Site icon अग्नि आलोक

चीता भारत लौट तो आया, पर चीतों को लेकर क्या है चिंता

Share

पूनम गौड़
चीता भारत लौट तो आया, पर इन्हें देखने के लिए आम लोगों को अभी इंतजार करना होगा। पहले चीते भारत की आबो हवा में रच-बस जाएं, परिवार आनंद में आ जाए, तब शायद यह इंतजार खत्म होगा। विशेषज्ञों के अनुसार अगर पांच में से एक या दो मादा भी अगले पांच महीने या साल भर में शावकों को जन्म दे देती हैं तो माना जा सकता है कि चीते भारत में बस गए। लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा। आइए देखते हैं कि इन चीतों के नए आवास कुनो नैशनल पार्क में क्या-क्या इंतजाम हैं-

लंबा चला इंतजार
रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया में अब 7100 चीते ही बचे हैं। ये लगातार कम हो रहे हैं, जो इस प्रॉजेक्ट की सबसे बड़ी चिंता भी है। भारत में चीता वापसी की पहल 2009 में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने की थी। इसके एक दशक बाद इस काम में तेजी आई। पहली बार 28 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने भारत में चीते लाने की अनुमति दी। राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण को चीतों के लिए माकूल जगह ढूंढने को भी कहा गया। कई राष्ट्रीय उद्यानों को परखने के बाद मध्य प्रदेश के श्योपुर में कुनो पालपुर राष्ट्रीय उद्यान फाइनल हुआ।

रफ्तार का राजा
चीता दुनिया का सबसे तेज जानवर माना जाता है। इसकी रफ्तार 80 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। एक वयस्क चीते का वजन 70 किलो तक हो सकता है। चीते आमतौर पर सुबह या शाम के वक्त शिकार पर निकलते हैं। यह हिरण, खरगोश, साही और शुतुरमुर्ग जैसे जानवरों का शिकार करते हैं। शेर, लकड़बग्घों और गिद्धों से अपने खाने को बचाने के लिए ये जल्दी-जल्दी खाना खाते हैं।

क्यों विलुप्त हुए चीते
भारत में चीतों के विलुप्त होने के पीछे कई कारण रहे। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन्हें वश में करना आसान था। बाघों की तुलना में ये कम खतरनाक हैं। इसलिए लोग बाग चीते को अपना पालतू बनाने लगे। शांत स्वभाव भी इसके खात्मे की एक वजह माना जाता है। भारतीय राजघरानों में शिकार की परंपरा थी। राजघरानों के मनोरंजन ने भी चीतों को नुकसान पहुंचाया। मुगल काल में चीतों का खूब शिकार किया गया। माना जाता है कि 1556 से 1605 तक शासन करने वाले सम्राट अकबर को इसका विशेष शौक था। कहते हैं कि अपने जीवनकाल में उन्होंने 1000 चीते इकट्ठा किए थे।

अपना आखिरी चीता
भारत में 1947 में आखिरी चीते की मृत्यु हो गई थी। इसके पांच साल बाद 1952 में इसे भारत से विलुप्त घोषित कर दिया गया। उसके बाद से भारत में अब चीते लाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के कोरिया रियासत के महाराजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने 1947 में तीन चीतों का शिकार किया था। यह शिकार बैकुंठपुर गांव के पास हुआ था। कहा जाता है कि ये तीनों ही भारत में आखिरी चीते थे। हालांकि महाराज रामानुज प्रताप सिंह देव के वंशज इस बात को गलत बताते रहे हैं। इनका कहना है कि महाराज ने तीन चीतों का शिकार तो किया था, लेकिन वे आखिरी चीते नहीं थे।

Exit mobile version