दिशः खं द्यौर् मही भिदा।
स्वर्गापवर्गो नरका रसौकांसि च सर्वशः॥”
(भागवत ५/२०/४५)

 सूर्येण हि विभज्यन्ते= सूर्य के द्वारा ही विभाजित किये गये है। दिशः = दिशाएँ। खम् = आकश, द्यौः = स्वर्ग लोक, मही= पृथ्वी लोक, स्वर्ग= ऊपर के लोक, अपवर्ग = मोक्ष दायक स्थान, नरका:= नरक के स्थान, रसौकांसि= रसातल आदि नीचे के लोक, च सर्वशः = तथा सभी भिदा = अन्य विभाग (जैसे रात दिन, पक्ष, मास, अतु, अयन, संवत्सर, युग, कल्प आदि)। 

सूर्य ही देवता तिर्यक मनुष्य, सरीसृप और लता वृक्षादि समस्त जीव समूहों के आत्मा हैं। ये सूर्य भगवान् ही हमारी दृष्टि के स्वामी हैं।

वचन है :
देवतिरयङ् मनुष्याणां सरीसृपसवीरुधाम्। सर्वजीवनिकायानां सूर्य आत्मा दृगीश्वरः।।”
(भागवत ५/२०/४६ )

ऐसे परमेश सूर्य भला किस के लिये प्रणम्य नहीं हैं ? हम सब इन्हें नित्य भावपूर्वक प्रणाम करते हैं। आत्मने सूर्याय नमः।

भगवान् सूर्य उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुवत् नाम वाली क्रमशः मन्द, तीव्र, सम गतियों से चलते हुए राश्यानुसार दिन रात को छोटा, बड़ा, समान करते रहते हैं। इस प्रकार ३६५.२६ दिन का एक संवत्सर (बारहमासा) होता है। इसका अर्थ है-पृथ्वी इतने दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है। प्रत्येक राशि / मास में सूर्य के रहने ठहरने का औसत समय यह है,पृथ्वी की कक्षा का नाम मानसोत्तर पर्वत है। इसका विस्तार नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन है।

“एवं नव कोट्य एक पंचाशत् लक्षाणि योजनानां मानसोत्तर गिरि परिवर्तनस्योपदिशन्ति ॥”(भागवत ५/२१/७ )
एवम् = इस प्रकार । नव कोट्य= नौ करोड़। एक पञ्चाशत् लक्षाणि= इक्यावन लाख। योजनानाम् = योजनों का ।मानसोत्तर गिरि= मानसोत्तर पर्वत (पृथ्वी का परिक्रमा पथ) परिवर्तनस्य= संक्रमण पथ का। उपदिशन्ति (मुनिजन) उपदेश करते हैं।

१योजन=४कोश = १० किलोमीटर। अतः पृथ्वी का परिपथ = ९५,१०,००,००० किलोमीटर। पृथ्वी को गति = २,६०,५५० किलोमीटर दैनिक वा २६ हजार ५५ योजन दैनिक। पृथ्वी से सूर्य की दूरी आधुनिक पद्धति से १४,९६,००,००० किलोमीटर है।
इससे परिपथ का माप ९५,८६,००,००० किलोमीटर आता है। यह हमारी हजारों वर्ष पूर्व की आर्य पद्धति के निकट है। इससे सिद्ध होता है भागवत पुराण में ज्योतिष संबंधी सभी तथ्य पूर्णतः सत्य हैं। समझ में आने की बात है। मैं इसी पद्धति का प्रवक्ता एवं अधिवक्ता हूं। अषिभ्यां नमः। पृथ्वी की धुरी/अक्ष का नाम है- मेरु। मेरु की नाना रूपों में, नाना अवसरों पर, बार- बार चर्चा होती रहती है।
अपनी धुरी पर घुमते हुए, अपनी कक्षा पर आरूढ पृथ्वी पर जब सूर्योदय दिखाई पड़ता है तो वह दिशा पूर्व कही जाती है। जब सूर्य उपर आकाश के मध्य में होता है। तो इस दिशा का नाम है- दक्षिण अस्त होते हुए सूर्य की दिशा पश्चिम एवं रात्रि मध्य के सूर्य की दिशा उत्तर है। ये पृथ्वी की अक्षीय गतिपथ वा मेरु को चार दिशाएं या घोटियों हैं। मेरु के पूर्व की दिशा में इन्द्र की देवधानी, दक्षिण की दिशा में यम की संयमनी, पश्चिम की में दिशा वरुण की निम्लोचनी तथा उत्तर की दिशा में सोम की विभावरी पुरियाँ है। मेरु पर्वत चतुर्दिक व्याप्त है।

