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*डा. अंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण – धार्मिकता का पुनर्जन्म*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत का सामाजिक और धार्मिक इतिहास विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर यहाँ उपनिषद, वेदांत और बुद्ध जैसे विचारक हैं, जिन्होंने आत्मा की मुक्ति, अहिंसा और समता की शिक्षा दी; वहीं दूसरी ओर जाति, छुआछूत और अंधविश्वास की परंपराएँ भी रहीं, जिन्होंने समाज को भीतर तक जकड़ रखा। यही विरोधाभास डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन और संघर्ष की पृष्ठभूमि बने। अंबेडकर ने हिन्दू धर्म की उन संरचनाओं को कठोर आलोचना का विषय बनाया, जो शोषण और भेदभाव को स्थायी बनाने का कार्य कर रही थीं।
यह लेख आचार्य प्रशांत के साक्षात्कार पर आधारित है, जिसमें उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों और हिन्दू धर्म, विशेषकर वेदांत, के संदर्भ में गहन विमर्श किया। आचार्य प्रशांत अपने विचारों में इस ऐतिहासिक तनाव को गहराई से समझाते हैं। वे कहते हैं कि अंबेडकर ने केवल सामाजिक विद्रोह ही नहीं किया, बल्कि धार्मिक विमर्श की नई दिशा भी सुझाई। वेदांत और बौद्ध दर्शन, दोनों ही जातिवाद और अंधविश्वास से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। परंतु, समस्या यह है कि हमने हीरे (सत्य और मुक्ति का दर्शन) को छोड़कर कचरे (अंधविश्वास और जातिवाद) को थाम लिया। इस लेख में इन्हीं प्रश्नों का विश्लेषण है| क्या हिन्दू धर्म की आत्मा जातिवाद में है, या वेदांत और उपनिषदों में छिपे समता और मुक्ति के संदेश में? और अंबेडकर की यात्रा हमें आज क्या सिखाती है?
भारतीय समाज की आत्मा हमेशा से धर्म और दर्शन के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन यही धर्म, जो मनुष्य की मुक्ति और उत्थान का साधन होना चाहिए था, कई बार शोषण और अन्याय का औज़ार बन गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसी अन्यायपूर्ण ढांचे को चुनौती दी और अंततः बौद्ध धर्म को अपनाकर अपने अनुयायियों को एक नई दिशा दी। आचार्य प्रशांत, अपने विचारों में, अंबेडकर के इसी विद्रोही तेवर को धर्म और वेदांत की कसौटी पर परखते हैं और यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि समस्या धर्म की जड़ों में नहीं बल्कि उसके विकृत रूप में है।

अंबेडकर का आक्रोश – ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
बीसवीं सदी का भारत एक ऐसे समाज का चित्रण करता है जहाँ जाति-व्यवस्था गहरी जड़ें जमाए बैठी थी। अस्पृश्यता, सामाजिक बहिष्कार और शिक्षा से वंचित रखने जैसी प्रथाएँ आम थीं। उनका आक्रोश केवल व्यक्तिगत पीड़ा का परिणाम नहीं था, बल्कि एक समाज सुधारक और विधिवेत्ता की दृष्टि से था। उन्होंने धर्म को पूरी तरह नकारा नहीं, बल्कि हिन्दू धर्म के भीतर सुधार की कोशिश की। लेकिन जब यह सुधार असंभव दिखा, तो उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाकर अपने अनुयायियों को यह संदेश दिया कि “धर्म ज़रूरी है, पर शोषणकारी धर्म को अस्वीकार करना भी उतना ही ज़रूरी है।”
आचार्य प्रशांत इस बात पर जोर देते हैं कि अंबेडकर की कठोर आलोचनाओं को उनके समय की स्तविकताओं के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। 20वीं सदी के शुरुआती दशकों का भारत, छुआछूत और जातिगत भेदभाव से गहराई तक ग्रसित था। दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता था, कुएँ और तालाब उनके लिए बंद थे, और शिक्षा के अवसर लगभग नगण्य थे।
ऐसे समय में अंबेडकर का आक्रोश स्वाभाविक था। वे बार-बार कहते रहे कि यदि हिन्दू धर्म सुधार नहीं करेगा, तो यह शोषितों को केवल गुलामी और पीड़ा देगा। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि अंबेडकर ने अंतिम समय तक हिन्दू धर्म में सुधार की आशा रखी। लेकिन जब उन्हें लगा कि सुधार असंभव है, तो उन्होंने बौद्ध धर्म की शरण ली।
उनका यह कदम किसी धर्मत्यागी नास्तिक का नहीं, बल्कि धार्मिकता की मूल आवश्यकता को मानने वाले व्यक्ति का था। अंबेडकर का कहना था कि धर्म मनुष्य की मूलभूत ज़रूरत है। इसलिए वे नास्तिक नहीं बने, बल्कि ऐसे धर्म को चुना जो उन्हें समानता और मुक्ति का रास्ता दिखाता था।

