अग्नि आलोक

कश्मीर से कानपुर तक बुलडोजर गरीबों को रौंद रहा है

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21वीं सदी के बर्बर बुलडोजर काल उर्फ मृतकाल में आपका स्वागत है। 

कृष्णाकांत

कश्मीर से कानपुर तक बुलडोजर गरीबों को रौंद रहा है। महिलाएं, बच्चे, बूढ़े सब बुलडोजर के आतंक से चीख रहे हैं। यह बर्बरता कोई आतंकी संगठन नहीं कर रहे हैं। हमारी सरकारों में ऐसे लोग बैठे हैं जिन्होंने इंसानियत को शर्मसार करने का बीड़ा उठाया है। 

कानपुर में गरीब ब्राह्मण परिवार पर बुलडोजर चला दिया। प्रमिला दीक्षित और नेहा दीक्षित- दोनों मां-बेटी मिन्नतें करती रहीं कि साहेब गरीब हैं, मत उजाड़ो, कहां जाएंगे? बहरों के आंख-कान बंद थे। बर्बरता हावी थी। मां-बेटी की मिन्नतें हार गईं। दोनों उसी झोपड़ी में जलकर मर गईं। आग उन्होंने खुद लगाई या किसी और ने लगाई, स्पष्ट नहीं है।

खबर है कि बुलडोजर झोपड़ी को रौंदने लगा तो परिवार ने खुद को झोपड़ी में बंद कर लिया। उसी दौरान गांव के 8-10 लोग भी मौजूद थे जो कह रहे थे कि सबको जला दो। क्या आग उन्होंने लगाई? 

कश्मीर के लोग राजा के समय के दस्तावेज दिखा रहे हैं। जिस घर में कई पीढ़ियां रहकर गुजर गईं, उसे अतिक्रमण मानकर बुलडोजर चल रहा है। अब बुलडोजर न्यायाधीश है और हम सब अतिक्रमणकारी हैं। 

जब प्रशासन अमानवीयता को सेलिब्रेट करने लगता है तो जनता भी उसी में शामिल हो जाती है। लोगों को भी चर्बी चढ़ गई है। आंख में मांस उगा है। अकल में पत्थर पड़ गया है। सत्ता में बैठे अहंकारियों और उनके समर्थकों को जिंदा इंसानों की चीखें सुनाई नहीं दे रही हैं। सब हिंसा और बर्बरता का जश्न मनाने में लगे हैं।    

यह बुलडोजर आज पूरे देश में दमन, बर्बरता और मानवता को रौंदने का प्रतीक बन गया है। यह आग का खेल है। एक जगह शुरू हुआ और पूरे देश में फैल गया है। यह ​एक दिन आपके घर भी आएगा। पहले अपराध होने पर पुलिस आती थी, अब बुलडोजर आता है। अब बुलडोजर ही कानून है, वही संविधान है, वही अदालत है, वही जज है, वही सरकार है। यह बुलडोजर काल है। 

21वीं सदी के बर्बर बुलडोजर काल उर्फ मृतकाल में आपका स्वागत है।               

अब आगे क्या होगा और आगे क्या करना है, कैसे करना है?

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इस सवाल का ज़वाब अगर आप हिंदुस्तान के सन्दर्भ में खोजेंगे तो कभी सही ज़वाब नहीं पायेंगे क्योंकि जिस तरह कोई भी चीज निजी नहीं होती उसी तरह किसी भी समाज का मामला निजी नहीं होता – दुनिया गोल है और गोल ही रही है, गोल ही रहेगी !

फौरी तौर पर – दक्षिणपंथ इतना कूप-मंडूक होता है कि यह विचार कर ही नहीं सकता – यह मार्क्सवाद तो है नहीं और न हो सकता है – यह जिस डाल पर बैठता है, उसी को काटता है -इसका अर्थ यह है कि यह स्वार्थी होता है – जन-विरोधी और मनुष्य-हंता होता है, सो यह अपनी मौत का खुद कारण बनता है जैसे कि समाज-व्यवस्थाएं अपनी मौत का कारण खुद बनती हैं, आदिम साम्यवाद हो, गण-व्यवस्था हो, सामन्तवाद हो, पूंजीवाद हो या समाजवाद (जिसके आने में अभी ६-७ सौ साल बाकी हैं) हो, अपनी मौत खुद मरते हैं – मार्क्स ने इसे अन्तर्विरोध कहा है – बाह्य और आंतरिक – सो यही अंत दक्षिणपंथ का होता है !

