डॉ. विकास मानव
क्या घर में रह कर निराशा भरा स्वीकार अध्यात्म है? इस पर बार बार सोचने की आवश्यकता है। यदि हम आध्यात्म और सांसारिक विवेक को साथ मिला लें तो बात बहुत आसान हो जायेगी। किंतु कोई यदि शास्त्रों के बिना भी देखना चाहे तो वह बात हटा कर भी देख सकता है।
हम देखते हैं कि तक़रीबन लोग कहते हैं कि मैं घर में सबके लिये इतना करता हूँ या करती हूँ किंतु उसकी कोई कद्र नहीं। मेरे प्रेम को कोई भी समझता नहीं। और इसी उदासी के चलते किसी ऐसे को पाने की इच्छा बनी रहती है जो बिना शर्त प्रेम करे। यहाँ बिना शर्त के प्रेम को हम समझें तो बात अपने ऊपर ही आ जाती है।
यदि हमारी घर में कोई माँग ही नहीं यहाँ तक कि यह अपेक्षा भी गिरा दें कि कोई हमारा प्रेम बस जान ले तो क्या भीतर भी हम शिकायत के बिना होते हैं। जब हम बाहर प्रेम , अपनापन दिखाते हैं, मुस्कुराते हैं तो क्या भीतर भी उतना ही हल्का महसूस कर रहे होते हैं? मान लीजिये आपका पुत्र अपनी मर्ज़ी से विवाह करना चाहता है या नौकरी नहीं कर रहा या फ़िर आपके माता पिता अपनी मर्ज़ी से आपके फ़ैसले लेते हैं तो एक अच्छे मनुष्य की तरह हम बाहरी तौर पर तो सब स्वीकार करते हैं तो क्या भीतर भी वैसे ही प्रफुल्ल रहते हैं?असली बात यही है।
हमारी भावना ; कैसी हैं हमारी भावनायें? वही यात्रा करती हैं। इसीलिये सब कुछ कर गुज़रने के बाद कोई कहीं ख़ुश नज़र नहीं आता।
—- —- अब इसमें थोड़ा शास्त्र जोड़ लेते हैं। संत कहते हैं कि परमात्मा अकेला था और उस ने खुद को एक से अनेक बनाया। वह अकेला ही है और अनेक बना कर प्रसन्न होता है।
दूसरी बात कही जाती है कि हम परमात्मा ही हैं और हमारा स्वभाव भी अकेला रहना ही है किंतु मनुष्य अकेला नहीं रह सकता और इस अकेलेपन को दूर करने के लिये वह एक से अनेक होता है।
परिवार बनाता है, मित्र बनाता है। तो जब हमें पता है कि हम अकेले नहीं रह सकते तो फ़िर जो हमने बनाया है उसकी कद्र क्यूँ नहीं करते? क्यूँ शिकायतों से ही भरे रहते हैं। जो जैसा है वैसा ही स्वीकार कर अपनी ज़िम्मेदारी स्वयं क्यू नहीं उठाते? क्यूँ बैसाखियों के सहारे चलते हैं। रिश्ते बनाये, उनको नाम दिये; यहाँ तक तो ठीक है किंतु इन रिश्तों के साथ हज़ारों शर्तें जोड़ दीं और गलती की कोई गुंजाइश नहीं।
बाहर चेहरे पर स्वागत और भीतर कड़वाहट , निराशा, उदासी; ऐसा क्यूँ है? हमारे अहंकार के कारण। जो भी आये मेरी ज़िंदगी में, उसके गुण मेरे हिसाब से हों और जब सब ही ऐसा सोच रहे हैं तो चारों ओर कोहराम तो मचेगा ही। घर में इतनी कलह , विचारों में इतना मतभेद तो यही स्वभाव का व्यक्ति समाज बनाता है तो समाज में झगड़े ; फ़िर इसी समाज से मुल्क बनता और देशों के बीच में अहंकार की लड़ाई। ईर्ष्या, जलन , प्रतिस्पर्धा यह सब घर से शुरू होते हैं और चारों ओर फैल जाते हैं।
एक एक व्यक्ति स्वयं पर काम करे तो ही शायद कहीं कोई प्रेम की धारा बहे। अन्यथा प्रेम के नाम पर समानार्थी शब्द हैं ज़िम्मेदारी , अधिकार , मेहनत , क्रोध , नियम क़ानून ; लेकिन इन में प्रेम कुछ भी नहीं और प्रेम किया जा ही नहीं सकता, केवल फ़र्ज़ निभाये जा सकते हैं। प्रेम स्वभाव है, अहसास है जो बस जीवन के तनाव के नीचे सदा से है। सदा रहेगा।

