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ताज, कुतुब के बहाने खुलते दफ़न राज!

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*सुसंस्कृति परिहार
अजी,नहले पे दहला मुहावरा बचपन से सुनते आए हैं पर पिछले दिनों जब ताजमहल और कुतुब मीनार के दफ़न राज को खोलने की कोशिश हुई तो प्रतिफल भी सामने आ गया जो सदियों से अंधकार में थे। बताया जा रहा है गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर को लूटा ज़रुर महमूद गजनवी ने था लेकिन वहां स्थापित बौद्ध मठों को मिटाकर यहां यह प्रसिद्ध मंदिर किसने और किसे तोड़कर बनाया यह तथ्य सामने आ गया। उत्तराखंड में स्थित  बद्रीनाथ धाम को बौद्ध मठ बताया जा रहा है।इतना ही नहीं, उज्जैन के महाकाल मंदिर के नीचे भी पुरातत्व विभाग ने 1000 वर्ष पुराने मन्दिर बताये लेकिन फिर बात वहीं खत्म हो गयी। ऐसे असँख्य मन्दिरों की बातें होती है जैसे तिरुपति बालाजी इत्यादि जिन्हें पहले बौद्ध स्थल, जैन मंदिर इत्यादि के रूप में कहा जाता है ।साथियों इसे कहते हैं नहले पे दहला।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है किप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी हैं और उन्होंने आईआईटी गांधीनगर और 4 अन्य सहयोगी संस्थाओं के पुरातत्व विभाग के एक्सपर्ट को सोमनाथ मंदिर की जांच के निर्देश दिए थे। दिसम्बर 2020 को 32 पेज की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई जिसमें कहा गया कि सोमनाथ मंदिर के नीचे तीन मंजिला बौद्ध मंदिर और गुफाएं हैं जो एल शेप में है तथा सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति के आसपास तक फैली हुई है। लेकिन कहीं कोई चर्चा नहीं हुई इस सच से भी देश को अवगत कराया जाना चाहिए कि मंदिरों मठों के विध्वंस का काम हिंदुओं ने भी किया है।इसी तरह उत्तराखंड का बद्रीनाथ मन्दिर एक बौद्ध तीर्थस्थल कहा जाता है जिसका सम्बंध आज भी तिब्बत के ठोलिंग मठ से हैं और बद्रीनाथ स्थित मूर्ति आज भी अर्धखण्डित बुद्ध की मूर्ति कही जाती है जिसे आदि शंकराचार्य ने अपने अंतिम समय के दौरान स्थापित किया था। यह केवल बहस हुई लेकिन तथ्य यह है कि सन 1975 में कोर्ट में बद्रीनाथ की सम्पत्ति पर अधिकार को लेकर एक वाद चला था बद्रीनाथ मन्दिर बनाम डिमरी पंचायत था जिसमें 200 डिमरी थे। इसे तब यूपी स्टेट ने भी स्वीकार किया था।”श्री बद्रीनाथ डिमरी केंद्रीय पंचायत” ने स्पष्ट कहा कि “बद्रीनाथ एक बौद्ध स्थल था जिसे आदि शंकराचार्य जो दक्षिण के नम्बूदिरी ब्राह्मण थे उन्होंने नष्ट कर वहां मन्दिर स्थापित किया और बाहर से पुजारी (रावल) बिठाकर हमें तमाम साधनों से वंचित किया।”  इससे सम्बंधित कोर्ट के साक्ष्य भी उपलब्ध है  बौद्ध स्थलों को तोड़कर मन्दिर बनाने में विषय पर अनेकों किताबें भी लिखी हुई है जिसमें बद्रीनाथ सहित सैकड़ों अन्य स्थल शामिल है।
