7 नवम्बर: 90 वें जन्मदिवस प्रसंग पर विशेष स्मरण
कुमार सिद्धार्थ
हिंदी कविता के परिदृश्य में चंद्रकांत देवताले उन कवियों में गिने जाते हैं जिनके यहाँ कविता जीवन के यथार्थ
से चली आती है। वह जीवन जिसमें भूख है, श्रम है, थकावट है, स्मृतियाँ हैं, प्रेम है और मनुष्य होने की
अनिवार्य पीड़ा भी। वे कविता को सजावट नहीं, बल्कि जगह लेने वाला जीवन-सत्य मानते थे। इसलिए
उनकी कविताएँ हमें सीधे भीतर संबोधित करती हैं, जैसे कोई शांत स्वर धीरे-से कहे—“देखो, दुनिया को, जो
छूट रही है।”
गाँव से आया वह स्वर, जो शहर में खोया नहीं
चंद्रकांत देवताले का जन्म 7 नवम्बर 1936 को मध्यप्रदेश के मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के जौलखेड़ा गाँव में
हुआ। गाँव उनके लिए सिर्फ जन्मभूमि नहीं था; वह कविता की मिट्टी, उसकी गंध और उसकी सांस था। खेत,
पगडंडियाँ, घरों की धुँधली रोशनियाँ और काम से थके श्रमिकों के चेहरे—ये उनकी कविता में स्मृतियों की
तरह नहीं, बल्कि जीवित अनुभव की तरह दर्ज हैं।
हिंदी में एम ए करने के बाद उन्होंने मुक्तिबोध पर पी एच डी की थी। उच्च शिक्षा के बाद वे इंदौर, उज्जैन, रतलाम
के साहित्यिक परिवेश से जुड़े। इंदौर के सरकारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक रहते हुए उनका
कक्ष-संबंध केवल विषय को पढ़ाने का नहीं था। वे विद्यार्थियों से पूछा करते“किस बात की आग है तुम्हारे
भीतर?” यह प्रश्न जीवन और मनुष्यता के प्रश्न थे। वे चाहते थे कि युवा अपने समय को सिर्फ देखकर नहीं,
पहचानकर जिएँ।
कविता और सामाजिक चेतना
देवतालेजी की कविता में एक सीधी, बिना लाग-लपेट की भाषा है। वे अलंकार, भारी शब्दावली या जटिल
संरचना पर भरोसा नहीं करते। उनकी कविता में भूख आँकड़ा नहीं रहती, वह एक चेहरा, एक देह, एक न बोल
सकने वाली करुण पुकार बन जाती है—“मैं उस सड़क पर चलता हूँ/ जहाँ भूख अपने आँसू चाटती है।” यह
केवल दृश्य का वर्णन नहीं, बल्कि जीवन का दाह है।
उनकी कविताओं में स्त्री भी आती है—पर वह किसी भाव-भक्ति की मूर्ति बनकर नहीं, बल्कि संघर्ष और
थकान से भरी मनुष्य की देह के रूप में। उनकी काव्य-दृष्टि किसी पर दया नहीं करती; वह बराबरी का हाथ
बढ़ाती है।
देवताले जी की संपूर्ण काव्य-यात्रा सामाजिक चेतना की यात्रा है। वे किसी भी रूप में अन्याय को स्वीकार
करने वालों में नहीं थे। उनकी किताबें— “हड्डियों में छिपा ज्वर” (1973), “दीवारों पर खून से” (1975),
“लकड़बग्घा हँस रहा है” (1980), “रोशनी के मैदान की तरफ़” (1982), “आग हर चीज़ में बताई गई थी”
(1987), “पत्थर की बैंच” (1996), और “इतनी पत्थर रोशनी” (2002), “पत्थर फेंक रहा हूँ मैं” (2010) और
“उजाड़ में संग्रहालय” (2003) जैसी रचनाएँ— सिर्फ साहित्यिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, बल्कि हमारे समय के
दस्तावेज़ भी हैं।
उनकी बहुचर्चित कविता ‘आकाश की जात’ हिंदी कविता में एक ऊँचा पड़ाव है। यह कविता दरअसल सत्ता,
समाज और विश्वास के जड़ बनते ढाँचे पर तीखा सवाल है— आख़िर आकाश की जात क्या है? किस वर्ग,
किस धर्म, किस सत्ता ने इसे बाँट रखा है? यह प्रश्न डर पैदा करता है। आकाश यदि सबका है तो मनुष्य क्यों
बँटा और बाँटा गया? यह प्रश्न कविता में उठाना ही प्रतिरोध का आरंभ है। और देवताले इसे इस तरह कहते हैं
कि पाठक बचकर नहीं जा सकता।
व्यक्तित्व : शांत स्वर, भीतर बेचैनी
देवतालेजी बातचीत में हमेशा सरल और संयत रहते थे। उनके भीतर कोई शोर नहीं था, लेकिन अन्याय के
विरुद्ध एक धीमी, सघन आग थी। मैंने देवतालेजी के अवसान पर अपने स्मृतिलेख में लिखा था “वे जब भी
