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जातीय भेदभाव एक कड़वी हकीकत है

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वीरेंद्र भदौरिया

      भारतीय समाज ऊपर से भले एक दिखाई देता हो, लेकिन यह कड़वी सच्चाई है कि वह भीतर से धर्म, संप्रदाय, जातियों, उपजातियों व क्षेत्र सहित तमाम तरह के वर्गों व श्रेणियों में बुरी तरह विभाजित है। एससी/एसटी वर्ग के विरुद्ध जाति के आधार पर होने वाले भेदभावपूर्ण व्यवहार व अन्याय से संरक्षण देने के लिए पहले से अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, तथा इस मामले में राष्ट्रीय मतैक्य भी है। नवीन यूजीसी एक्ट में ओबीसी वर्ग को भी बतौर पीड़ित समूह सम्मिलित करने पर सवर्ण जातियों में बड़ी खलबली है, तथा वे विरोधस्वरूप सड़कों पर उतर आए हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल-फिलहाल क्रियान्वयन रोक देने से तात्कालिक रूप से मामला ठंडा पड़ जाएगा,पर इस सवाल पर बहस जारी रहेगी।
     आप सबने यह प्रसिद्ध काव्य पंक्तियां अवश्य सुनी या पढ़ी होंगी, 'घायल की गति घायल जाने,जो कोई घायल होय'। यद्यपि यह पंक्तियां भिन्न संदर्भ में रची गई हैं, तथापि हमारे समाज में जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न के बिंदु पर भी यह सटीक बैठती हैं। जातिगत भेदभाव का दर्द केवल भुक्तभोगी ही जान सकता है।जातीय उच्चता बोध के साथ सवर्ण समुदाय में जन्मे लोगों को इस पीड़ा की वास्तविक अनुभूति कभी नहीं हो पाती है। मुट्ठी भर धीर गंभीर ,समझदार व संवेदनशील लोगों में कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति तो हो सकती है,पर अपवाद स्वरूप परिलक्षित होने वाली ऐसी मेहरबानी को संपूर्ण सवर्ण समाज की मोहब्बत तो नहीं कह सकते हैं।
  ओबीसी वर्ग में शामिल कतिपय जातियां 'पानी पिंगल' वाली मानी जाती हैं, अर्थात सवर्ण समाज के लोग उनके यहां का खाना पानी बेहिचक ग्रहण करते हैं। यह भी सच्चाई है कि दबंग व आर्थिक रूप से समृद्ध ओबीसी वर्ग, एससी एसटी के प्रति व्यवहार में सवर्णों से होड़ करता दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में अनुसूचित जातियों पर अत्याचार के मामलों में अधिकांशतः आरोपी ओबीसी समुदाय के चिन्हित हुए थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि पूरा का पूरा ओबीसी वर्ग जातीय भेदभाव से पूर्णतः मुक्त है, हां डिग्री का फर्क हो सकता है। ओबीसी वर्ग में शामिल जातियों में भी एक दूसरे के प्रति ऊंच नीच का भाव विद्यमान है।
  अनुसूचित जाति जनजाति के प्रति सवर्णों के मन में गहरी पैठी वितृष्णा की एक झलक आप बीती घटना व अपने अनुभव के आधार पर साझा कर रहा हूं।
     लोक सेवा आयोग की राज्य सेवा परीक्षा के माध्यम से ' जिला संयोजक आदिम जाति कल्याण ' के पद पर चयनित होने के बाद मेरी पदस्थापना एकीकृत मध्यप्रदेश के बस्तर जिले (जिसका क्षेत्रफल केरल राज्य से अधिक था) में हुई थी। भारत सरकार के निर्देश पर आदिवासी बहुल जिलों में आदिवासियों की कृषि भूमि के गैर आदिवासियों द्वारा विधि विरुद्ध रूप से होने वाले हस्तांतरणों का सर्वेक्षण होना था, बस्तर जिले में उक्त सर्वेक्षण कार्य का प्रभारी मुझे बनाया गया। युवावस्था के जोशो-खरोश में नमूना सर्वे में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेने का परिणाम यह हुआ कि जगदलपुर बस्तर के ऐसे अनेकानेक बड़े बड़े रईस, ठेकेदार व वन माफिया चपेट में आ गए, जिन्होंने अबोध आदिवासियों की हजारों एकड़ भूमि ( जिनमें सागौन के लाखों पेड़ थे) हड़प रखी थी,ये बहुत ताकतवर व रसूखदार लोग थे, जिले की राजनीति इनके इशारे पर चलती थी। पहले दबाव फिर धमकी से काम नहीं बना तो हत्या का षड़यंत्र रचा जाने लगा। तत्कालीन कलेक्टर आर.