धर्म बनाम समाज: ऋषियों और विद्रोहियों की परंपरा:
आचार्य प्रशांत एक गहरी बात उठाते हैं। धर्म और समाज को अलग-अलग समझना ज़रूरी है। समाज औसत दर्जे के स्वार्थी लोगों की भीड़ है, जो अपने हित के लिए नियम और परंपराएँ बनाती रहती है। इसके विपरीत, ऋषि और मुनि समाज के विद्रोही रहे हैं। वे समाज से हटकर सत्य और मुक्ति की खोज में गए और जो जाना, उसे समाज तक पहुँचाना चाहा। वेदांत और उपनिषद इन्हीं ऋषियों के विद्रोह का परिणाम हैं। वे जातिवाद और अंधविश्वास का खंडन करते हैं। उदाहरण के लिए, आचार्य प्रशांत कहते हैं कि एक पूरा उपनिषद जातिवाद का विरोध करने के लिए समर्पित है। लेकिन समस्या यह है कि समाज ने ऋषियों की बात सुनी ही नहीं। आज की स्थिति और भी विडंबनापूर्ण है। हम ऋषियों के नाम पर उन्हीं ग्रंथों को दोष देने लगते हैं, जिन्हें कभी पढ़ा तक नहीं। गीता, उपनिषद, अवधूत गीता या रेबु गीता को कितने लोगों ने पढ़ा है? आचार्य प्रशांत कहते हैं कि लोग अपनी-अपनी किताबें और मनोरंजन के साधन चुनते रहे, और फिर असफलता का दोष ऋषियों और उनके ग्रंथों पर डालते हैं।

समाज और ऋषि – दो ध्रुव:
आचार्य प्रशांत समाज और ऋषियों के बीच का अंतर साफ़ करते हैं:
· समाज – औसत दर्जे के लोगों का समूह, जो परंपरा और स्वार्थ से संचालित होता है।
· ऋषि – वे विद्रोही आत्माएँ, जो समाज की जकड़न से मुक्त होकर नए मार्ग दिखाते हैं।
· ऋषियों का साहित्य श्रुति कहलाया क्योंकि वह मानवीय स्वार्थ से परे था।
लेकिन समाज ने ऋषियों के संदेश को आत्मसात नहीं किया, बल्कि अपनी सुविधानुसार “स्मृति” और “पुराण” बनाकर धर्म को कठोर और शोषणकारी बना दिया।

कचरे में छिपा हीरा:
कबीर ने कहा था—“मोरा हीरा हेराए गयो कचरे में।” आचार्य प्रशांत इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हमने धर्म के नाम पर इतना कचरा जमा कर लिया है कि हीरे (सत्य और मुक्ति का दर्शन) दब गया है। अंबेडकर ने हमें यही सिखाया था कि धर्म का गंदा हिस्सा त्याग दो, लेकिन सच्चाई को मत छोड़ो।
धर्म का असली उद्देश्य है—मुक्ति। अहंकार से मुक्ति, स्वार्थ से मुक्ति। यही वेदांत का सार है। लेकिन हमने धर्म को मनोरंजन, परंपराओं और रीति-रिवाजों का अड्डा बना दिया। परिणाम यह है कि जो लोग स्वाभिमान और आज़ादी चाहते हैं, वे हिन्दू धर्म छोड़ देते हैं। अंबेडकर ने यही किया। और आगे भी अनेक लोग यही करेंगे, यदि धर्म अपने केंद्र—वेदांत—की ओर वापस नहीं लौटता।

