Site icon अग्नि आलोक

*बदलता वर्ल्ड ऑर्डर….. संक्रमण काल से गुजर रही है दुनिया*

Share

शैलेंद्र चौहान

वर्ल्ड ऑर्डर से आशय उस वैश्विक व्यवस्था से है जिसके अंतर्गत दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य और वैचारिक शक्तियाँ आपस में संतुलन बनाती हैं और यह तय होता है कि कौन निर्णय करेगा, किसकी सुनी जाएगी और किसकी उपेक्षा होगी। इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़ी दुनिया एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रही है, जहाँ सत्ता-संतुलन, भू-राजनीति, अर्थव्यवस्था और तकनीक—सभी कुछ तेजी से पुनर्सृजित हो रहा है।

जिसे हम ‘वर्ल्ड ऑर्डर’ कहते हैं, वह अब किसी स्थिर व्यवस्था का नाम नहीं रहा, बल्कि निरंतर बदलती, अस्थिर और टकरावपूर्ण प्रक्रिया बन चुका है। इस बदलते वर्ल्ड ऑर्डर के केंद्र में राष्ट्र-राज्य हैं, उनके शासक हैं, उनकी महत्वाकांक्षाएँ हैं—और इनके बीच कहीं खोती हुई वह चीज़ है जिसे हम मनुष्यता कहते हैं। आज सवाल केवल यह नहीं है कि दुनिया किस दिशा में जा रही है, बल्कि यह है कि क्या इस यात्रा में मनुष्य और मानवीय मूल्य साथ चल पा रहे हैं या वे इतिहास के हाशिये पर धकेल दिए गए हैं।

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद एक समय यह भ्रम पैदा हुआ था कि अब दुनिया ‘एकध्रुवीय’ हो जाएगी, जहाँ लोकतंत्र, मानवाधिकार और मुक्त बाजार सार्वभौमिक मूल्य बनेंगे। यह कहा गया कि अमेरिका के नेतृत्व में एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था की कल्पना की गई थी, जो कथित रूप से ‘नियम-आधारित’ होगी। लेकिन यह व्यवस्था शुरू से ही अंतर्विरोधों से भरी थी।

एक ओर मानवाधिकारों की बात की गई, दूसरी ओर उन्हीं अधिकारों का सबसे अधिक उल्लंघन युद्धों, प्रतिबंधों और सैन्य हस्तक्षेपों के ज़रिये किया गया। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया—ये केवल युद्ध नहीं थे, बल्कि उस नैतिक दावे की शव यात्राएँ थीं, जिसके नाम पर ‘नई विश्व व्यवस्था’ का ढोल पीटा गया था।

आज का वर्ल्ड ऑर्डर बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रहा है। अमेरिका अब अकेला निर्णायक नहीं रहा। चीन एक आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरा है, रूस ने सैन्य और भू-राजनीतिक आक्रामकता के ज़रिये अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, और भारत, तुर्की, ईरान जैसे देश क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव बढ़ा रहे हैं।

लेकिन यह बहुध्रुवीयता किसी लोकतांत्रिक या मानवीय संतुलन की ओर नहीं, बल्कि ‘प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद’ और ‘सत्ता-राजनीति’ की ओर ले जाती दिख रही है। हर शक्ति अपने हितों को सर्वोपरि मानती है, और मनुष्यता—शरणार्थी, अल्पसंख्यक, गरीब, युद्ध-पीड़ित—इन हितों के रास्ते की बाधा बनकर रह जाती है।

डोनाल्ड ट्रंप का उदय इसी प्रवृत्ति का प्रतीक था। ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा केवल एक चुनावी जुमला नहीं, बल्कि उस वैश्विक स्वार्थवाद की उद्घोषणा थी, जिसमें सहयोग, सह-अस्तित्व और साझा जिम्मेदारी जैसे शब्द अप्रासंगिक हो गए। ट्रंप के दौर में शरणार्थियों के प्रति घृणा, जलवायु परिवर्तन से मुंह मोड़ना, और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का उपहास—यह सब उस मानसिकता का हिस्सा था, जिसमें दुनिया को एक व्यापारिक सौदे की तरह देखा गया। मनुष्य यहाँ नागरिक नहीं, उपभोक्ता या बोझ था।

इसी तरह, इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष में नेतन्याहू की राजनीति आधुनिक वर्ल्ड ऑर्डर की नैतिक दिवालियापन को उजागर करती है। गाज़ा में बमबारी, नागरिकों की हत्या, बच्चों और महिलाओं की लाशें—और इसके बावजूद ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर दी जाने वाली सफाइयाँ—यह बताती हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार किस हद तक चयनात्मक हो चुके हैं। यदि पीड़ित ‘सत्ता पक्ष’ का नहीं है, तो उसकी पीड़ा अदृश्य बना दी जाती है। मनुष्यता यहाँ केवल एक भाषण का शब्द रह जाती है।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी इसी सच्चाई को और नंगा किया है। पुतिन की साम्राज्यवादी आकांक्षाएँ और नाटो का विस्तारवादी आग्रह—दोनों के बीच यूक्रेन का आम नागरिक पिस रहा है। लाखों लोग शरणार्थी बने, शहर खंडहर हो गए, लेकिन वैश्विक शक्तियों के लिए यह युद्ध एक रणनीतिक खेल बनकर रह गया। हथियार उद्योग फला-फूला, प्रतिबंधों से आम लोग भूखे हुए, और मीडिया ने युद्ध को एक रोमांचक तमाशे की तरह पेश किया। यहाँ मनुष्य की मौत एक ‘डेटा पॉइंट’ बन गई।