परशुराम साहब ( जो बाद में मध्यप्रदेश के चीफ सेक्रेटरी हुए) ने मुझे बुला कर बताया कि एलआईवी ( लोकल इंटेलिजेंस विंग) से मिल रही सूचनाओं के अनुसार कभी भी मेरी हत्या हो सकती है, उन्होंने आगाह करते हुए सुरक्षा कारणों से तत्काल बस्तर छोड़ने का निर्देश दिया। बस्तर या आदिवासी बहुल जिलों में पदस्थ अधिकारियों कर्मचारियों के लिए यह नियम था कि अन्यत्र ट्रांसफर होने के बाद भी जब तक उनके स्थान पर पदस्थ होने वाला रिलीवर ज्वाइन न हो जाए तब तक कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता था। सालों से स्थानांतरित अनेक अधिकारी रिलीवर की प्रतीक्षा में अटके रहते थे, इसलिए ट्रांसफर होने पर भी बाहर जाना संभव न था।
 कलेक्टर साहब को यह जानकारी थी कि,पीएससी की उत्तरवर्ती परीक्षा से मेरा चयन विक्रय कर अधिकारी के पद पर हो चुका था,पर मैं बस्तर से जाना नहीं चाहता था, मुझे चुनौतीपूर्ण कार्य में मजा आ रहा था, बिना किसी डर भय के नक्सली क्षेत्रों में चला जाता था। कलेक्टर साहब ने शासन स्तर से प्रयास कर नवीन पद पर मेरी नियुक्ति का आदेश जारी कराने की व्यवस्था कर मुझे सुरक्षा इंतजामों के साथ रायपुर तक पहुंचाया। जिसे दुर्गम व घने जंगलों में भ्रमण के दौरान मिले नक्सलियों ने कभी नुकसान नहीं पहुंचाया उसे भद्र कहे जाने वाले वन माफियाओं के कारण रूचिकर कार्य व सेवा से वंचित होना पड़ा।
        मैं भारी मन से नवीन पदस्थापना इंदौर में ज्वाइन होने के लिए पहुंच गया। वृत्त प्रभारी श्री आर.बी.शर्मा सर की तत्समय अत्यधिक व्यस्तता को देखते हुए मैं अपर विक्रय कर अधिकारी श्री आर.पी.एस.जादौन साहब के कक्ष में दाखिल हो गया, अपना परिचय दिया तो वे बोले कि हां, मुझे मालुम है,तुम्हारा पोस्टिंग आर्डर तुम्हारे आने के पहले यहां पहुंच चुका है। मैं जादौन साहब की टेबल के सामने लगभग दस मिनट तक खड़ा रहा, उनके बेहद रूखे व अभद्र व्यवहार और कुर्सी में बैठने तक के लिए न कहे जाने पर मुझे ताज्जुब होने के साथ बहुत ठेस व पीड़ा पहुंची। लगा कि कहां बस्तर में कलेक्टर व कमिश्नर जैसे वरिष्ठ अधिकारियों से मिली मान्यता व अपनत्व और कहां समकक्ष अधिकारी का दुर्व्यवहार। खैर फ्री होते ही शर्मा साहब ने मुझे बुला लिया, उनके स्नेहपूर्ण व्यवहार से मेरा मनो मालिन्य कुछ कम हुआ।
   काफी समय तक जादौन साहब से मैंने दूरी बनाए रखी‌। पूरी छानबीन के बाद जब जादौन साहब को यह पक्का भरोसा हो गया कि मैं क्षत्रिय जाति का हूं,तब उनका व्यवहार एकदम बदल गया। एक दिन वे खुद चलकर मेरे कक्ष में आए और सारी बोलते हुए कहा कि," दर असल आप चूंकि बस्तर से आए थे तो मुझे लगा कि होगा कोई रिजर्व क्लास वाला हरिजन आदिवासी, इसलिए मैंने आपको तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा,अब आप मेरे छोटे भाई की तरह हो,हम आप दोनों ही ठाकुर जाति के हैं, इसलिए उस बात को भूल जाओ"।
    लेकिन मैं वह दिन कभी नहीं भूल सका, जब मुझे सवर्णों की मानसिकता व अनुसूचित जाति जनजातियों के प्रति घृणा का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। सामान्यतः  उपनाम से जाति का पता चल जाता है,तब भी केवल आदिवासी बहुल जिले से आने मात्र से विपरीत अनुमान लगा कर श्र ठाकुर साहब ने अपने भीतर की घृणा उड़ेल दी। 
  यह कहानी नहीं,सत्य घटना है, सभी पात्र जीवित हैं, आसानी से पुष्टि की जा सकती है। और हां यह भी बताए देता हूं कि,जिस नमूना सर्वे के कारण बस्तर छोड़ना पड़ा, वह बाद में एक बड़े घोटाले के रूप में सामने आया तथा " बस्तर का मालिक मकबूजा कांड " के नाम से लंबे समय तक चर्चा में रहा, इसमें अनेक छोटे बड़े अधिकारी फंसे और किताबें लिखी गईं। भूमाफियाओं के खिलाफ तत्परता पूर्वक कार्यवाही करने से कलेक्टर सुनील टंडन साहब सरकार के कोप भाजन बने और अंततः मोहभंग होने से उन्होंने आईएएस की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया।
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