व्यास वाक्य है :
“तस्मिन्द्रीं पुरीं पूर्वस्मान्मेरोर् देवधानीं नाम, दक्षिणतो याम्यां संयमनी नाम,पश्चाद वारुणीं निम्लोचनीं नाम, उत्तरतः सौम्यां विभावरीं नाम, ताहृदयमध्यास्तमय निशीथानीति भूतानां प्रवृत्तिनिवृत्ति -निमित्तानि समय विशेषेण मेरोश्वदुर्दिशम्।।”
( भागवत ५/२१/७)

तस्मिन् =उस मेरु पर्वत पर। ऐन्दीम्= इन्द्र की। पुरीम्= पुरी। पूर्वस्मात्= पूर्वदिशा में। मेरोः = मेरु पर्वत की । देवधानीम् = देवधानी (देवों का निवास)। नाम =नामक। दक्षिणतः= दक्षिण दिशा की ओर। याम्याम् = यमराज की। संयमनीम् = संयमनी (सब का नियमन / नियंत्रण करने वाली)। नाम = नामक । पश्चात् = पश्चिम दिशा में। वारुणीम् = वरुण की ।निम्लोचनीम् = निम्लोचनी (नीचे की ओर वाली)।
नाम = नामक । उत्तरतः = उत्तर की ओर। सौम्या =सोम की। विभावरीम् =विभावरी (प्रकाशवती)। नाम= नामक। तासु = इन सबों में। उदय-मध्याह्न-अस्तमय= प्रातः, दोपहर, सायं निशीथानि= अर्धरात्रि। इति = इस प्रकार ।भूतानाम्= जीवों का। प्रवृत्ति =कार्य तत्परता । निवृत्ति= कार्य विमुखता। निमित्तानि = के कारण ।समय विशेषेण= विशेष समय (निर्धारित काल) के द्वारा। मेरो:=मेरु पर्वत का । चतुः दिशम् = चारों दिशाएँ।

स्पष्ट है – मेरु पर्वत चारों दिशाओं में अमूर्त रूप से व्याप्त है। सूर्योदय काल इन्द्र की देवधानी पुरी है। मध्याह काल यमराज की संयमनी पुरी है। सायंकाल वरुण को निम्लोचनी पुरी है। निशीथ समय सोम देवता की विभावरी पुरी है ये सब नाम सूर्य के प्रभाव एवं गुणधर्म के अनुसार हैं। प्रातः कालीन सूर्य इन्द्र है।
मध्यकालीन सूर्य यम है। सायंकालीन सूर्य वरुण है। निशीष कालीन सूर्य सोम है। इन्द्र के आगमन से प्राणी कर्म में प्रवृत होते हैं, यम के प्रभाव से अनुशासन में रह कर अपने-अपने कर्म करते हैं,वरुण के प्रभाव से निवृत्त होकर विश्राम करते हैं तथा सोम के प्रभाव से आनन्द पूर्वक शयन करते हैं। जब दिन-रात बराबर होकर उष्णता धीरे धीरे बढ़ने लगती है, तो उसे बसना सम्पात कहते हैं।
इसी तरह, जन पुनः दिन-रात बराबर होकर शीत बढ़ने लगती है, तो इसे शरद संपात कहते हैं। वसन्त सम्पात (नवरा) देवताओं का प्रातः काल इन्द्र की अमरावती/ देवधानी पुरी है तथा शरद सम्पात (नवरात्र) देवताओं का सा काल, वरुण की निम्लोचनी पुरी है जैसे प्रातः सायं इन दो कालों में समतीतोष्णता होती है वैसे ही बसन्त एवं शरद संपातों में समशीतोष्णता का भाव होता है। मीष्म सम्पात, जब दिन बहुत बड़ा होता है तो वह यम को संयमनों पुरी एवं देवों का दोपहर है। इसमें प्रचण्ड गर्मी होती है। इसके विपरीत जब रात बहुत बड़ी होती है, तो वह सोम की विभावरी पुरी एवं देवों की अर्धरात्रि होती है। इसमें प्रचण्ड शीत का समावेश होता है। यह शीत सम्पात सोम की विभावरी पुरी है।