चीन का उदय भी इस बहस का अहम हिस्सा है। जिनफिंग के नेतृत्व में चीन ने आर्थिक विकास और तकनीकी विस्तार के ज़रिये एक वैकल्पिक मॉडल पेश किया है। लेकिन यह मॉडल भी मनुष्यता के प्रश्न पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह एक ऐसा विकास है, जिसमें मनुष्य साधन है, लक्ष्य नहीं।

बदलते वर्ल्ड ऑर्डर में तकनीक की भूमिका भी निर्णायक है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन वारफेयर, साइबर युद्ध और सोशल मीडिया—ये सभी सत्ता के नए औज़ार बन चुके हैं। युद्ध अब केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि दिमाग़ों, सूचनाओं और भावनाओं पर लड़े जाते हैं। फेक न्यूज़, नफरत फैलाने वाले एल्गोरिद्म और निगरानी तंत्र ने मनुष्य को पहले से अधिक असुरक्षित बना दिया है। तकनीक, जो मानव मुक्ति का साधन हो सकती थी, वह नियंत्रण और दमन का हथियार बनती जा रही है।

इस पूरी प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ—संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार परिषद, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय—लगभग निष्प्रभावी हो चुकी हैं। वीटो पावर, राजनीतिक दबाव और दोहरे मापदंडों ने इन्हें नैतिक मंच से अधिक शक्ति-संतुलन का उपकरण बना दिया है। जब शक्तिशाली देशों के अपराधों पर चुप्पी साध ली जाती है और कमजोर देशों को कठघरे में खड़ा किया जाता है, तो वैश्विक न्याय की अवधारणा खोखली लगने लगती है। मनुष्यता यहाँ भी हार जाती है।

लेकिन मनुष्यता का क्षय केवल वैश्विक सत्ता-राजनीति तक सीमित नहीं है। इसका असर समाजों के भीतर भी दिखता है। राष्ट्रवाद, पहचान की राजनीति और ‘हम बनाम वे’ का विमर्श लोगों को विभाजित कर रहा है। शरणार्थी संकट हो या प्रवासी मज़दूरों का सवाल—हर जगह करुणा की जगह भय और नफरत ने ले ली है। आर्थिक असमानता बढ़ रही है, और पूंजी कुछ हाथों में सिमटती जा रही है। गरीब देशों में ही नहीं, विकसित राष्ट्रों में भी आम आदमी खुद को असहाय महसूस कर रहा है।

फिर भी, इस अंधेरे परिदृश्य में मनुष्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। नागरिक आंदोलनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों, कलाकारों और साधारण लोगों के संघर्ष में उसकी चिंगारी अब भी मौजूद है। गाज़ा, यूक्रेन, सूडान या म्यांमार—हर जगह कुछ लोग हैं जो सत्ता के विरुद्ध सच बोल रहे हैं, जोखिम उठा रहे हैं। यही लोग याद दिलाते हैं कि वर्ल्ड ऑर्डर केवल शासकों से नहीं बनता, बल्कि जनता की नैतिक चेतना से भी बनता है।

अंततः सवाल यह है कि हम किस तरह के वर्ल्ड ऑर्डर को स्वीकार करना चाहते हैं। क्या वह ऐसा होगा जहाँ राष्ट्रों की ताकत ही सत्य होगी, या ऐसा जहाँ मनुष्य की गरिमा सर्वोपरि होगी? इतिहास गवाह है कि जो व्यवस्थाएँ मनुष्यता को कुचलती हैं, वे लंबे समय तक टिक नहीं पातीं। लेकिन उनके ढहने से पहले वे अपार पीड़ा छोड़ जाती हैं। आज की चुनौती यही है कि हम इस पीड़ा को अपरिहार्य मानकर चुप न बैठ जाएँ।

बदलता वर्ल्ड ऑर्डर हमें एक दर्पण दिखा रहा है—उसमें हमारी सभ्यता का असली चेहरा नजर आता है। यह चेहरा अगर क्रूर, स्वार्थी और संवेदनहीन है, तो दोष केवल ट्रंप, नेतन्याहू, पुतिन या जिनफिंग का नहीं, बल्कि उस वैश्विक सहमति का है जो सत्ता को नैतिकता से ऊपर रखती है। मनुष्यता का क्षय कोई प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और नीतिगत विकल्प है। और हर विकल्प की तरह, इसे बदला भी जा सकता है—यदि हम चाहें, और यदि हम साहस करें।

Exit mobile version