रविशंकर रवि
नगालैंड के मोन जिले में शनिवार और रविवार (4-5 दिसंबर, 20121) को जो कुछ हुआ, उसका दूरगामी प्रभाव नगा शांति प्रक्रिया पर पड़ेगा। विभिन्न नगा समुदायों के आम लोग पचास के दशक से चली आ रही हिंसा को छोड़ नगा शांतिवार्ता की तरफ उम्मीद से देख रहे थे। उन्हें यह भरोसा होने लगा था कि भारत सरकार नगाओं के स्वाभिमान का सम्मान करते हुए उनकी बेहतरी के बारे में सोचने लगी है। यही वजह है कि नगा अलगाववादी संगठनों पर हिंसा छोड़कर शांति प्रक्रिया में शामिल होने का दबाव बना हुआ था। लेकिन 4 दिसंबर की घटना के बाद नगालैंड का माहौल बदल गया है। एक बार फिर से उन्हें भारतीय सेना पराई लगने लगी है। इस घटना से सभी नगा समुदायों को एकजुट करने के मकसद से आरंभ किया जाने वाला हार्नबिल उत्सव थम गया है। वहां भी सेना के विरोध में पोस्टर दिख रहे हैं।
भारी पड़ गई भूल
शनिवार 4 दिसंबर को सेना के एक कमांडो फोर्स की कार्रवाई में छह मजदूर मारे गए। सेना को जानकारी थी कि अलगाववादी संगठन एनएससीएन (के) युंग- अंग गुट के कुछ उग्रवादी इस रास्ते से आने वाले हैं। बताते हैं कि जिस कलर की गाड़ी से उग्रवादियों के आने की सूचना थी, उसी कलर की एक गाड़ी आई। सुरक्षाबलों ने उस पर हमला कर दिया। मगर वह उग्रवादियों की गाड़ी नहीं, एक पिकअप वैन थी जिसमें मजदूर थे। वे तिरु गांव से कोयला की खुदाई करके लौट रहे थे। जब सुरक्षाबलों को अपनी चूक का पता चला तो जवान घायल मजदूरों को पास के एक शिविर में ले गए और उनका इलाज किया गया। फिर भी आठ में से छह मजदूरों की मौत हो गई।
उधर, इन मजदूरों के न लौटने पर स्थानीय युवक और ग्रामीण उनकी तलाश में निकले। जब उन्हें सचाई का पता चला तो वे उत्तेजित हो गए। उन्होंने सुरक्षाबलों के कम से कम तीन वाहनों को आग के हवाले कर दिया। सुरक्षाबलों ने बचाव में गोलियां चलाईं , जिनमें सात ग्रामीण मारे गए। इस खूनी संघर्ष में सेना का एक जवान भी मारा गया। कई जवान घायल हुए।
अगली सुबह इस घटना की खबर आग की तरह फैल गई। मारे गए सभी ग्रामीण कोन्याक नगा समुदाय के थे। मोन जिले में उनकी बड़ी संख्या है। सीमा पार म्यांमार में भी कोन्याक नगा समुदाय के कई गांव हैं। खबर फैलते ही विभिन्न गांवों से लोगों का जमा होना आरंभ हो गया। उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। हालात से निपटने के लिए मोन जिले में इंटरनेट और एसएमएस सेवा बंद कर दी गई। बावजूद इसके लोग जमा होते गए। उग्र ग्रामीणों ने ओटिन में असम राइफल्स के एक शिविर पर हमला कर दिया। बचाव में वहां भी सुरक्षाबलों को गोलियां चलानी पड़ीं, जिससे एक ग्रामीण की मौत हो गई और दो गंभीर रूप से घायल हो गए। नगालैंड में दशकों बाद ग्रामीणों और सुरक्षाबलों के बीच सीधे संघर्ष की स्थिति बनी है और सुरक्षाबलों के शिविर पर हमले हो रहे हैं। यह स्थिति नगा समस्या के समाधान में एक बड़ी बाधा बन सकती है।
ऐसी एक ऐतिहासिक गलती 30 मार्च, 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कोहिमा यात्रा के दौरान हुई थी। नेहरू म्यामांर के तत्कालीन प्रधानमंत्री यू लु के साथ नगा नेताओं से मिलने कोहिमा गए थे, क्योंकि भारत और म्यांमार की सीमा के अंदर नगा बहुल राष्ट्र की मांग उठ रही थी। सभी नगा समुदायों को उस सभा में आने का आमंत्रण भेजा गया था। नेहरू को सुनने और उन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हजारों की संख्या में नगा जनता कोहिमा पहुंची थी। उसी दौरान एक नगा प्रतिनिधिमंडल नेहरू से मिलकर उन्हें एक ज्ञापन देना चाहता था, लेकिन स्थानीय जिला उपायुक्त ने इसकी इजाजत नहीं दी। इस बात से नगा प्रधानों का दल नाराज हो गया। इसके बाद जैसे ही नेहरू भाषण देने के लिए उठे, नगा अपनी जगह से उठ गए और जाने लगे। उनसे अनुरोध किया जाता रहा, लेकिन वे सभी यह कहते हुए चले गए कि जब उनकी बात नहीं सुनी जाएगी, तब वे प्रधानमंत्री की बात क्यों सुनें। यह अलग बात है कि नगा प्रतिनिधिमंडल के मिलने की इच्छा की जानकारी नेहरू को बाद में मिली। लेकिन तब तक भूल हो चुकी थी। उसके बाद नगाओं का नेतृत्व करने वाले संगठन नगा नैशनलिस्ट काउंसिल (एनएनसी) के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई आरंभ हो गई। कई नेता भूमिगत हो गए। उनमें से बहुत से लोगों ने हथियार उठा लिया। सेना को बुलाया गया और तमाम तरह के अधिकार दे दिए गए। तब से नगा अलगाववाद चलता आ रहा है।
गत 4 दिसंबर की घटना में आम नगाओं के दिल को चोट पहुंचाई है। इसकी भरपाई तुरंत संभव नहीं है। इसका प्रत्यक्ष असर नगा शांति समझौते पर भी पड़ेगा, क्योंकि यदि आम लोग तैयार नहीं हुए तो नगा बागियों से समझौते का पूरा लाभ नहीं मिलेगा।
वैसे सोमवार को संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उस घटना को अफसोसजनक बताया है और भारत सरकार की तरफ से खेद व्यक्त किया है। सेना ने भी घटना की ‘कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी’ का आदेश दिया है।
आफ्सपा हटाने की मांग
दरअसल मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में असम राइफल्स में 13 नवंबर को उग्रवादी पीपल्स लिबरेशन फ्रंट (पीएलए) और मणिपुर नगा पीपल्स फ्रंट (एमएनपीएफ) के संयुक्त हमले में असम राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी और पुत्र समेत सात लोगों के मारे जाने के बाद से सुरक्षाबल सख्त हो गई थी। लेकिन इस चूक की वजह से परेशानी बढ़ गई है। सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम (एएफएसपीए), 1958 यानी आफ्सपा को निरस्त करने की मांग भी जोर पकड़ रही है। नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो समेत कई संगठनों ने इसे रद्द करने को कहा है।

