
-चंद्रशेखर शर्मा
सोचिए, यदि पार्षद मिलकर महापौर चुनते तो ? विदित हो कि पहले महापौर का चुनाव जनता नहीं करती थी, बल्कि जनता जिन पार्षदों को चुनती थी, वो पार्षदों में से ही किसी एक को महापौर चुनते थे। यही होता था पहले और इस चुनाव के लिए भी कांग्रेस यही प्रक्रिया चाहती थी ! सो यदि इस चुनाव में यही होता तो क्या संजय शुक्ला को कांग्रेस और पुष्यमित्र भार्गव को बीजेपी पार्षद का चुनाव लड़वाती ? जवाब आप जानते हैं। जाहिर है अभी ऐसा नहीं है और यह बड़ा, बल्कि बहुत बड़ा फर्क है। खासकर इंदौर जैसे बड़े और मेट्रो शहर के संदर्भ में। खैर।
ताजा मसला यह है कि लंबी जद्दोजहद, माथापच्ची और उठापटक के बाद बीजेपी ने आखिरकार पुष्यमित्र भार्गव को इंदौर के लिए अपना महापौर प्रत्याशी बनाना तय किया है। बहुत लोगों के लिए यह चयन चौंकाने वाला ( बीजेपी में अनेक लोगों के लिए पीड़ा देने वाला भी) है और इस नाचीज के लिए थोड़ा ज्यादा अचरज वाला। जी हां, वो इसलिए कि बहुत पहले से अपने सूत्र यह खबर दे रहे थे कि इनका नाम आगामी विधानसभा चुनाव के लिए चार नम्बर क्षेत्र से दमदारी से चल रहा है ! इस जानकारी पर अपन को तब भी अचरज होता था। जाहिर है अब अपन को थोड़ा ज्यादा अचरज इस खातिर है कि पार्टी ने एक विधानसभा से ज्यादा यानी पूरे शहर के महापौर के लायक खूबियां भी इनमें होना माना है ! वो भी जनता और पार्टी के अनेक बड़े नेता जिन रमेश मेंदोला, मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़, गौरव रणदिवे, उमेश शर्मा, मधु वर्मा, डॉक्टर निशांत खरे, मनोज द्विवेदी आदि में यह खूबियां देख रहे थे, उन सबको खारिज करके। ऐसे में बहुत लोगों को अचरज न हो तो क्या हो ?
अलबत्ता यह अचरज तब निर्मूल साबित होता है जब हम देखते हैं कि पार्टी ने महापौर के दावेदारों के लिए जो अघोषित गाइडलाइन्स तय की थी, उसका इंदौर के मामले में अक्षरशः पालन किया गया है। उसके मुताबिक भार्गव न जीते-हारे विधायक हैं न वो परिवारवाद के दायरे में आते हैं और न उनकी उम्र कोई बाधा है। हां, कुछ दिन पहले प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि इंदौर का महापौर प्रत्याशी इंदौर के भविष्य की संकल्पनाओं को साकार करने वाला होगा ! इस कसौटी पर भार्गव को रखें तो फिलहाल कुछ भी कहना मुहाल है। इसके लिए पहले भार्गव को चुनावी परीक्षा पास करनी होगी और फिर वक्त यह तय करेगा। अभी तो यह है कि शहर का बड़ा तबका उनके नाम से ठीक से वाकिफ तक न है। शायद इसीलिए कल शाम से ही उनका प्रभावी लिखित जीवन वृत्त सोशल मीडिया पर दौड़ लगाना शुरू कर चुका है। वहीं पर कुछ वीडियो भी चलने लगे हैं। ध्यान रहे, यह एक बहुत गौरतलब बात है। सो यह कि यह चुनाव सबसे ज्यादा सोशल मीडिया पर ही लड़ा जाएगा ! लगता है यह बात संजय शुक्ला और भार्गव के साथ उनका चुनाव प्रबंधन भी बखूबी समझता है। इसका नमूना देखिए कि कल जैसे ही भार्गव का नाम फायनल होने की खबर फैली, सोशल मीडिया पर एक मीम दौड़ा। उसमें भार्गव का चित्र था और साथ में परेश रावल का यह कहते हुए चित्र कि यह (भार्गव) कौन है ? हम तो इसे जानते तक नहीं ! जवाब में इसी के बाद भार्गव का वो लिखित जीवन वृत्त सोशल मीडिया पर लोगों को देखने को मिला। कहने का मतलब यही कि सिर्फ मैदानी जनसंपर्क से और प्रचार-प्रसार से बात नहीं बनेगी, बल्कि इन दोनों प्रत्याशियों को सोशल मीडिया पर मुकाबले के लिए बहुत मजबूत, बहुत कुशल, बहुत स्मार्ट और बहुत पेशेवर टीम की जरूरत लगेगी। कहने की जरूरत नहीं कि मुकाबला दिलचस्प होगा।