जातिवाद: रोग और उपचार:
जाति भारतीय समाज की सबसे बड़ी बीमारी है। आचार्य प्रशांत कहते हैं कि इसे ठीक करने का सबसे प्रभावी इलाज वेदांत ही है। वेदांत कहता है—“तुम शरीर नहीं हो।” यदि तुम शरीर नहीं हो, तो वर्ण या जाति का निर्धारण कैसे हो सकता है? आत्मा तो न तो ब्राह्मण है, न शूद्र। जातिवाद का वैज्ञानिक आधार भी नहीं है। आचार्य प्रशांत तर्क देते हैं कि यदि वास्तव में मनुष्यों के बीच जन्म से कोई मौलिक भिन्नता होती, तो एक का खून दूसरे को नहीं दिया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए जाति केवल सामाजिक शोषण का उपकरण है। अंबेडकर ने इसे त्यागने का आह्वान किया। वे कहते थे, यदि तुम जातिवाद पकड़े रहोगे, तो शोषण से कभी मुक्त नहीं हो पाओगे।

वेदांत और जाति का विरोध:
एक प्रमुख बिंदु जो आचार्य बार-बार रखते हैं, वह है—वेदांत जातिवाद को स्वीकार ही नहीं करता।
· उपनिषद और वेदान्त का सार यही है कि “तुम शरीर नहीं हो, तुम चेतना हो।”
· यदि मनुष्य शरीर नहीं है, तो जाति, गोत्र, वर्ण जैसी पहचानें अर्थहीन हो जाती हैं।
· अंबेडकर का जातिविरोध वस्तुतः वेदांत के दर्शन से मेल खाता है।
· यानी, जातिवाद और हिन्दू दर्शन एक-दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन समाज ने इन्हें गड्डमड्ड कर दिया।

अंबेडकर का बौद्ध धर्म ग्रहण – धार्मिकता का पुनर्जन्म:
डॉ. अंबेडकर नास्तिक नहीं बने, उन्होंने धर्म को छोड़ा नहीं। उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर यह दिखाया कि मनुष्य को धर्म की ज़रूरत है।
· उनका चयन इसलिए था कि बौद्ध धर्म जातिवाद और अंधविश्वास से मुक्त था।
· उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “धर्म त्याज्य नहीं, पर धर्म के नाम पर गढ़े गए शोषणकारी ढांचे त्याज्य हैं।”

अंबेडकर का योगदान: केवल दलितों के लिए नहीं:
आचार्य प्रशांत इस धारणा को भी चुनौती देते हैं कि अंबेडकर केवल दलितों के नेता थे। उनका कहना है कि शोषण जब होता है, तो वह सबको अपनी चपेट में लेता है—दलित, स्त्रियाँ, बच्चे, पर्यावरण, सब। इसलिए अंबेडकर का विद्रोह केवल दलितों की मुक्ति नहीं था, बल्कि पूरे समाज की मुक्ति का प्रयास था। जैसे शोषण सबको मारता है, वैसे ही विद्रोह सबको बचाता है। अंबेडकर ने हिन्दुस्तान की आत्मा को बचाने का काम किया। उनका संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1956 में था।
आज की स्थिति – अंबेडकर का संदेश और हमारी भूल:
· पहले दलितों को वेदांत पढ़ने से रोका गया।
· आज जब वे पढ़ सकते हैं, तो कह रहे हैं कि “हमें इससे कोई लेना-देना नहीं।”
· नतीजतन, दोहरी हानि हो रही है—पहले समाज ने वंचित रखा, और अब वे स्वयं अपने को वंचित रख रहे हैं।
· यह स्थिति खतरनाक है, क्योंकि असली दर्शन और आत्मदर्शन का हीरा सबके हाथ से छूट रहा है।

