पुष्पा गुप्ता (महमूदाबाद)
_तीर कमान का आविष्कार हुआ तो मल्ल युद्ध लड़ने वाले बेकार हो गए। बारूद के अविष्कार ने कई पराक्रमी तीरंदाजों का घमंड तोड़ दिया। लंबी दूरी तक सफर करने वाले जहाजी बेड़े तैयार हुए तो कॉलोनाइजेशन की शुरुआत हुई। स्टीम इंजन आया तो खेतों में काम करने वाले मजदूरों की आवश्यकता न रही और गुलामी की प्रथा खत्म हुई।_
टेक्नोलॉजी आदिकाल से हमारी जिंदगी को बदलती रही है । वह नए रोजगार पैदा करती है और पुरानों को खत्म कर देती है।
किसी सर्पिणी की तरह वह अपने ही बच्चों को खा जाती है। सन 70 के दशक की फ़िल्म आलाप उन तांगे वालों के दर्द की कथा थी जिनका रोजगार मोटर गाड़ी खा जाती है।
_मजे की बात यह है कि वही मोटर गाड़ी जल्द ही उसी दर्द से गुजरेगी जो उसने तांगे वालों को दिया था। खबर है कि जल्द ही बैटरी चलित गाड़ियां तेल से चलने वाले इंजन को हमेशा के लिए खत्म कर देगीं। यह बदलाव हमारी जिंदगी में नाटकीय बदलाव लेकर आएगा।_
तेल इंजन से लाखों लोग का रोजगार जुड़ा है । ऑटो पार्ट बेचने वाले दुकानदार , इंजन सुधारने वाले मैकेनिक , तेल बेचने वाले पेट्रोल पंप जैसे तमाम रोजगार खत्म हो जाएंगे । फिलहाल तेल से चलने वाली कार में लगभग छः रुपये प्रति किलोमीटर का खर्च आता है जो सिर्फ 60 पैसे रह जाएगा।
_सोचना होगा कि इस सस्ती आवाजाही के हमारे आर्थिक और सामाजिक जीवन क्या परिणाम होंगे ? सार्वजनिक यातायात के साधन के बजाय लोग अपनी कार से या स्कूटर से आना जाना पसंद करेंगे । यह नया बदलाव बैटरी बनाने वाली कम्पनियों में नए रोजगार पैदा करेगा।_
इतनी बड़ी तादाद में जब वाहन सड़क पर होंगे तो उनसे पार्किंग के लिए जगह देना एक बड़ा व्यवसाय बन सकता है । पुरानी बैटरीयों के प्रदूषण को ठिकाने लगाना सरकार और वैज्ञानिकों के लिए बड़ा सर दर्द होगा , और रोज़गार अवसर भी।
तेल के आयात में जो लाखों करोड़ों रुपया सरकार को खर्च करना पड़ता है , जब वह बच जाएगा तो इस बचत का शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं पर क्या असर होगा?
टेक्नोलॉजी हमेशा से जीने के रंग ढंग बदलती थी मगर उसकी रफ्तार कम थी । लोगों को नया हुनर सीखने और नए अवसरों के हिसाब से खुद को तैयार करने के लिए समय मिलता था। पिछले कुछ सालों से यह रफ्तार इतनी तेज हो गई है कि आप अचानक पाएंगे कि जो हम हुनर आपको आता था , अब उसकी कोई उपयोगिता नहीं बची है।
मेरे एक परिचित कपड़ा बनाने के लूम कारखाने में मैकेनिक थे। नई इलेक्ट्रॉनिक मशीनों ने उन्हें बेकार कर दिया । बेकार होकर वे घर में कैद हो गए । बीमार हो गए । वे कहते थे मैं काम करना चाहता हूं मुझे काम चाहिए ,मुझे बताओ मैं क्या करूं?
एक लाचार और अधपगला बूढ़ा हमारे शहर की सड़कों पर घूमता है। वह किसी जमाने में घर-घर जाकर लोगों को आवाज देता था- आज फलां तिथि है , आज यह त्योहार है। कैलेंडर और पंचांग उसका रोजगार खा गए ,वह बेकार हो गया।
टेक्नोलॉजी ने कुछ लोगों के लिए जीवन आसान किया और कुछ के लिए हमेशा के लिए मुश्किल कर दिया।
इसलिए टेक्नोलॉजिकल बदलावों पर नजर रखना जरूरी है । आप जो काम धंधा करते हैं उसमें टेक्नोलॉजी क्या बदलाव ला रही है उस पर नजर रखिये। यह खतरा इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि मशीनें तेजी से लोगों के रोजगार खा रही हैं।
जब कंप्यूटर आए तो रेलवे और बैंक के कर्मचारियों ने इसे अपने रोजगार के लिए खतरा माना ,मगर किसी तरह वे मशीन के खिलाफ अपनी उपयोगिता साबित करने में सफल रहे ,क्योंकि मशीनें हाथ और पैर का काम कर सकती थी पर दिमागी काबिलियत उनमें नहीं थी।
मगर नए जमाने के कंप्यूटर इंसानी दिमाग को भी चुनौती देने लगे हैं । मशीनें अब मिट्टी खोदने या फैक्ट्री में काम करने वाले रोबोट से आगे बढ़ कर कला साहित्य और संगीत जैसे विषयों में भी दखल दे रही हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले कम्प्यूटर अब संगीत की धुनें बना रहे हैं। मनुष्य की सबसे बड़ी काबिलियत कहानी कहने की है , कंप्यूटर अब यह काम भी करने लगे हैं ,सोचिए जिंदगी कितनी मुश्किल होने वाली है।
हम इंसान इस पृथ्वी पर लाखों बरसों से यह सोचते रहे कि हमारा जीवन धर्म और राजनीति से तय होता है , मगर असल में हर बड़े बदलाव के पीछे टेक्नोलॉजी ही थी।
यहां तक कि किसी देश के गुलाम होने के पीछे भी कोई बड़ा टेक्नोलॉजिकल बदलाव ही था। ड्राइविंग सीट पर हमेशा से टेक्नोलॉजी ही बैठी थी , बस हमारी आंखों पर धर्मगुरुओं और नेताओं ने पर्दा डाल दिया था जो अब खुलने वाला है। लेकिन आप आँख बंद किये रहे तो अनुपयोगी, कबाड़ सावित होगे. फेक दिए जाओगे. परम्परा से परे परम्परा डेवलप करने की परम्परा में ट्रस्ट करना सीखें._
🌀चेतना विकास मिशन