पिछले दो दशक पूर्व धार्मिक कट्टरता के उन्मादी तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल से लगभग 230 किलोमीटर दूर उत्तर पश्चिम में बामियान नाम का प्राचीन शहर है जो प्राचीन सिल्क रूट पर बसा हुआ है । इस बामियान में भगवान बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाऐ हुआ करती थी जिनमें एक छोटी प्रतिमा की ऊँचाई 115 फ़ीट तथा दूसरी बड़ी प्रतिमा की ऊँचाई 174 फ़ीट थी । छोटी प्रतिमा का निर्माण सन् 507 में हुआ था और बड़ी प्रतिमा सन् 554 में बनी थी । दोनों प्रतिमाओं की ऐतिहासिकता, ख़ूबसूरती, कलात्मकता के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अंतरराष्ट्रीय कोष से इन प्रतिमाओं के रखरखाव व संरक्षण के लिए धन भी मिला करता था क्योंकि ये प्राचीन प्रतिमाऐ न केवल अफ़ग़ानिस्तान की बल्कि पूरे विश्व की अनमोल धरोहर मानी जाती थी ।बामियान कभी बौद्ध धर्म का केंद्र हुआ करता था और यहॉ अनेको बौद्ध विहार थे जिस कारण बामियान धर्म, दर्शन और कला के एक सम्पन्न केंद्र के रूप में विकसित हुआ था ।
विश्व की इन अनमोल प्राचीन धरोहरों को तालिबान हुकूमत के प्रमुख मुल्ला मोहम्मद उमर के कहने पर मार्च 2001 में डायनामाइट से इसलिए उड़ा दिया गया था क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा या बुत परस्ति हराम है। तालिबान प्रमुख की इस हरकत की पूरे विश्व ने भर्त्सना की थी पर जिनका वजूद ही धार्मिक कट्टरता के कारण है उन पर किसी निंदा या लानत मलानत का कोई असर नहीं होता । एक अनमोल विश्व धरोहर धार्मिक कट्टरता की भेंट चढ़ गई ।
ऐसा ही कुछ हमारे देश में वर्ष 1992 में हुआ था जब कुछ संगठनों के लोगों ने अयोध्या में स्थित एक प्राचीन व ऐतिहासिक मस्जिद ढहा दी थी। वह लोग भी कुछ ऐसी ही विचारधारा के कट्टर पंथी लोग थे ।
आज हमारे देश में कुछ कट्टरपंथी इस तरह की खुराफातों में लगे हैं लेकिन सोशल मीडिया की सक्रियता की बदौलत अब  पुरातन इतिहास का ब्यौरा झट से प्रतिकार में सामने आ जाता है हाल की इन घटनाओं से तो ऐसा ही लगता है आंख मींचकर कुछ भी कह देने से इतिहास गुम नहीं हो सकता है।इस तथ्य को  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना जब ताजमहल विवाद पर जस्टिस डीके उपाध्याय ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा कि PIL व्यवस्था का दुरुपयोग ना करें। इसका मजाक ना बनाएं। ताजमहल किसने बनवाया पहले जाकर रिसर्च करो। यूनिवर्सिटी जाओ, PHD करो तब कोर्ट आना। रिसर्च से कोई रोके तब हमारे पास आना। अब इतिहास को आपके मुताबिक नहीं पढ़ाया जाएगा। बाद में याचिका खारिज कर दी गई।संभव है इस फैसले से इन खुराफातियों को कुछ सबक मिले। कुल मिलाकर यह अब तय है कि अदालतों का रुख देश को मंदिर मस्जिद विवाद में उलझाने का नहीं।आम लोग भी इन विवादों में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं जबकि मज़हबी माहौल बिगाड़ने वाले चुनावों से पहले सक्रिय हो गए हैं।इस वक्त पड़ौसी देश में कट्टर धार्मिकता के जो परिणाम सामने उसे देख  तय कीजिए इस तरह गड़े मुर्दे उखाड़ने से कोई फायदा नहीं क्योंकि इससे आपकी करतूतों का भी पर्दाफाश होता जा रहा है।अब तक ठंडे बस्ते में पड़ा राज मुखर होकर बोलने लगा है।इसे विराम देना ही फायदेमंद होगा।

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