(एक दीर्घ व्यंग्य लेख)
-तेजपाल सिंह ‘तेज’
संदर्भ हेतु बतादूं कि प्रस्तुत लेख यूट्यूब चैनल “लोक हित” के पत्रकार ‘नवीन कुमार’ के (https://youtu.be/XmEa7VlkVF0?si=Z8Fiwz43l8BFMKtv ) एक (वीडियो पर आधारित है। जिसमें परोसी गई पाठ्य सामग्री को थोड़ा विस्तार देते हुए इस प्रकार से प्रस्तुत किया गया है, ताकि पाठकों को विषय-वस्तु को समझने में कुछ न कुछ आसानी हो।
नाम का जादू और ज़माने की भूल:
कभी शेक्सपीयर ने लिखा था — “नाम में क्या रखा है? जिसे गुलाब कहते हैं, वह किसी और नाम से भी उतना ही सुगंधित रहेगा।” पर शेक्सपीयर आज के भारत में होते, तो शायद अपनी इस पंक्ति पर पछता रहे होते। क्योंकि हमारे यहाँ नाम में ही सब कुछ रखा है — पहचान भी, सम्मान भी, इतिहास भी, और राजनीति भी। आज हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ नाम बदलने का शोर, समस्याओं की सच्चाई को दबाने का सबसे सस्ता तरीका बन गया है। कहीं शहरों के नाम बदले जा रहे हैं, कहीं नदियों के, कहीं स्टेशनों के, और कभी-कभी पूरे देश के नाम
पर ही बहस छिड़ जाती है।
ऐसा लगता है, जैसे किसी शब्द के उच्चारण से ही गरीबी मिट जाएगी, बेरोजगारी दूर हो जाएगी, और नागरिकता का गौरव लौट आएगा। यह वह समय है जब देश की असली समस्याओं —भूख, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान, स्त्री सुरक्षा —सबको “नाम बदलो आंदोलन” की चमक ने ढक दिया है। यह वह राजनीति है जो तथ्य नहीं, प्रतीक बेचती है;
जो सुविधा नहीं, भ्रम पैदा करती है। इसलिए यह लेख किसी एक शहर, किसी एक व्यक्ति या किसी एक विचारधारा पर नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर है जो मानती है कि नाम बदलने से नियति बदल जाएगी। और जब नियति को बदलने का यह सरल फार्मूला हाथ लग गया है,
तो भला कौन इसे छोड़ना चाहेगा?
मुख्य लेख: नाम बदलो, देश बदल जाएगा!
(मुख्य भाग पूर्ववत — नीचे पूरा लेख उसी क्रम में प्रस्तुत है ताकि समग्रता बनी रहे।)
कूड़ा घर बनाम स्विट्ज़रलैंड:
हर गली-मोहल्ले का एक कूड़ा घर होता है, जहाँ की दुर्गंध लोकतंत्र की हर बहस को मात दे सकती है। अगर नाम ही सब कुछ है, तो क्यों न उसका नाम बदल दिया जाए? आज से उसे “स्विट्ज़रलैंड” कहिए। फिर देखिए चमत्कार —लोग कूड़े के ढेर पर खड़े होकर सेल्फी लेंगे,
कैप्शन डालेंगे — “Fragrance of Switzerland”। सरकार टिकट लगा दे — “स्विट्ज़रलैंड दर्शन ₹50।” जो जितना सड़ांध भरा इलाका, उतना महँगा टिकट! सफाई पर खर्च नहीं, अब आमदनी होगी। नाम बदलते ही अर्थव्यवस्था की दिशा बदल जाएगी।
नाम बदलो, भावना बदलो:
जब शहरों की दुर्गंध को भी नाम बदलने से सुगंध कहा जा सकता है, तो दिल्ली का नाम बदलने में क्या हर्ज़ है? कोई कहता है — दिल्ली को “इंद्रप्रस्थ” कहो। कहते हैं — “दिल्ली में गौरव नहीं है, उसे पांडवों की राजधानी का सम्मान दो।” दूसरे कहते हैं — “अली नगर” का नाम बदलकर “सीता नगर” रखो। क्योंकि शायद नाम बदलते ही सड़कों पर गड्ढे बंद हो जाएंगे,
पानी की सप्लाई धार्मिक हो जाएगी, और बिजली का बिल भी धर्मनिरपेक्ष हो जाएगा। उत्तर प्रदेश इस अभियान का अग्रदूत बन चुका है। इलाहाबाद से प्रयागराज, मुगलसराय से दीनदयाल उपाध्याय नगर, अहमदनगर से अहिल्या नगर, उस्मानाबाद से धाराशिव —इतना बदलाव कि इतिहास भी पहचान न पाए। बस एक शहर बदला, और मानो पूरा इतिहास शुद्ध हो गया!
