Site icon अग्नि आलोक

परमात्मा से रिश्ता जोड़ने से संसार के सारेरिश्ते चिरस्थायी बनाये जा सकते हैं!

Share

प्रदीप ‘पाल’

युग शिल्पी एवं समाजसेवी
ं1.  संसार के रिश्तों से हमें वही मिलता है, जो हम देते हैं, लेकिन जो हम नहीं देते, वह हमें नहीं मिल पाता, भले ही हम उसके लिए तरसते रहें। रिश्ते दर्पण की तरह हमारी भावनाओं को परावर्तित कर देते हैं। हम जिस तरह की भावनाओं से भरे होते हैं, परावर्तित होकर वे ही हम पर अपनी बौछार करती हैं। इसलिए जब हम खुश होते हैं तो खुशी का गुबार चारों ओर फैल जाता है, अनायास ही चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ जाती है, जब हम परेशान होते हैं तो परेशानी की लहरें सभी को परेशान कर देती हैं और इसी तरह जब हम क्रोधित होते हैं, तो क्रोध की रक्तिम-तीखी किरणें इसके वेग को और बढ़ा देती हैं। इस तरह रिश्तों की इस दुनिया में हमारी भावनाएँ हमें कई गुना होकर वापस मिलती हैं। ऐसा बहुत कम ही होता है कि जिन भावनाओं को हम दूसरों पर प्रक्षेपित कर रहे हों, उसके विपरीत भाव हमें मिल रहे हों। 
2.  रिश्ते हमें खुशी देते हैं, इस खुशी को बढ़ाने के लिए ही हम अपने रिश्तों की दुनिया का विस्तार करते हैं। यदि रिश्ते बोझ होते, दुःख देते, जीवन में कटुता घोलते तो भला कोई क्यों इन रिश्तों में उलझता? भले ही वास्तविक जीवन में लोग रिश्तों की मधुरता को कम महसूस करते हैं, लेकिन रिश्तों का एहसास, इनकी मधुरता व्यक्ति को आनंदित करती है, पुलकन से भरती है। पर शायद हमारा इन रिश्तों के मनोविज्ञान से परिचय कम है, इसलिए लोग इन रिश्तों को भली प्रकार सहेज नहीं पाते, रिश्तों को लंबे समय तक सहजता से निभा नहीं पाते और बने हुए रिश्तों को भी तोड़ना चाहते हैं। 3.  रिश्तों का अर्थ संबंध होता है। संबंध हमारा किसी भी चीज से या व्यक्ति से हो सकता है। लेकिन यहाँ पर रिश्ते का मतलब व्यक्तियों से संबंध से है। पर व्यक्ति से हमारा व्यवहार ऐसा होता है, जैसे हम किसी निर्जीव वस्तु के साथ व्यवहार कर रहे हों। कोई भी व्यक्ति जो जीवित है, उसकी अपनी इच्छाएँ होती हैं, अपेक्षाएँ होती हैं, वह अपनी मरजी के अनुसार चलना चाहता है, करना चाहता है, लेकिन संबंधों के दायरे में, रिश्तों की सीमाओं के कारण वह अपनी मरजी के अनुसार नहीं कर पाता, रिश्तों में बँधते ही उसकी स्वतंत्रता छिन-सी जाती है, फिर उसे वही करना होेता है, जो उस रिश्ते में उसे करना चाहिए। इस तरह रिश्तों में बँधकर व्यक्ति को दूसरों के अनुसार जीना होता है, यह सब एक सीमा तक तो सहनीय होता है, लेकिन जैसे ही यह सब सहनशक्ति से बाहर होता है, व्यक्ति का गुबार फूट पड़ता है और यहीं से रिश्तों में दरार आनी शुरू हो जाती है। 
4.  हर व्यक्ति दूसरों के सामने ऐसे प्रस्तुत होता है, जैसे-वह कितना अच्छा है, कितना संतुलित व सामंजस्यपूर्ण है, लेकिन वास्तविकता में वह जो होता है, उससे कम लोगों का ही परिचय होता है। जो उसके करीबी होते हैं, वे ही जानते हैं कि असलियत में वह व्यक्ति कैसा है? यही वजह है कि जब व्यक्ति किसी से मिलता है तो शुरूआती दौर में सभी एकदूसरे को पंसद करते हैं, लेकिन जब एकदूसरे को नजदीक से जानने लगते हैं, व्यक्तित्व से परिचित होने लगते हैं, तो फिर उसके साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाते। 
5.  रिश्तों को सँवारने के लिए हमें इस बात को समझना होगा कि हर व्यक्ति में अच्छाइयाँ व कमियाँ हैं, यदि किसी व्यक्ति को हम अपनाते हैं, तो केवल उसकी अच्छाइयों के साथ नहीं, बल्कि उसकी कमियों के साथ भी हमें उसे स्वीकारना पड़ेगा। यदि कमियाँ खलती हैं, तो उन्हें दूर करने का प्रयास करना होगा या फिर उन्हें नजरअंदाज करना होगा। इस संसार में बहुत सारी चीजों ऐसी हैं, जिन्हें बदला नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में जो कुछ बदला जा सकता है, उसे ही बदलना पड़ता है। इसी तरह यदि सामने वाला अपने में परिवर्तन करने को तैयार नहीं है तो स्वयं में जो परिवर्तन संभव हैं, उन्हें करना चाहिए। लेकिन कभी भी स्वयं की व अन्य की बुराई को, कमियों को स्वीकारना नहीं चाहिए अन्यथा इसके परिणाम भयानक हो सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक बुराई छिपाने से कई कमियाँ व बुराइयाँ जन्म लेती हैं, जो व्यक्ति के पतन का कारण बनती हैं। इसलिए बुराईयों को दूर करने के लिए हमें ही सतत प्रयत्नशील होना चाहिए। 
