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*उदारीकरण के विरोध के लिए याद रहेंगे चंद्रशेखर*

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समाजवादी आंदोलन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को यह बड़ा अजीब, साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण लगता रहा है कि उदारीकरण के विरोध पर चंद्रशेखर का कई बुद्धिजीवियों के अलावा देवरस और नानाजी देशमुख के साथ संवाद और सहयोग होता है, लेकिन केवल उसी काम में लगे किशन पटनायक के साथ नहीं। इसके जो भी कारण रहे हों,दोनों में संबंध और सहयोग होता तो उदारीकरण विरोधी संघर्ष में अपेक्षित मजबूती आती। इसके बावजूद चंद्रशेखर का महत्वकम नहीं होता। नेताओं, टिप्पणीकारों और मीडिया ने भले ही उदारीकरण विरोधी नेता के रूप में चंद्रशेखर की पहचान को रेखांकित न किया हो, इतिहास में उनकी महत्ता इसी रूप में अक्षुण्ण और प्रेरणाप्रद रहेगी।

प्रेम सिंह

(यह श्रद्धांजलि चंद्रशेखर के निधन (8 जुलाई 2007) पर लिखी गई थी और कई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर प्रकाशित हुई थी। चंद्रशेखर ने मुख्यधारा राजनीति में उदारीकरण की मार्फत आने वाले नवसाम्राज्यवाद का मुखर और सतत सैद्धांतिक एवं सक्रिय विरोध किया था। आज नवसाम्राज्यवाद के ताबेदार ऐसा जताते हैं मानो राष्ट्रीय आजादी की काया में दांत गड़ाने वाले नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ कोई राजनीतिक/वैचारिक जंग हुई ही नहीं थी। पिछले एक दशक से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ/भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में नवसाम्राज्यवाद लंबी छलांगें लगाता जा रहा है। चंद्रशेखर की 18 वीं पुण्यतिथि पर यह श्रद्धांजलि-लेख नए पाठकों के लिए फिर से जारी किया गया है।)

आज फिर अपना देश स्वराज के सपने को भूल कर ऐसी आर्थिक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा जा रहा है जो अपनी राजनीतिक और सामाजिक आजादी को भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार की ताकतों के पास गिरवी रख देगी। बाजार के रास्ते आ रहे इस नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ अब फिर करने या मरने का वक्त आ गया है।- चंद्रशेखर, 8 अगस्त, 2000

चंद्रशेखर के साथ पूर्व प्रधानमंत्री का विरुद न लगाएं तो भी उनकी शख्यिसत के कई ऐसे पहलू हैं जो उनकी पहचान एक बड़े नेता और संजीदा इंसान के रूप में कराते हैं। बल्कि अगर वे चार माह के लिए प्रधानमंत्री न बने होते, तो उनका कद अपने समकालीन नेताओं में और बडा होता। चंद्रशेखर अब हमारे बीच नहीं हैं। इतिहास ही यह फैसला करता है कि किस नेता की किस रूप में कितनी महत्ता थी। महत्ता के निर्धारण का काम जल्दीबाजी में नहीं हो सकता है। चंद्रशेखर के राजनैतिक विचारों और सरोकारों का निर्माण समाजवादी आंदोलन और विचारधारा के अंतर्गत हुआ था। इसके साथ उन पर गांधी का भी गहरा प्रभाव था।

वे एक अध्ययनशील नेता थे। समाजवादी आंदोलन के महत्वपूर्ण पत्र ‘संघर्ष’ और उसके बाद हिंदी और अंग्रेजी में ‘यंग इडियन’ का संपादन किया। आपातकाल में जेल में रहते हुए उन्होंने ‘मेरी जेल डायरी’ लिखी जो दो भागों में प्रकाशित है। उनकी आत्मकथा ‘जिंदगी का कारवां’ के अलावाउनके विचारों और साक्षात्कारों की कई पुस्तकें राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हैं। हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के कई प्रतिष्ठित लेखकों और पत्रकारों के साथ उनका घनिष्ट संबंध था। चंद्रशेखर जेपी, लोहिया, आचार्य नरेंद्रदेव और किशन पटनायक जैसे सिद्धांतकार नेता नहीं थे। वे समाजवादी विचारधारा के दायरे में व्यावहारिक राजनीति करने वाले एक तेजतर्रार नेता थे, जिनके साथ युवा तुर्क का विशेषण स्थायी हो गया था। हालांकि लंबे राजनैतिक जीवन में एक नेता, लेखक व संपादक के रूप में व्यक्त उनके विचार इस मायने में ध्यान खीचने वाले हैं कि उनकी दृष्टि एक पल के लिए भी गरीब और वंचित आबादी के हितों और सरोकरों से नहीं हटती।