अंतिम क्रांति: देश का नाम बदल दो:
अब तो सीधे-सीधे कहो — भारत का नाम अमेरिका रख दो। अब कोई कहे “I am from America” तो गर्व से कहो —“हम भी अमेरिका से हैं, बस spelling अलग है।” और जब ऐसा हो ही रहा है, तो प्रधानमंत्री का नाम महात्मा गांधी रख दो। इतिहास के दोनों छोर मिल जाएंगे। गोडसे को “राष्ट्रभक्त तात्या टोपे” कह दो — अब सब कुछ संतुलित लगने लगेगा। अमित शाह का नाम अलेक्ज़ेंडर द ग्रेट, क्योंकि चुनावी अभियानों में उनकी रणनीति यूनानी सेनापति जैसी ही होती है। कपिल मिश्रा को “कमाल अतातुर्क” बना दो —अगर अतातुर्क से डर लगे, तो “किपलिंग” ही सही। विवेक अग्निहोत्री को “वैन गॉग” घोषित करो —क्योंकि अब पेंटिंग भी प्रचार के रंगों से बनती है। जगत प्रकाश नड्डा को “सैमुअल जॉनसन” कहो —क्योंकि उन्होंने पार्टी शब्दकोश में हर शब्द को नया अर्थ दे दिया है। और बिहार का नाम “ब्रिटेन” रख दो —ताकि वहां की गरीबी भी अंग्रेज़ी में दर्ज हो। मुख्यमंत्री को “किंग चार्ल्स IV” कहो —
क्योंकि नाम सुनते ही सड़कों के गड्ढे भी राजसी महसूस होंगे।
नदी का पुनर्जन्म: यमुना बने यांग्त्ज़े:
अब बारी यमुना की। उसका रंग, उसकी गंध, उसकी स्थिति सबको पता है। लेकिन नाम बदलते ही उसकी आत्मा बदल जाएगी। कहिए — “यमुना नहीं, यांग्त्ज़े!” (“हमारी यमुना नदी वैसी बन जाए जैसी चीन की यांग्त्ज़े नदी है।”) अब उसकी झाग प्रदूषण नहीं, “चीन-जैसी प्रगति” कहलाएगी। और जो मछलियां मरेंगी, उन्हें “नागरिक कर्तव्य निर्वहन” कहा जाएगा।
भूख बने खुशी, गरीब बनें अमीर:
“भूख” — बड़ा असुखद शब्द है। इसे “खुशी” कहिए। अब कोई कहे — “मैं भूखा हूँ”, तो बोलेगा — “मैं खुश हूँ।” सरकार गर्व से रिपोर्ट जारी करेगी — “देश में 40 करोड़ लोग खुश हैं।”
“गरीबी” को “समृद्धि”, “बेरोज़गारी” को “उद्यमिता”, “अन्याय” को “न्याय”, “अत्याचार” को “उत्सव”, और “भ्रष्टाचार” को “विकास” कह दीजिए —सारा राष्ट्र प्रगति कर जाएगा। “झुग्गी” का नाम “व्हाइट हाउस”, “पैसेंजर ट्रेन” का नाम “बुलेट ट्रेन”, “अस्पताल” का नाम “वेलनेस रिट्रीट” —कहते-कहते ही मनोबल बढ़ेगा।
मौतों का देश और नामों का उत्सव:
यह वही देश है जहां कुंभ मेले में लाखों लोग भगदड़ में मारे जाते हैं, सरकार कहती है — “इलाहाबाद अब प्रयागराज हो गया, ताली बजाइए।” दिल्ली में एक साल में 1457 सड़क हादसे, पर संसद में बहस — “दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ हो।” रेल दुर्घटनाएँ, बस आग, भूस्खलन,
हर साल सैकड़ों जानें जाती हैं —लेकिन जब नाम बदलने का प्रस्ताव आता है, तो सदन में तालियाँ बजती हैं। जब मौत से फर्क नहीं पड़ता, तो नाम से ही राष्ट्र गौरव कैसे न आए!
