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बंधन और मुक्ति का कारण

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डॉ. गीता शुक्ला

     _जीव के लिये कोई वास्तविक सुख दुःख नहीं है | सुख-दु:ख मन का धर्म है | जन्म मरण शरीर का धर्म है | मन में सुख दु:ख होने पर जीव कल्पना करती है कि मुझे दु:ख होता है |_

      मन पर हुए सुख दु:ख का आरोप अज्ञान से जीव अपने पर करती है | जीव में आसक्ति के कारण सुख दु:ख का भास होता है | जीव स्फटिक मणि जैसे श्वेत एवं शुद्ध है |

      उसमें विषयों का प्रतिबिंब पढ़ने से मन के कारण जीव मानती है कि मुझे दु:ख सुख हुआ है | स्फटिक मणि के पीछे जिस रंग का फूल रखोगे वैसा ही वह दिखेगा | वह रंग स्फटिक का नहीं ,फुल का ही है |  स्फटीक मणि श्वेत है |

    उसके पीछे लाल गुलाब का फूल रखेंगे तो वह लाल दिखेगा | गुलाब के संसर्ग से वह लाल हो जाता है |

 जल में चंद्रमा का प्रतिबिम्ब पड़ता है | जल की हलचल के कारण वह प्रतिबिम्ब भी हलचल करता है, कम्पित होता है ,किंतु वास्तविक चंद्रमा पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता |

      इसी तरह देहादि के धर्म, स्वयं में न होते हुए भी जीव उन्हें अपने में कल्पित कर लेता है, अन्यथा जीव तो निर्लेप है | जीव साक्षी रुप बन कर देहादी के धर्म को आशक्तिरहीत भाव का अनुसरण करते हुए मोक्ष प्राप्त कर सकता है |

       संसार के विषयों से सभी प्रकार हटा हुआ मन जीव में लीन होता है | जब मन निर्विषय होता है तभी वहां आनंद रूप होता है |

       मन जैसा कपटी और जीव जैसा भोला और कोई नहीं है |

        दूसरों के लिये कुछ करना पड़े तो तकलीफ सी होती है ,परंतु अपनों के लिये करना हो तो आनंद होता है | जबकि तकलीफ दोनों कार्य में बराबर होता है |

       _यह सब मन का खेल है | मन बड़ा कपटी है | मेरा और तेरा का खेल इस मन ने ही रचा है | सचमुच मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है |_

     {चेतना विकास मिशन)

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