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क्या चुनावों के बिना भी चल सकता है लोकतंत्र

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वेदप्रताप वैदिक

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। भारतीय लोकतंत्र की खूबी यह है कि इसे 75 साल हो गए, लेकिन यह ज्यों का त्यों बरकरार है, जबकि दुनिया के कई छोटे-बड़े राष्ट्रों में लोकतंत्र का खात्मा हो चुका है। वहां लोकशाही की जगह तानाशाही, फौजशाही और पार्टीशाही का कब्जा हो गया है। भारत को स्वाभाविक ही इस बात पर गर्व है कि यहां लोकतंत्र दनदना रहा है। केंद्र और राज्यों में निरंतर चुनावों का सिलसिला जारी है। जनता जिसे चाहती है, उसे कुर्सी पर बिठा देती है और जिसे नहीं चाहती, उसे हटा देती है। दुनिया में आज तक जितनी भी शासन-पद्धतियां देखी गई हैं, उनमें लोकतंत्र को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

सवाल चुनाव प्रणाली का

चुनाव ही लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या चुनावों की वर्तमान प्रणाली के द्वारा सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो सकता है। इस बात में संदेह है और उसके कई कारण हैं।

इन वजहों से पिछले कई दशकों से मैं इस चुनाव-प्रणाली के बारे में चिंतन करता रहा हूं। दर्शन और राजनीति का छात्र होने के कारण मुझे दुनिया के सभी महान चिंतकों के विचारों से अवगत होने का मौका मिला है। पत्रकारिता में आ जाने की वजह से भारतीय राजनीति के लगभग सभी पहलुओं से भी मेरा परिचय है। मैं पिछले 50 वर्षों में दुनिया के लगभग 25 छोटे और बड़े लोकतांत्रिक देशों में रहकर उनकी व्यवस्थाओं को भी देख चुका हूं। मैं कई वर्षों से सोचता रहा हूं कि यदि भारत अपनी चुनाव-प्रणाली को पूरी तरह बदल दे तो वह दुनिया के लोकतंत्रों को नई दिशा दे सकता है। मैं चाहता हूं कि भारत में ऐसी सरकारें बनें, जैसी 1947 में पहली सरकार बनी थी।

वर्तमान चुनाव-प्रणाली या तो सिर्फ एक ही पार्टी या कुछ पार्टियों की गठबंधन सरकारों को जन्म देती है। बाकी सारे चुने हुए प्रतिनिधि विपक्ष में बैठते हैं। हालांकि गठबंधन सरकारों में कभी-कभी एक-दूसरे के घोर विरोधी दल भी एक हो जाते हैं। यदि दो घोर विरोधी दल एक होकर सरकार चला सकते हैं तो सभी दल मिलकर सरकार क्यों नहीं चला सकते? यदि सत्ता की मजबूरी उन्हें एक कर सकती है तो सेवा का भाव एक क्यों नहीं कर सकता? यदि हमारे नेताओं में सत्ता और सेवा का भाव एक साथ जुड़ जाए तो आश्चर्य नहीं कि एक नई सर्वहितकारी व्यवस्था का उदय हो जाए। सवाल है कि उसका क्या तरीका हो सकता है। इसका सबसे व्यावहारिक तरीका यही दिखाई पड़ता है कि सभी पार्टियों को अपनी सदस्य संख्या के आधार पर विधानसभाओं और लोकसभा में प्रतिनिधत्व दिया जाए। प्रस्तावित नई व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएं इस तरह रेखांकित की जा सकती हैं।

निर्दलीय मतदाता

इस क्रांतिकारी व्यवस्था के सामने एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी खड़ा किया जा सकता है कि जो नागरिक किसी भी पार्टी के सदस्य नहीं बनना चाहें, क्या उनके अभिमत की भी कोई कीमत होगी या नहीं? यह हो सकता है कि वे अपना स्वतंत्र अभिमत प्रकट करना चाहें, जो सभी पार्टियों को नकारता हो। ऐसे नागरिकों के बारे में भी ‘पार्टी सदस्यता निगरानी आयोग’ को कोई रास्ता निकालना होगा। यदि इस नई व्यवस्था का प्रयोग भारत में शुरू हो जाए तो यह सारी दुनिया के लोकतंत्रों में नई जान फूंक देगा। बेहिसाब चुनावी खर्च खत्म होगा और भ्रष्टाचार घटेगा। इस एकदम नए विचार पर देश के चिंतकों, नेताओं और आम जनता की प्रतिक्रियाओं और मतभेदों का स्वागत है।

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