भूमि की विषुवत रेखा भी मेरु पर्वत है। यहाँ के निवासियों के लिये सूर्य सदैव तपता है। यह उनके लिये संयमनी पुरी है। भूमि के दोनों ध्रुव क्रमशः अदल बदल कर शीत सम्पात होते हैं। यहाँ के लिये ये स्थान विभावरी पुरी वा अर्ध रात्रि हैं। भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के बीच की सूर्य स्थिति वसन्त सम्पात वा देवधानी पुरी है। भूमध्य एवं मकर के बीच सूर्य की स्थिति शरद सम्पात वा निम्लोचनी पुरी है।
सूर्य पूर्व से दक्षिण जाता है, दक्षिण से पश्चिम, पश्चिम से उत्तर जाकर पुनः पूर्व में उदय होता है।
कथन है :
“तत्रत्यानां दिवस मध्यगत एवं सदा आदित्यस्तपति सव्येनाचलं दक्षिणेन करोति॥”
( भागवत ५/२१/८)
तत्रत्यानाम् = मेरु पर्वत विषुवत् रेखा पर रहने वाली जीवात्माओं के लिये। दिवस-मध्यंगत= दोपहर का ।आदित्यः सदा एवं= सूर्य सदैव हो। तपति =तपता रहता है। सव्येन= वाम दिशा को / से। अचलम् =सुमेरु पर्वत।दक्षिणेन= दक्षिण दिशा को / से। करोति चलता है।

पृथ्वी पश्मिम से पूर्व की ओर जाती है, सूर्य पूर्व से दक्षिण होते हुए पश्चिम आता है। यहाँ यहाँ उपर सव्येन और दक्षिणेन का तात्पर्य है। इसमें कोई सन्देह नहीं।

सारांश यह है कि तापाधिक्य =संयमनी पुरी यमस्थान = दक्षिण दिशा= दोपहर का समय। शीताधिक्य= विभावरीपुरी सोम स्थान = उत्तर दिशा = मध्यरात्रि काल। समशीतताप= देवधानी पुरी पूर्व दिशा = प्रातः काल । समोष्णशीत= निम्लोचनी पुरी = वरुण स्थान = पश्चिम दिशा = सायं काल। उत्तर एवं ध्रुव के वासियों को कभी संयमनी (दोपहर) एवं विभावरी (अर्धरात्रि) के. दर्शन नहीं होते। वहाँ छ.छ: महीने की प्रातर्युक्त एवं वा सायं युक्त रात्रि / दिवस होता है। सूर्य देव देवधानी पुरी से चल कर संयमनी पुरी, संयमनी पुरी से निम्लोचनी पुरी जाते हैं। यहां से वे विभावरी पुरी पहुँच कर फिर देवानी पुरी पहुंचते हैं।

एक पुरी से दूसरी पुरी जाने में १५ घटी का समय लगता है। मेरु की एक परिक्रमा ६० घटी / एक अहोरात्र / २४ घंटे में पूरी होती है। एक पुरी से दूसरी पुरी तक जाने में जो रास्ता तय करना पड़ता है, उसकी दूरी २, ३७, ७५,००० योजन है। यह गहन तथ्य है।
वाक्य है :
“यदा चैन्द्रयाः पुर्याः प्रचलते पञ्चदशघटिकाभिः याम्यां सपाद कोटिद्वयं योजनानां सार्थद्वादशलक्षाणि साधिकानि चोपयाति ॥”
(भागवत ५/२१/१०)

यदा=जब।
ऐन्द्रयाः पुर्याः= इन्द्र की पुरी से।
च =और आगे।
प्रचलते =(सूर्य भगवान्) बढ़ते है।
पञ्चदश घटिकाभिः = १५ घटी में।
याम्याम् = यम पुरी तक।
स-पाद कोटि-द्वयम् = सवा दो करोड़।

सार्धं द्वादश लक्षाणि स अधिकानि =१२ लाख ७५ हजार। च= और उप याति = (सूर्य देव) लाँघते है।
स पाद कोटि द्वयम् = पचीस लाख (एक करोड़ का चौथाई) एवं दो करोड़ = २,२५,००,००० दो करोड़ पचीस लाख।