चंद्रशेखर के देहावसान के अगले दिन दिल्ली से प्रकाशित होने वाले हिंदी और अंग्रेजी के सभी अखबारों में उनके निजी और सार्वजनिक जीवन व शख्सियत के बारे में कई नेताओं और पत्रकारों के कथन और टिप्पणियां प्रकाशित हुए। उनमें समाजवादी नेता और श्रेष्ठ सांसद के रूप में लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता में अडिग आस्था के साथ ही उनके निर्भय, बेबाक और दरियादिल व्यक्तित्व की सराहना की गई है। यह सब सही है लेकिन एक-एक पंक्ति को ध्यान से पढ़ने पर भी कहीं यह लिखा नहीं मिलता कि चंद्रशेखर उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के धुर विरोधी नेता थे। उन पत्रकारों ने भी चंद्रशेखर की नवउदारवाद विरोधी पहचान को नहीं उभारा जो उनक करीबी रहे हैं और जिन्होंने उनके विचारों साक्षात्कारों और आत्मकथा के संकलन-संपादन का महत्वपूर्ण काम किया है। केवल जनेश्वर मिश्र ने दैनिक भास्कर में अपनी टिप्पणी में इतना लिखा है कि चंद्रशेखर ‘विदेशी पूंजी की गुलामी के विरोधी थे।’ ऐसे में मीडिया ने अपनी तरफ से उनके उदारीकरण विरोधी विचारों और भूमिका की सूचना नहीं दी तो उसे ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता।

मरणोरांत चंद्रशेखर की जिन खूबियों और उपलब्धियों का स्मरण किया गया है वे कम या ज्यादा ज्यादा मुख्यधारा के कुछ अन्य नेताओं में भी मिल सकती हैं। लेकिन मुख्यधारा राजनीति में, वामपंथी पार्टियों से अलग, वे अकेले ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने शुरू से ही नई आर्थिक नीतियों का संसद और संसद के बाहर मुखर विरोध किया। वामपंथियों से अलग इस रूप में कि वे गांधी के आर्थिक दर्शन को विकल्प के तौर पर स्वीकार करते हैं :“महात्मा गांधी ने स्वदेशी और स्वावलंबन का जो नारा लगाया था, वह मात्र नारा नहीं था, वह एक आर्थिक जीवन दर्शन था जिसके जरिए अपना विकास किया जा सकता है।”

अपने अल्पकालिक प्रधानमंत्रित्व में भी उन्होंने उदारीकरण का कड़ा विरोध किया। विश्व बैंक के उपसभापति जब उनके कार्यकाल में भारत आए तो चंद्रशेखर ने उनसे स्पष्ट कहा कि “आप लोग जो बाजार की अर्थव्यवस्था चला रहे हैं उसमें बहुत थोड़े लोग आते हैं। याद रखिएवे ही राष्ट्र नहीं है।” विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विदेशी निवेश, विदेशी मुद्रा आदि के भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का उन्होंने खुलासा और विरोध किया। नवउदारवादियों द्वारा फैलाई जाने वाली भ्रांत धारणाओं के प्रति भी उन्होंने लोगों को सचेत किया। एक बार संसद में बतौर वित्तमंत्री मनमोहन सिंह या किसी अन्य कांग्रेसी नेता द्वारा नई आर्थिक नीतियों के समर्थन में नेहरू को उधृत करने पर चंद्रशेखर ने कड़ी आपत्ति दर्ज की।