6.  रिश्ते दूर से बड़े मोहक लगते हैं, लेेकिन रिश्ते में जुडे़ हुए लोगों को ही इसकी असलियत पता होती है; क्योंकि रिश्ते कभी भी एक तरह की गति से नहीें चलते, जैसे-समतल सड़क पर चलने वाली गाड़ी तेजी से बिना किसी डगमगाहट के दौड़ती है, लेकिन रिश्तों की गाड़ी जीवन में कभी मधुर होती है, कभी लड़खड़ाती है, कभी बहुत शोर करती है, कभी रूलाती है तो कभी रास्ते में ही ठहरकर रह जाती है। इसकी गति में समानता लाने के लिए हमें हर बार रिश्तों की इस गति को नए पन से शुरू करना पड़ता है। 
7.  रिश्तों की इस दुनिया में यदि कोई सबसे अधिक चोटिल होता है तो वह अपने लोग होते हैं और यदि कोई सबसे अधिक खुशी महसूस करता है तो वो भी अपने ही लोग होते हैं। चूँकि लोग अपने होते हैं, इसलिए उनके सामने कोई दिखावा या परदा नहीं होता, व्यक्ति जैसा है, वैसा ही व्यवहार करता है। अनजान लोगों के सामने वह अपने व्यक्तित्व पर परदा डालने का प्रयास करता है, अच्छा बनने की कोशिश करता है, लेकिन अपनों के सामने वह ऐसा कुछ नहीं करता। इसलिए यदि व्यक्ति के मन में किसी और के लिए गुस्सा या नाराजगी है तो वह उसे अपनों पर ही निकाल देता है। अपनी खुशी भी वह सबसे पहले अपनों पर ही लुटाता है, लेकिन कभी-कभी जरूरत से ज्यादा नाराजगी, बात-बात पर कमी निकालना, उदासी, परेशानी आदि नकारात्मकता जीवन में रिश्तों की डोर को इस कदर उलझा देती हैं कि उन्हें फिर से सुलझाना सरल नहीं होता। 
8.  बुराई या निंदा सबको चुभती है और प्रशंसा सबको अच्छी लगती है। भले ही निंदा सच्ची हो, लेकिन अच्छी नहीं लगती और इसी तरह प्रशंसा भले ही झूठी हो, मन को भाती है। यदि रिश्तों को सँवारना है तो अपनों की बुराई या निंदा करने के बजाय प्रशंसा करने की आदत डालें। अपनों को प्रोत्साहित करने का प्रयास करें, इसका मतलब यह नहीं कि कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाए, बल्कि यह है कि कमियों का भी सकारात्मक रूख देते हुए दूर करने का प्रयास किया जाए। कमियाँ हैं, यह सभी जानते हैं, लेकिन दूसरों के सामने स्वीकारते नहीं हैं। भले ही इन्हें कोई न स्वीकारे, लेकिन इन्हें सुधारने का प्रयास करके रिश्तों को सँवारा जा सकता है। 9.  परमपिता परमात्मा इस सृष्टि का रचनाकार है। वह अपनी प्रत्येक रचना से प्रेम करता है। यह सारी मानव जाति परमात्मा का वृहत परिवार है। हम परमपिता परमात्मा के आज्ञाकारी पुत्र है। सारी मानव जाति परमात्मा की संतानें हैं। प्रत्येक प्राणी में परमात्मा की आत्मा का अंश है। हम बस केवल अपनी आत्मा के पिता परमात्मा से नाता जोड़ ले। फिर सारे सांसारिक रिश्ते मधुर आध्यात्मिक रिश्तों में बदल जायेंगे। ये आध्यात्मिक रिश्ते शरीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहेंगे। 
10.  सुन्दर प्रार्थना है कि एक कर दे हृदय अपने सेवकों के हे प्रभु! निज महान उद्देश्य कर प्रगट उन पर हे प्रभु! मैं साक्षी देता हूँ – हे मेरे परमात्मा तूने मुझे इसलिए उत्पन्न किया है कि मैं तुझे जाँनू और तेरी पूजा करूँ। तुझे जानने के मायने है तेरी शिक्षाओं को जाँनू तथा पूजा करने के मायने है उन शिक्षाओं को गहराई से जानकर उसके अनुसार सारी मानव जाति के साथ आध्यात्मिक रिश्ता जोड़कर अपने प्रत्येक कार्य-व्यवसाय करूँ। समस्त मानव जाति से रिश्ता जोड़ने की मधुर आत्मीयता का विस्तार ही अध्यात्म है। आत्मीयता के विस्तार की मिठास को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह गूँगे व्यक्ति के गुड़ खाने के समान है जो अपनी वाणी से गुड़ की मिठास को व्यक्त नहीं कर सकता।  
पता- बी-901, आशीर्वाद, उद्यान-2
एल्डिको, रायबरेली रोड, लखनऊ 
मो0 9839423719

Exit mobile version