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साल बदला,नहीं बदले आमजन के सवाल?

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी नववर्ष की शुभकामनाएं देने के लिए मेरे घर पधारे।
शुभकामनाओं के आदान प्रदान के बाद सीतारामजी अपनी व्यंग्यकार की मानसिकता में आ गए। कहने लगे आज मुझे सन 1956 में प्रदर्शित फ़िल्म शरिन फरहाद के गीत का मुखड़ा याद आया। यह गीत लिखा है शायर ,तनवीर नकवीजी ने।
गीत की ये पंक्तियाँ याद आने का मुख्य कारण है। आठ वर्ष पूर्व देश के सत्तर वर्ष के इतिहास पर प्रश्न उपस्थित किया गया?
गीत की पंक्तियाँ हैं।
गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दुबारा
हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा

हाफ़िज़ का हिंदी में शाब्दिक अर्थ होता है, रक्षक,और जो धर्मग्रंथ को गहराई से समझता हो।
वर्तमान में यही हो रहा है। आमजन का भगवान ही रक्षक है।
आठ वर्ष पूर्व आमजन, विज्ञापनों के प्रलोभनों में आ गया,कारण उसे उम्मीद जागी थी कि,अच्छेदिन आएंगे?
आमजन की उम्मीद मतलब भरोसा इस कहावत की तरह टूट गया, उम्मीद की भैंस ने पाडे को जन्म दिया।
मैंने सीतारामजी को बीच में टोकते हुए कहा, यह कहावत मानव के स्वार्थी होने को प्रमाणित करती है।
कारण मानव स्वयं पुरुष प्रधान मानसिकता का पक्षधर होता है। स्वयं के घर पुत्र जन्म ले तो वह कुलदीपक होता है,और यदि एक मूक पशु बेचारी भैस यदि नर बच्चें को जन्म दे तो वह अभिषाप समझा जाता है।
तात्पर्य मानव में दोहन करने की मानसिकता विद्यमान है।
दोहन से मतलब शोषण करने की प्रवृत्ति विद्यमान है।
सीतारामजी ने मुझ से कहा आप सच कह रहें हैं।
धूर्त मानव भोले भाले आमजनों का मानसिक,आर्थिक और शारीरिक शोषण करता ही है।
मानसिक शोषण झूठे वादें देकर, शारीरक शोषण आमजन पर उसकी शारीरिक क्षमता से अधिक कार्य का बोझ लाद कर,आमजन को वाज़िब मानधन देने के बजाए उसके नियत पारिश्रमिक में भी कटौती कर शोषण किया जाता है,और आर्थिक शोषण आसमान छूती महंगाई और महंगी चिकित्सा,शिक्षा के कारण हो रहा है।
आमजन कितना ध्येर्य रखें?
इस सवाल का जवाब शायर
लुफ्तर्रहमान रचित इस शेर में समाहित है।
किस से उम्मीद करें, कोई इलाज-ए-दिल की
चारागर भी तो बहुत दर्द का मारा निकला

चारागर का शाब्दिक अर्थ होता है। चिकित्सक, उपचारक।
जब हक़ीम ही स्वयं बीमार होतो मरीज़ का ईलाज कौन करेगा?
वर्तमान हक़ीम की बीमारी मानसिक है। यह बीमारी व्यक्ति पूजक मानसिकता से ग्रस्त मानव से पीड़ित करती है,और ऐसे मानव में गुरुर आ जाता है।
व्यक्ति पूजक मानसिकता अधिनायकवाद की पक्षधर होती है। अधिनायकवादी मानसिकता मतलब तानाशाही प्रवृत्ति ही तो है।
सीतारामजी ने अंत में कहा निराश होने की आवश्यकता नहीं है।
शायर नईम अख़्तरजी का यह शेर मौजु है।
एक जरा इंतजार करो
सब्र जीतेगा जुल्म हारेगा

निश्चित ही जुल्म हारता ही है, इतिहास साक्षी है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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