-प्रियांशु कुमार
देश में इन दिनों भाषा को लेकर बहस तेज़ हो गई है — कहीं अंग्रेज़ी हटाने की बात हो रही है तो कहीं उसे बनाए रखने की मांग उठ रही है। नेताओं के बयानों और सोशल मीडिया की बहसों में यह मुद्दा मानो प्राथमिक बन गया है। पर सवाल उठता है कि क्या देश की समस्याओं का समाधान भाषा बदल देने से हो जाएगा?
भाषा संवाद का माध्यम होती है, नीतियों का विकल्प नहीं। हिंदी हो या अंग्रेज़ी, दोनों भाषाएं हमारे समाज और शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लेकिन यह मान लेना कि अंग्रेज़ी को हटाकर या हिंदी को अनिवार्य बनाकर शिक्षा व्यवस्था में क्रांति आ जाएगी, एक सरलीकरण है। जब तक शिक्षा की बुनियादी समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी, तब तक भाषा केवल सतही बहस ही रह जाएगी।
विडंबना देखिए कि देश में हिंदी को लेकर इतने बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन देश का इकलौता केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय — महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा — खुद उपेक्षा का शिकार है। सरकारें यदि वाकई हिंदी को सशक्त बनाना चाहती हैं तो सबसे पहले उन्हें ऐसे संस्थानों की दशा सुधारनी होगी, जहाँ से हिंदी का वास्तविक विकास संभव है।
आज देश के सामने चुनौतियाँ कुछ और हैं —
- स्विस बैंक में गया काला धन कैसे लौटे?
- नोटबंदी से क्या हासिल हुआ?
- करोड़ों युवाओं को रोजगार कब मिलेगा?
- शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत कब सुधरेगी?
ऐसे में भाषा की बहस मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का ज़रिया बनती जा रही है। यह सही है कि मातृभाषा में शिक्षा सरल और सुलभ हो सकती है, लेकिन इसके लिए पहले शिक्षकों की कमी, अधूरे पाठ्यक्रम, और संसाधनों की बदहाली जैसे मुद्दों को हल करना ज़रूरी है।
देश के युवाओं को भाषाई वाद-विवाद नहीं, रोजगार, अवसर और बेहतर शिक्षा व्यवस्था चाहिए। ज़रूरत इस बात की है कि सरकारें भाषाई प्रतीकों की बजाय संवेदनशील योजनाओं पर ध्यान दें, ताकि परिवर्तन केवल शब्दों में नहीं, ज़मीनी हकीकत में दिखे।
लेखक: प्रियांशु कुमार
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।