सार्थ =स अर्ध एक लाख का आधा ५०,००० पचास हजार।
साधि कानि = सपाद अधिकानि = २५,००० पचास हजार और।
द्वादश लक्षाणि= १२,००,००० बारह लाख
२,२५,००,०००
१२,००,०००
५०,०००

२५,०००

योग = २,३७,७५,००० दो करोड़ सैंतीस लाख पचहत्तर हजार योजन।

  एक पुरी से दूसरी पुरी तक की इस दूरी को ४ से गुणा करने पर ९,५१,००,००० नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन मेरु का विस्तार आता है। सभी मह, नक्षत्र एवं चन्द्रमा इन चारों पुरियों से हो कर यात्रा करते रहते हैं।

इनके यात्रापथ का वर्णन करने की सामर्थ्य सिवाय ऋषियों के और किसमें है? तस्मै नमः ।

एक क्षण (पल) में भगवान् सूर्य अपने परिक्रमा पथ पर २००२ योजन चलते हैं।
कहते हैं :
लक्षोत्तरं सार्धनवकोटियोजन परिमण्डलं भूवलयस्य क्षणेन सगव्यत्युत्तरं द्वि सहस्त्र योजनानि स भुङ्क्ते ॥”
( भागवत ५/२१/१९)

लक्ष-उत्तरम् =एक लाख अधिक। सार्थ =स-अर्थ = तस्य (एक लाख का) अर्थ = पचास हजार ।नवकोटि योजन= नौ करोड़ योजन की ।भू-वलयस्य= भू-मण्डल की। परिमण्डलम् = परिधि को । क्षणेन = एक पल में।

स-गव्यूति उत्तरम् =दो कोस अधिक। द्विसहस्र योजनानि =दो हजार योजन। सः= वे सूर्य देव। भुंक्ते = भोगते वा तै करते हैं।
भूमण्डल की परिधि = ९,००,००,००० + १,००,००० + ५०,००,००० = ९,५१,००,००० योजन।

सूर्य की गति = २००० योजन + २ कोस (आषा योजन) प्रति क्षण।
इतनी तीव्र गति से एक अहोरात्र में नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन की दूरी तय करने वाले परमात्मा सूर्य को मेरा सादर नमस्कार।

अब तक के वर्णन से एक बात स्पष्ट है सूर्य मण्डल का विस्तार नौ करोड़ इक्यावन लाख योजन है तथा पृथ्वी का परिक्रमा पथ भी इतना ही है। इतनी दूरी को पृथ्वी एक संवत्सर में पूरा करती है तथा इसी दूरी को सूर्य देव एक अहोरात्र में पूरा करते हैं।【 सूर्य की गति २०००५ योजन प्रति पल है तो पृथ्वी की गति २६०५५ योजन दैनिक है।】

प्रत्येक पिण्ड (मह) के दो मेरु हैं …
१ अक्षीय मेरु,
२ परिक्रमण मेरु।

हर मह अपने अक्ष के चतुर्दिक् घूमता हुआ परिभ्रमण पथ पर चलते हुए झुककर चलता है। यह झुकाव आधुनिक विज्ञानी २३ अंश मानते हैं। जैसे पृथ्वी के दो मेरु हैं, वैसे ही सूर्य के दो मेरु हैं। सूर्य अपनी अक्ष पर घूमता हुआ एक अहोरात्र में एक चक्र पूरा करता अर्थात् ९,५१,००,००० योजन चलता है। सूर्य अपने परिभ्रमण पथ पर चलता हुआ ध्रुव की परिक्रमा करता हुआ, एक चक्र पूरा करने में एक कल्प लेता है। सूर्य के ये – दो मेरु हैं। इसी प्रकार ध्रुव के भी दो मेरु हैं। सभी पिण्ड युगल मेरु से युक्त हैं। इन पिण्डों को मेरा नमस्कार।

प्रत्येक जीव में दो मेक है…
१-रीड की हड्डी जो शरीर के ढाँचे को सम्हाले हुए है। इसे मेरुदण्ड भी कहते हैं।
२-जीव का जीवन चक्र जन्म से मृत्युपर्यन्त की यात्रा भी मेरु है।

हर जीव, हर वस्तु हर मह, हर सूर्य, हर नीहारिका को दो मेरुओं से जोड़ा गया है। यह ऋत है। ऋतये नमः।