धर्म की पुनर्परिभाषा:
आचार्य प्रशांत का निष्कर्ष यही है कि—
· धर्म वही है जो अहंकार की मुक्ति कराए।
· धर्म का काम मनोरंजन, मिथक गढ़ना, जाति को बनाए रखना या अंधविश्वास फैलाना नहीं है।
· अगर सनातन धर्म को बचाना है, तो वेदांत को उसके केंद्र में पुनः स्थापित करना होगा।
· अन्यथा, लोग अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस धर्म को छोड़ देंगे, जैसा अंबेडकर ने किया।
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हिन्दू धर्म का भविष्य: वेदांत की ओर वापसी:
आज हिन्दू समाज असंख्य परंपराओं, रीति-रिवाजों और अंधविश्वासों में उलझा हुआ है। यदि इसे बचाना है, तो इसे अपने मूल में लौटना होगा। और उसका मूल है—वेदांत। आचार्य प्रशांत स्पष्ट कहते हैं– “यदि हमें सनातन धर्म को बचाना है, तो वेदांत को उसके केंद्र में पुनः स्थापित करना होगा।” धर्मग्रंथ वही कहलाने योग्य है, जो मुक्ति की ओर ले जाए। बाकी सब स्मृतियाँ, इतिहास और मनोरंजन साहित्य हैं। उन्हें धर्म का दर्जा देकर हम केवल कचरे का बोझ बढ़ा रहे हैं।

निष्कर्ष: मुक्ति की ओर:
डॉ. अंबेडकर और आचार्य प्रशांत दोनों इस तथ्य पर जोर देते हैं कि धार्मिकता बुरी नहीं है। बुरा है धर्म के नाम पर पनपा अंधविश्वास और शोषण। हमें गंदगी छोड़नी है, लेकिन हीरे को नहीं। भारत का भविष्य तभी सुरक्षित है, जब हम जातिवाद और अंधविश्वास से ऊपर उठकर वेदांत और बौद्ध दर्शन की मुक्ति-साधना को अपनाएँ। धर्म का मकसद है अहंकार का अंत और आत्मा की स्वतंत्रता। यही वह सच्चाई है जिसे अंबेडकर ने अपने जीवन से दिखाया और जिसे आचार्य प्रशांत आज फिर से याद दिला रहे हैं।
· “धर्म का क्षेत्र हमारे मनोरंजन के लिए नहीं है, धर्म का क्षेत्र हमारी मुक्ति के लिए है।”
· “अगर धर्म बुरा होता, तो अंबेडकर बौद्ध क्यों बनते?”
· “जातिवाद मूर्खता है—वेदांत इसका सबसे गहरा खंडन करता है।”
· “मोरा हीरा हेराए गयो कचरे में।”

धर्म बनाम धार्मिकता – आचार्य प्रशांत का विवेचन:
आचार्य प्रशांत इस पूरे प्रसंग को गहराई से विश्लेषित करते हैं। उनके अनुसार–
· धर्म अपने वास्तविक रूप में मुक्ति का साधन है।
· लेकिन समाज ने धर्म के नाम पर ढेरों भ्रम, अंधविश्वास और शोषणकारी प्रथाएँ जोड़ दीं।
· परिणाम यह हुआ कि जो असल “हीरा” था—वेदांत का आत्मदर्शन, मुक्ति का विज्ञान—वह ढेर सारे कचरे के नीचे दब गया।
· अंबेडकर का संघर्ष इसी कचरे को हटाने का था। लेकिन समाज सुधार के बजाय धर्म के केंद्र को ही छोड़ दिया गया।
आचार्य प्रशांत यहाँ एक चेतावनी देते हैं—“गंदगी को छोड़ना होगा, पर हीरे को नहीं छोड़ना है।”
डॉ. अंबेडकर का विद्रोह केवल दलितों के लिए नहीं था, बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए चेतावनी था। जिस धर्म ने शोषणकारी प्रवृत्तियों को जन्म दिया है, उसे या तो शुद्ध करना होगा या त्यागना होगा। आचार्य प्रशांत का विचार इस चेतावनी को और गहराई देता है—धर्म को नष्ट मत करो, बल्कि धर्म के नाम पर जमा हुए कचरे को नष्ट करो। सनातन धर्म का असली केंद्र आत्मदर्शन, अहंकार से मुक्ति और सत्य की खोज है। यही हीरा है। हमें इस हीरे की पहचान करने और हीरे को कचरे से मुक्त करने की खासी जरूरत है।

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