रैंकिंग का राग:
गरीबी सूचकांक में 105वाँ स्थान — कोई बात नहीं, प्रयागराज हो गया। विकास सूचकांक में 130वाँ —कोई बात नहीं, अयोध्या बन गया।प्रेस स्वतंत्रता में 169वाँ —कोई बात नहीं, सीता नगर आ गया। विश्व शांति में 116वाँ —कोई बात नहीं, अहिल्या नगर बन गया।
नाम बदलिए, आंकड़े खुद सिर झुका लेंगे।
तानाशाही और इतिहास की याददाश्त:
हर तानाशाह यही सोचता है कि वह इतिहास को मिटा देगा। वह नाम बदलकर सदी के निशान मिटाने की कोशिश करता है। पर इतिहास बहुत क्रूर होता है —वह सब याद रखता है।
नाम बदलने से न ज़मीन बदलती है, न दर्द। बस, स्मृति का भ्रम फैल जाता है। इतिहास देर से आता है, पर आता ज़रूर है — और जब आता है, तो सबसे पहले झूठ बोलने वालों की मूर्तियाँ गिराता है।
नाम बदलो क्रांति के नए प्रस्ताव:
अब सरकार के लिए कुछ मुफ्त सलाह–
1. राशन कार्ड को “गोल्ड कार्ड” कहो — गरीबी का अहसास भी प्रतिष्ठा में बदल जाएगा।
2. आँगनवाड़ी को “किड्स इनोवेशन सेंटर” कहो — बच्चे अब भी भूखे रहेंगे, पर अभिभावक खुश रहेंगे।
3. थाना को “जनसहयोग केंद्र” कहो — शिकायतकर्ता को लगेगा, पुलिस नहीं, मित्र हैं।
4. संसद भवन को “राष्ट्र मंदिर” कहो — वहाँ बहसें नहीं, आरतियाँ होंगी।
5. रेल मंत्रालय को “स्वप्न परिवहन विभाग” — जहाँ हर योजना सिर्फ सपनों में पूरी होगी।
सारांश : जब नाम का मुखौटा उतरता है:
किसी भी सभ्यता का पतन तब नहीं होता जब उसके भवन गिरते हैं, बल्कि तब होता है जब उसकी बुद्धि उपहास का उपकरण बन जाती है। आज भारत में बुद्धिजीवी और मूर्ख के बीच की रेखा मिट चुकी है। जो नाम बदलने का विरोध करे, वह “देशद्रोही”; जो समर्थन करे, वह “संस्कारी”। इतनी सरलता से हमने इतिहास की जटिलता को मिटा दिया है। हम यह भूल गए हैं कि नाम बदलना परिवर्तन नहीं, पलायन है। यह सच्चाई से भागने का तरीका है। यह उस समाज का प्रतिबिंब है जो दिखावे को विकास समझ बैठा है।अगर नाम बदलने से भूख मिटती, तो हर गरीब आज “अमीरनगर” में रहता। अगर नाम बदलने से बेरोजगारी मिटती, तो हर नौजवान “उद्योगपुर” का नागरिक होता। अगर नाम बदलने से न्याय आता, तो हर अदालत “सत्यलोक” कहलाती। पर ऐसा नहीं है। सिर्फ नाम बदले हैं, हालात नहीं। और हर बार जब हम तालियाँ बजाते हैं, हम अपनी विवेकहीनता पर मुहर लगाते हैं। इतिहास केवल वही याद रखता है, जिसने सच बोला हो। बाकी सब नाम समय के गर्भ में मिट जाते हैं — जैसे कूड़ा घर में पड़ा वह बोर्ड जिस पर लिखा था “स्विट्ज़रलैंड”। अंतिम पंक्तियाँ: “जब भूख को खुशी कहा गया, जब अन्याय को न्याय बताया गया, जब झुग्गियों को व्हाइट हाउस कहा गया, तब इतिहास ने कलम उठाई और लिखा — यह वही युग था जब नाम बदलना ही राष्ट्रवाद था।”
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