Site icon अग्नि आलोक

 *हॄदय परिवर्तन या परिवर्तित हॄदय?

Share

शशिकांत गुप्ते

आज मैं सीतारामजी से मिलने गया। एक दूसरें की कुशलक्षेम की औपचारिकता के बाद सीतारामजी यह प्रार्थना गाने लगे।
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिये,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए
लीजिये हमको शरण में, हम सदाचारी बनें,
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक वीर व्रत धारी बनें
निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी न करें,
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी न करें
सत्य बोलें, झूठ त्यागें, मेल आपस में करें
दिव्या जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें

मैने बहुत ही आश्चर्य से सीतारामजी को पूछा,क्या आपने अपनी व्यंग्य विधा को त्याग दिया है?
सीतारामजी ने कहा नहीं,व्यंग्य विधा का प्रवाह तो मेरी लेखनी के माध्यम से अनवरत चल रहा है।
मै नास्तिक नहीं हूँ। मुझे ईश्वर पर पूर्ण आस्था है।
मैने कहा आस्था तो होनी ही चाहिए। आस्था शब्द में बहुत शक्ति है।
सीतारामजी ने मुझे चुप रहने का इशारा करते हुए कहा,हरएक मुद्दे पर व्यंग्य करना अच्छा नहीं होता है। आस्था शब्द के उच्चारण में विश्वास झलकता है।
सीतारामजी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा मै ईश्वर से ज्ञान मांग रहा हूँ।
मैने सीतारामजी की बात पर सहमति दर्शाते हुए कहा,बचपन में घर के बड़े बूढ़े भी हमें यही सिखाते थे कि, ईश्वर से हमेशा सद्बुद्धि ही मांगना चाहिए।
सीतारामजी ने कहा, मैने तो यह भी सुना है कि,धरा पर जितनी भी अदालतें हैं, इन सभी अदालतों से ऊपर, एक ऊपरवाले की अदालत भी है? ऊपरवाले की अदालत में सिर्फ न्याय होता है?
सीतारामजी ने बहुत ही गम्भीर होकर कहा,आज ऊपरवाले के अस्थित्व को खोजने के लिए पृथ्वीलोक की अदालतों में मुक़द्दमे चल रहें हैं? यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है?
जो भी हो भगवान पर आस्था होने के कारण मुझे विश्वास हो गया कि कण कण में भगवान है। सभी दिशाओं में भगवान है।
इतना कहकर सीतारामजी बहुत ही गम्भीर होकर गए चुप हो गए।
मैंने बहुत खोद खोद कर गम्भीर होने का कारण पूछा?
सीतारामजी ने बहुत ही मायूस होकर कहा,जब से मैं उक्त भजन गा रहा हूँ। अपनी आस्था प्रकट कर रहा हूँ। मै स्वयं आस्तिक हूँ यह एहसास अंतर्मन में जगा रहा हूँ।
मेरा बेटा ज्ञानेश, मोबाइल पर एक ही भजन सुन रहा है,और पूरे घर को सुना रहा है।
यह भजन संत कबीरसाहब रचित है।
मौको कहाँ ढूंढे है रे बन्दे मैं तो तेरे पास में
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में, ना काशी कैलाश मेें
मौको कहाँ ढूंढे है रे बन्दे मैं तो तेरे पास में
ना मैं जप मे ना मैं तप में, ना मैं व्रत उपवास में
ना मैं क्रियाकर्म में रहता, ना ही योग सन्यास
मौकोे कहाँ ढूंढे है रे बन्दे मैं तो तेरे पास में

नहीं प्राण में नहीं पिण्ड में, ना ब्रह्मांड आकाश में
ना मैं भृकुटी भंवर गुफा में, सब श्वासन की श्वास में
मौको कहाँ ढूंढे है रे बन्दे मैं तो तेरे पास में
खोजि होय तो तुरंत मिलि हौं, पल भर की तलाश में
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, मैं तो हूं विश्वास में
मौको कहाँ ढूंढे है रे बन्दे मैं तो तेरे पास में

यह भजन सुनकर तो मैं भी भावविभोर हो गया। मैने कहा ज्ञानेश आप जैसे व्यंग्यकार का ही बेटा है।
सीतारामजी कहने लगे आप जो भी आशय निकालो।
मै तो यह सोचकर हैरान हूँ कि, कबीरसाहब जैसे संत आठ सौ वर्ष पूर्व भी निर्भीक होकर इस तरह लिख लेतें थे। संत कबीरसाहब लिखतें नहीं थे। वे तो बेबाक होकर गाते हुए भ्रमण करते रहतें थे।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Exit mobile version