
रमाशंकरसिंह,
पूर्व मंत्री, मध्यप्रदेश
संसदीय नियम प्रक्रियाओं और कौशल का इस्तेमाल कर कोई अकेला सदस्य भी या छोटा दल सम्यक अध्ययन व तैयारी से सरकार व स्पीकर को सही विषयों पर बहस को मजबूर कर सकता है । मैं अपने दल का इकलौता विधायक रहा हूँ और इन नियम प्रक्रियाओं से परिचित रह कर भारी बहुमत की सरकार को सदन में जवाब देने के लिये विवश करता रहा हूँ , इसलिये अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ । एक सदस्य भी चाहे तो one man army की तरह संसदीय प्रतिपक्षी जौहर दिखा सकता है । यह बात अंधभक्त या अंधसमर्थक नहीं समझ सकते जो संसद के बाहर टीवी बहसों में बैठते हैं या केवल लोकतंत्र की बहानेबाज ढाल लेकर थोथे प्रवचन करने के लिये जाने जाते हैं ।
लोकसभा में कभी ऐसे विपक्षी सदस्य भी होते थे जो अपने संसदीय कौशल से पूरे सदन को अपने ऐजेंडे पर चला सकते थे जैसे मधु लिमये , ज्योतिर्मय बसु , भूपेश गुप्ता , हीरेन मुखर्जी आदि । तब भी स्पीकर पद पर रहे कोई निष्पक्ष व्यक्ति नहीं बैठते थे । मैं डा० लोहिया का नाम अभी इससे बाहर रख रहा हूँ जिनकी नैतिक व त्याग की ऐतिहासिक शक्ति भी उनके संसदीय व्यवहार में सदन को अनुशासित रखने के काम में आती थी जबकि टोकाटोकी तब भी खूब होती थी । खुद फिरोज गांधी भी एक श्रेष्ठ सासंद रहे थे । एक कुशल चतुर और अध्धयनशील सांसद टोकाटोकी को भी हाज़िरजवाबी और उचित व्यंग्य से सदन के माहौल को अपने पक्ष में कर सकता है । फिलहाल बात सिर्फ़ संसदीय नियमों के उपयोग व कौशल की है।
अब निष्पक्षता से सोचा जाये कि क्या आज का विपक्ष अपनी संसदीय शक्ति का समुचित उपयोग लोकसभा में कर पा रहा है ? कुछ हद तक ही तृणमूल के सांसद और सपा नेता अखिलेश यादव इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मंच का सही राजनीतिक उपयोग करते दिखते हैं लेकिन मान्यता प्राप्त प्रमुख विपक्षी दल बहसों से हाथ खींचता ही नजर आता है। कारण मुद्दों की कमी नहीं है बल्कि अध्धयन , धीरज और कौशल की कमी रहती है । शायद चर्चाओं में सही सदस्यों का चुनाव भी एक कारण हो जो कि आजकल एक बडी तिकड़म होती है कि बेहतर और प्रभावशाली सदस्य ऊपर न आने पायें । एक समस्या हिंदी में बहस न करने की भी है जिसके कारण भारत के बड़े हिस्से पर असर ही नहीं पड़ता । सबसे अधिक प्रभाव संभवतया द्विभाषीय भाषणों का हो सके।
नेता विपक्ष राहुल गांधी को मैं जितना सुनता/ देखता हूँ उतना ही वे अधिकांशतः निराश करते हैं जबकि उनसे बेहतर तो उनकी बहन प्रियंका ही संसदीय कौशल दिखातीं हैं । राहुल एक खास किस्म का गुस्सा , सरकारी बैंच के प्रति अपमान बल्कि हिकारत , जल्दबाजी व अंहकार धर कर अपनी बात रखते हैं और उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाने में असमर्थ रहते हैं । संसद चर्चा का मंच है और बराबरी व गरिमा का यह समझना चाहिये। उनका करीब बीस साल का संसदीय जीवन है पर सीखे बहुत ही कम हैं । वे यह भी अहसास करने में असमर्थ हैं कि हिंदी में उनके गलत व बुरे वाक्य विन्यास ही उनकी आलोचना का अवसर देते हैं । देश की प्रबुद्ध जनता अपने नेता विपक्ष को किसी के प्रति भी अपमानजनक भाषा बोलते नहीं देखना चाहती । यह सार्वजनिक और आवश्यक गरिमा सभी को दिखानी पड़ती है । प्रधानमंत्री की भी भाषा का सबसे अच्छा जवाब शिष्ट और सौम्य व्यवहार से होता है कि स्पष्ट गुणात्मक अंतर दिखता है!
कांग्रेस के सौ सांसदों के दम पर ही यदि नेता प्रतिपक्ष चाहे तो लोकसभा के सदन पर उठती बहसों को देश की आवाज बना सकते हैं । इस पर कांग्रेस पार्टी कभी नहीं सोचेगी कि क्यों वे सौ सदस्य होकर भी संसद की चर्चाओं में प्रभावशाली समूह नहीं बन पा रहे ? कांग्रेसी यूट्यूबर , पत्रकार , लेखक व अन्य अंधसमर्थक भी क्यों सोचेंगे जो हर समय वाह वाह करने में ही व्यस्त रहते हैं । कभी न कभी एक ज़िम्मेदार दल को यह सोचना तो पड़ेगा कि क्या वो मात्र दो तीन सौ कुल – प्रवक्ताओं , बुझे चुके हुये लेखकों बुद्धिजीवियों , कुछ वित्तपोषित पत्रकारों की झूठी वाहवाही में ही देश की विराट राजनीतिक सम्भावना को सीमित कर देना चाहता है। संसद के दौरान यदि प्रधानमंत्री का विदेश गमन बुरा है ( जो कि है ) तो नेता विपक्ष को तो इसे अपनी नियमित संसदीय उपस्थिति से प्रमाणित ही कर देना चाहिये । क्या हम सबने नहीं देखा कि प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद डा० मनमोहन सिंह सुबह से शाम तक लगातार राज्यसभा में बैठे रह कर सबको सुनते थे । दूसरों को सुनना भी संसदीय व्यवहार का एक जरूरी अंग होता है और स्पीकर समेत कई अन्य नेताओ से सामान्य शिष्ट सौम्य व्यवहार के निजी रिश्ते जैसे कि जयराम रमेश ने धनखड से बनाये और सत्ता दल को एक गहरी परेशानी में डाल दिया था ।
अभी सीमित विषय पर ही बात हो रही है ।
माना कि सरकार कितने ही मुद्दों पर अपना अलोकतांत्रिक बुलडोजर चला रही है लेकिन फिर उतने ही विषयों पर चर्चा का मैदान खुलता जाता है ।
क्या कारण है कि दस बारह सदस्यों के छोटे दलों के सक्रिय संसद सदस्यों की बहसें भी कभी देश भर में चर्चा का विषय हुआ करती थीं लेकिन आज अल्पमत की सरकार को भी ठीक से घेरने में विपक्ष असफल सा दिखता है।
सरकारी पक्ष यदि श्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं करता है तो विपक्ष को तो और मौका होता है । मुझे मोदी के मुकाबले संसद में अमितशाह बेहतर संसदीय प्रदर्शन करते दिख रहे हैं ।