डंकल मसौदे के विरोध में चंद्रशेखर ने देश भर में जन-चेतना अभियान चलाया। आरएसएस के सरसंघचालक बालासाहब देवरस के आह्वान पर कुछ समय के लिए वे स्वदेशी जागरण मंच के अभियान में भी शामिल हुए। उदारीकरण के दूसरे चरण को रोकने के लिए सन् 2000 में अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर उन्होंने विकल्प-अभियान की शुरुआत की। लेकिन, उन्हीं के शब्दों में, उससे आंदोलन पैदा होने की आशा पूरी नहीं हुई। एक बार उन्होंने पुरी से पोरबंदर की यात्रा की। एक प्रयास चार पूर्व प्रधानमंत्रियोंको लेकर भी किया गया। कहने का अभिप्राययह है कि चन्द्रशेखर का उदारीकरण की नीतियों का विरोध केवल जबानी नहीं था,उन्होंने उस दिशा में कई ठोस पहल औरप्रयास किए। हालांकि उदारीकरण के खिलाफएक सशक्त आंदोलन खड़ा करने में उन्हेंसफलता नहीं मिली। दरअसल, मुख्यधारा राजनीति में उदारीकरण का सबसे पहलेऔर सबसे मुखर विरोध करने वाले चंद्रशेखरका उन आंदोलनों और आंदोलनकारियों सेरिश्ता नहीं था, जो उदारीकरण और उसकेमार्फत आने वाली नवसाम्राज्यवादी गुलामी का सतत और सच्चा विरोध कर रहे थे। अगर ऐसा होता तो देश की राजनीति की तस्वीर बदल सकती थी।

चंद्रशेखर मुख्यधारा राजनीति के अंतर्गत ही उदारीकरण का विकल्प तलाशते रहे जबकि उसके लिए मुख्यधारा के बरक्स एक वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की जरूरत थी। भारत-यात्रा करने वाले चंद्रशेखर से ज्यादा इस जरूरत को और कौन समझ सकता था। आत्मकथा में ही उन्होंने एकजगह लिखा है : “भारत-यात्रा में पांच मुद्दे थे – उपयुक्त आहार की कमी, पीने के पानीका अभाव, प्राथमिक शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्यसहायता और पांचवा – सामाजिक सदभाव। मैंने सोचा था कि उन मुद्दों पर देश के 350 पिछड़े जिलों में जनजागरण करेंगे। मैंने इसके लिए पार्टी की अध्यक्षता छोड़ कर पूरी तरह इसी काम में लगने का विचार किया था, पर मैं ऐसा नहीं कर सका। यात्रा के बाद ही विपक्ष की राजनीति में फंस गया, वह मेरी भूल थी।”

रामबाहदुर राय द्वारा संपादित पुस्तक ‘रहबरी के सवाल’में भी चंद्रशेखर ने भारत-यात्रा के दौरान बड़ी तादाद में जुटे युवा वर्ग तथा अन्य लोगों को छोड़ कर चुनावी राजनीति में फंस जाने पर अफसोस प्रकट किया है। अपनी उस भूल का सुधार करने की हिम्मत चंद्रशेखर अंत तक नहीं जुटा पाए। जबकि उदारीकरण की गुलाम बन चुकी मुख्यधारा राजनीति के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की दिशा में समाजवादी धारा के ही एक नेता किशन पटनायक कई वरिष्ठ और युवा समाजवादियों के साथ मिल कर ठोस पहल कर चुके थे। किशन पटनायक की तरह अगर चंद्रशेखर भी मुख्यधारा राजनीति से बाहर आकर, जैसाकि वे भारत-यात्रा के समय आए थे, वैकल्पिक राजनीति के निर्माण में जुट जाते तो देश पर नवसाम्राज्यवाद का शिकंजा इस कदर नहीं कसता।

समाजवादी आंदोलन के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को यह बड़ा अजीब, साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण लगता रहा है कि उदारीकरण के विरोध पर चंद्रशेखर का कई बुद्धिजीवियों के अलावा देवरस और नानाजी देशमुख के साथ संवाद और सहयोग होता है, लेकिन केवल उसी काम में लगे किशन पटनायक के साथ नहीं। इसके जो भी कारण रहे हों,दोनों में संबंध और सहयोग होता तो उदारीकरण विरोधी संघर्ष में अपेक्षित मजबूती आती। इसके बावजूद चंद्रशेखर का महत्वकम नहीं होता। नेताओं, टिप्पणीकारों और मीडिया ने भले ही उदारीकरण विरोधी नेता के रूप में चंद्रशेखर की पहचान को रेखांकित न किया हो, इतिहास में उनकी महत्ता इसी रूप में अक्षुण्ण और प्रेरणाप्रद रहेगी।

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