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बैलपूजा

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साल में
एक दिन पूजे जाते हैं बैल
नहला धुला कर
औक़ात भर
सजाए जाते हैं बैल

आरती उतारी जाती है
पकवान खिलाए जाते हैं
निकाली जाती हैं झांँकियां
पूरे उत्सव के साथ

पूरा परिवार
पूरा गांँव जवार
हर्षोल्लास से भरा

बरस भर की ममता
एक दिन में लुटा दी जाती है
बैल भी अचरज में पड़ा
जब तक समझ पाता
कि शाम हो जाती है

थके-हारे लोग
करते हैं चर्चा रात भर
ट्रैक्टर के ज़माने में
किसी काम के नहीं रहे
न घर के न घाट के
फिर भी एक दिन के लिए
पूजे ही जाते हैं बैल

जिनके अपने नहीं
वे दूसरों के ही पूज लेते हैं
उसके बाद
आवारा निठल्ले बेसहारा
गली मुहल्ले सड़कों पर
मारे मारे फिरते हैं

दुर्गंध भरे गोबर से
जीना मुहाल
झुंड के झुंड भटकते हैं

सांड तो पूजे जाते हैं
साल भर मारे डर के
पर बैल
जो कभी गाढ़े के साथी थे
शक्ति थे सामर्थ्य थे संबल थे

अब सिर्फ बोझ हैं
जिन्हें ढोना भर है
जिनके लिए रोना भर है
वह भी सिर्फ़ एक दिन

बाकी साल भर के लिए तो
ट्रैक्टर है, थ्रेशर है, मशीन है
सबके पास वह भी कहांँ
कुछ लोगों के लिए आज भी
बैल ही सब कुछ है

वे ही बचाए हुए हैं परंपरा
परंपराएंँ हमेशा
कमज़ोर कंधों
असहाय हाथों के भरोसे ही
बची रहती हैं

वरना क़त्लगाहों में
जनावरों की भीड़
कोई कम तो नहीं

डॉक्टर हूबनाथ,संपर्क-91 98195 01044

संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र.

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