दिलचस्पी की जहां तक बात है तो कल भार्गव का नाम तय होते ही उनकी उम्मीदवारी को लेकर बड़ी दिलचस्प प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक महानुभाव का कहना था कि भाजपा ने बड़े भैया यानी पण्डित विष्णुप्रसाद शुक्ला का एहसान उतार दिया है ! विदित हो कि बड़े भैया ने एक समय शहर में भाजपा को जिंदा और खड़े रखने में हर तरह से बहुत बड़ा योगदान दिया है और इससे शायद ही कोई इनकार करे। जब शहर में भाजपा को लोगों का टोटा था और उसके नामलेवा भी बड़ी मुश्किल से मिलते थे तब बड़े भैया खुद और उनकी टीम झंडे-डंडे के साथ तन, मन और धन से हर मोर्चे पर मुस्तैद मिलती थी। हालांकि उसके बाद नर्मदा में खूब पानी बह गया है।
भार्गव की उम्मीदवारी को लेकर दूसरी दिलचस्प प्रतिक्रिया यह है कि भार्गव को मुकाबले में उतारकर भाजपा ने खुद से ज्यादा कांग्रेस पर भरोसा दिखाया है ! यह बहुत मजेदार प्रतिक्रिया है। उससे भी आगे कांग्रेस पर गहरा तंज कि भाजपा ने कांग्रेस के संजय शुक्ला जैसे पूर्व पार्षद और वर्तमान विधायक के साथ हर तरह से बहुत सक्षम उम्मीदवार के सामने एक अनजान से और चुनावी लड़ाई के मान से नौसिखिया जैसे भार्गव को मैदान में उतारा है और फिर भी उसे पूरा यकीन है कि कांग्रेस यह चुनाव नहीं जीतने वाली ! दरअसल इसमें कोई शक नहीं कि इस चुनाव में भार्गव से ज्यादा भाजपा, संघ और भाजपा का संगठन मैदान पकड़ेगा। संघ इसलिए कि भार्गव को संघ का उम्मीदवार माना गया है और सूत्र बताते हैं कि भार्गव के तार संघ के एक बहुत बड़े और ताकतवर पदाधिकारी से जुड़े हुए हैं। अलबत्ता इस दिलचस्प दूसरी प्रतिक्रिया का एक दीगर पहलू यह है कि हकीकतन भाजपा को खुद से ज्यादा अपने प्रतिबध्द मतदाताओं और शहर की जनता पर भरोसा है कि वो उसके फैसले पर ही मुहर लगाएगी ! किसी-किसी फैसले पर यह बात मुनासिब हो सकती है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल अपने हर फैसले पर ऐसा भरोसा जताए तो यह जनता के विवेक पर बड़ा सवाल नहीं ? यह जनता को तय करना होगा। खैर।
भार्गव की उम्मीदवारी पर इस नाचीज की पहली प्रतिक्रिया यही है कि चुनावी मुकाबले में अब संजय शुक्ला को वैसा खारिज नहीं कर सकते जैसा कि रमेश मेंदोला या मालिनी लक्ष्मणसिंह उम्मीदवार होते तब करते। गोया यह मुकाबला अब किसी के लिए भी बिलकुल एकतरफा नहीं है और दोनों उम्मीदवारों के लिए लगभग सम पर माना जाना चाहिए। चूंकि भाजपा बूथ से लेकर संगठन तक कांग्रेस पर बहुत मजबूत है सो कहने की जरूरत न कि मुकाबले को अपने पक्ष में करने के लिए भार्गव की बनिस्बत संजय को कहीं ज्यादा मेहनत और दम दिखाना होगा। बेशक भार्गव कानून के जानकार और न्याय क्षेत्र यानी वकालत से आते हैं और निजी रूप से संजय से किसी सूरत कमजोर उम्मीदवार नहीं हैं, बल्कि उनके पास थोड़ा एज है। अलबत्ता संजय को चुनाव लड़ने का, मैदानी कामकाज का और पार्षद बतौर नगर निगम का तथा विधायक बतौर लोगों की समस्याओं से निपटने-निपटाने व उनके दीगर काम करने का जो अनुभव है, वहां भार्गव उनसे बहुत पीछे हैं। बहरहाल लिखने को और भी बहुत है, लेकिन फैसला जनता को अपनी समझ से करना है और उसमें अभी बहुत समय है। कामना यही है कि चुनाव अच्छा और दिलचस्प हो न कि आपसी मनमुटाव या मन खराब करने वाला। दोनों ब्राह्मणों को इस नाचीज ब्राह्मण की हार्दिक शुभकामनाएं !
-चंद्रशेखर शर्मा