मिलते थे, हमेशा कुछ खोजने और समझने की बेचैनी साथ लाते थे। उनका साथ स्थिरता नहीं बल्कि
जिज्ञासा और बेचैनी देता था।” यही बेचैनी उनकी कविता की जान है। मेरा सौभाग्य रहा कि मैं देवताले जी
का लगभग दो दशक सान्निध्य और आत्मीयमा प्राप्त हुई। इंदौर/ उज्जैन में कार्य के दौरान उनकी गहरी
नजदीकियां मिली, परिवार का अगाध स्नेह मिला। आज उनकी सीखें हमें लेखन कर्म में लगातार प्रेरणा देती
है।
देवतालेजी एक तरफ जन-समस्याओं के कवि रहे हैं, तो दूसरी ओर उनकी कविताओं में गहन निजी स्वप्न और
स्मृतियाँ भी हैं। वे माँ को याद करते हैं, पिता की थकान देखते हैं, बेटी को आशीष देते है, प्रेम को छूते हैं, और
फिर लौटकर दुनिया को देखते हैं। उनकी संवेदना कभी भी केवल निजी नहीं रहती—वह हमेशा विश्व में
फैलती है।
युवाओं के साथ उनका संवाद खुला और आत्मीय था। उनका स्वभाव युवाओं के साथ अधिक जंचता था।
इंदौर, उज्जैन, रतलाम में साहित्यिक वातावरण में उनके साथ रहने वाले कई युवाओं को सान्न्ध्यि और स्नेह
प्राप्त हुआ। उनमें आशुतोष दुबे, रवींद्र व्यास, विनीत तिवारी, सुशोभित शक्तावत, आशीष दशोत्तर, पंकज
शुक्ला, अरूण आदित्य, नीलोत्पल, कुमार अंबुज, पवन करण, अनिल करमेले, आशीष त्रिपाठी जैसे नाम
उल्लेखनीय है। कई अवसरों पर महसूस/ अनुभव हुआ कि उनके भीतर न्याय के लिए बेचैनी, अमानवीयता के
प्रति क्रोध, और मनुष्य के लिए अथाह गर्माहट थी। अनेक साथी अक्सर कहते हैं कि उनके साथ बैठना
स्थिरता नहीं, सोचने और बदलने की बेचैनी देता था। वे जीवन और कविता को अलग नहीं मानते थे। उनके
लिए कविता मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की ज़मीन थी।
देवताले की कविताओं ने हिंदी संसार में एक गहरी दस्तक दी। वे स्थूलता में विश्वास नहीं रखते थे। उनकी दृष्टि
सदा उस बारीक धूल को पकड़ने का प्रयास करती रही, जो हमारे समय और समाज को चुपचाप ढँकती जाती
है। डॉ. जयकुमार ‘जलज’, डॉ. हरीश पाठक, रमाकुमार तिवारी जैसे उनके स्नेही स्मरणों में भी यह बात बार-
बार आती है कि देवताले जी न सिर्फ एक बड़े कवि थे बल्कि एक बेहद आत्मीय, संवेदनशील और सहज मनुष्य
भी।
घर की स्मृतियों से दुनिया की ओर
देवतालेजी की कविताओं में माँ आती है, पिता आते हैं, बेटी आती है—लेकिन वे निजी स्मृति बनकर नहीं
ठहरते। वे जीवन की सार्वभौमिक अनुभूति का हिस्सा बन जाते हैं। वे लिखते हैं—“कविता लिखते हुए/ मैं
पृथ्वी के सबसे दुखी मनुष्य के साथ खड़ा होता हूँ।” यह सिर्फ कवि का कथन नहीं, उनकी काव्य-नैतिकता है।
आज उन्हें याद करना क्यों महत्वपूर्ण है?
हम ऐसे समय में हैं— जहाँ संवेदना की जगह कम होती जा रही है, जहाँ मनुष्य की पीड़ा अक्सर अदृश्य कर दी
जाती है, और जहाँ भाषा धीरे-धीरे बाजार और तमाशे में बदल रही है। ऐसे समय में चंद्रकांत देवताले की
कविता हमें याद दिलाती है कि— कविता सिर्फ पढ़ने की चीज़ नहीं, जीने की चीज़ है। वे हमें अपनी चुप्पी पर
संदेह करना सिखाते हैं। वे बताते हैं कि अगर हम मनुष्य की ओर नहीं हैं, तो हम जीवन की ओर नहीं हैं।
चंद्रकांत देवताले को याद करना केवल कवि को याद करना नहीं है। उन्हें याद करना उस मनुष्य को बचाना है,
जो हमारे भीतर है और लगातार दबाया जा रहा है। उनकी कविता आज भी कहती है— आकाश सबका है/
मनुष्य भी सबका होना चाहिए। और शायद, यही स्मरण आज सबसे आवश्यक है।
कुमार सिद्धार्थ, पिछले चार दशक से पत्रकारिता और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय है। आप
शिक्षा, पर्यावरण, सामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्न अखबारों में लिखते रहते हैं।