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अब भारत के संदर्भ में देखिये:

१. फासीवादी और नाजीवादी ताकतें सत्ता में हैं और इनके हटने का कोई आसार नहीं है क्योंकि इन्हें हटाने की जो ज़मीन होनी चाहिए वह नहीं है – इसी को आप ‘कमजोर विपक्ष’ कहते हैं  

२. समाज के स्तर पर साम्प्रदायिकता और जातिवाद यानिकि सामंती तत्व अपने उभार पर हैं – माने बुझने से पहले चिराग की लौ तेज हो गई है क्योंकि पूंजीवाद अपने रास्ते के रोड़े को हटा कर ही मानेगा 

३. पूंजीवाद ने अभी-अभी अपने दूसरे दौर में प्रवेश किया है और पूंजीपति सत्ता पर काबिज़ होने की कोशिश में लग गये हैं – इन्हें पूरी तरह सत्ता में आने में २ सौ साल लगेंगे 

४. चूँकि गण-व्यवस्था और सामन्तवाद के तत्व पूंजीवाद के तीसरे चरण के लिए बाधा बनते हैं इसलिए इन तत्वों का सफाया बेरहमी से पूंजीवाद करेगा – आप बीजेपी-आरएसएस को देखिये सामन्तवाद ओर पूंजीवाद का द्वंद्व आपको इनमें साफ़ मिल जाएगा – एक ओर हिन्दू-राष्ट्र बनाना और दूसरी ओर उसे न बना पाना – पाकिस्तान का विरोध करना और विरोध न कर पाना 

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१. आगे क्या होगा? – फासीवादी-नाजीवादी ताकतें अपना अंत अपने द्वंद्व से कर लेंगी 

२. आगे क्या करना है? – ‘शिक्षित’ करना है 

३. कैसे करना है? – इसके २ उत्तर हैं – १. परिस्थितियां ही ‘शिक्षित’ करती हैं और ‘शिक्षित’ करेंगी २. आप अपने को शिक्षित  कीजिये, गण-व्यवस्था और  सामंतवादी सोच-समझ-संस्कार-गन्दगी से अपने को मुक्त कीजिये, अपनी सोच-समझ को सही कीजिये – हर बात को प्रमाण-सबूत की कसौटी पर कसिये – हर बात के दोनों पक्षों पर विचार कीजिये (जैसे ईश्वर/खुदा है कि नहीं – सबूत मांगिये, होने और न होने की नजर से सोचिये) – और यह तय मानिए कि कोई भी ‘क्रांति’ नहीं कर सकता – क्रांति का मतलब परिवर्तन होता है, जो विकास से आता है और समाज में परिवर्तन अर्थ-तंत्र से आता है – कोई भी अर्थ-तंत्र को बदल नहीं सकता, न राहुल, न मोदी, न येचुरी – अर्थ-तंत्र खुद अपने को बदलता है एक मशीन की तरह और उसी के अनुरूप समाज को बदलता है 

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हमारी सोच-समझ समाज और अर्थ-तंत्र पर आधारित होती है – आपको धार्मिक लोग भी  दिख रहे हैं, साम्प्रदायिक भी, जातिवादी भी, ‘शिक्षित भी’  – क्यों? – क्योंकि इस समय के समाज में ऐसी ही मिश्रित अर्थ-व्यवस्था है, ऐसा ही मिश्रित समाज है – गण-व्यवस्था बहुत पीछे छूट  गई, उसकी तमाम बातें छूट गईं, सामन्तवाद अभी-अभी छूटा है, उसकी तमाम बातें छूट गईं, पूंजीवाद अभी-अभी आया है, उसकी बातें अभी आना बाक़ी हैं, जैसे ‘असामाजिकता’, ‘अपराधीकरण’आदि-आदि  – २ सौ साल बाद पूंजीवादी प्रवृत्तियां और स्पष्ट होंगी – पिछली व्यवस्थाओं के तत्व छूटते जायेंगे !

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