सूर्य क्यों चलता है ? पृथ्वी क्यों नोचती है ? यह क्यों घूमते हैं ? चलना सूर्य की नियति है। नाचना पृथ्वी का स्वभाव है। घूमना ग्रहों का प्रारब्ध है। जिस प्रारब्ध का कथन महों के माध्यम से किया जाता है, उसी प्रारब्ध ने ग्रहों को भी बांध रखा है। सबमें क्रियाशीलता है। सूर्य गति कर रहा है, पृथ्वी थिरक रही है, यह भ्रमण कर रहे हैं। ये सभी भगवान् हैं। यदि भगवान् क्रिया न करें तो जीव कैसे क्रिया में प्रवृत्त होगा ? प्रवृत्ति जीवन है। निवृत्ति मरण है। जीव क्रियाशील होने से भगवान् है। प्रकृति भगवान् है। स्वकर्म धर्म हैं। स्वभावनुसार कर्म करना स्वधर्म है। स्वभाव पूर्वप्राप्त है, जन्म से है, पूर्वजन्म से है, प्रारब्ध से है। स्वभाव को बदला नहीं जा सकता। प्रकृति बलिष्ठ है। स्वभावनियत कर्म करने में हमारा कल्याण है। स्वाभाविक कर्म में सफलता मिलती है। अतः स्वाभाविक कर्म में प्रवृत्त रहना चाहिये।
वाक्य है :
यतः प्रवृत्तिः भूतानां येन सर्वमिदं जगत्।
स्व कर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति
मानव॥”
(गीता १८/४६)

यतः= जिससे ।प्रवृत्ति: =उद्भव।भूतानाम्= समस्त जीवों का। येन= जिसके द्वारा ।सर्वम् इदम् = यह सब। ततम् = फैला हुआ है। स्व कर्मणा= अपने स्वाभाविक कर्म से। तम् = उसकी ।अभि अर्ध्य= पूजा करके। सिद्धिम् सिद्धि को। विन्दति= प्राप्त करता है। मानवः = मनुष्य जो सभी प्राणियों का उद्गम है और सर्वव्यापी है, उस भगवान् की उपासना अपने स्वभावनियत कर्म से करके मनुष्य सिद्धि / सफलता पाता है।

पृथ्वी से हमारा उद्गम है, हम से हमारा उद्गम है। सूर्य से पृथ्वी का भाव है, पृथ्वी से पृथ्वी का भाव है। सूर्य का उदम आकाश है तथा सूर्य स्वयंभूत है। इसलिये सूर्य अपने अक्ष पर घूमता हुआ अपनी उपासना करता है, अपनी कक्षा में भ्रमण करता हुआ ध्रुव आकाश की उपासना करता है। भूमि अपने अक्ष पर थिरकती हुई स्वयं की उपासना करती है तथा सूर्य के परितः नाचती हुई सूर्य की अर्चना भी करती है। हम समाधि (सुषुप्तावस्था) में स्वयं की उपासना करते हैं तथा नित्य के क्रिया कलापों द्वारा पञ्चभूतों की उपासना करते हैं। ऐसा करते हुए सूर्य सिद्ध है, पृथ्वी सिद्ध है, हम सिद्ध है। हमारा भगावन् आत्मा (सूर्य) है। सूर्य (ज्योति) का भगवान् आकाश (शून्य) है। समस्त भगवानों को मेरा नमस्कार।

परमावस्था में पहुँच कर योगी को भान होता है कि वह अपना भगवान् स्वयं है। सबके जीवन का लक्ष्य है- स्वयं को भगवत्ता को जानना, पहिचानना, मानना । वास्तव में सूर्य अपनी उपासना कर रहा है, पृथ्वी अपनी अर्चना कर रही है, जीव अपना ध्यान कर रहा है। सभी आत्मकेन्द्रित हैं। यह आत्मकेन्द्र किसी दूसरे केन्द्र से बंधा है। दूसरा भी किसी तीसरे से बंधा है। तीसरा किसी चौथे से तथा इसी प्रकार इसका कोई अन्त नहीं है। अन्त करने के लिये हम किसी एक को ऐसा मानते है जो किसी से न बंधा हो। यही हमारी कल्पना का भगवान् है। अस्मै नमः।

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