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*राजनीति पर भारी पड़ता छठ पूजा का त्योहार*

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छठ पूजा सूर्य और उषा पूजन से जुड़ा हुआ त्योहार माना जाता है। यह महिलाओं द्वारा किया जाने वाला पूजन है। इस पूजन में महिला को तालाब, नदी, झील आदि में खड़े रहकर उषा काल में अघ्र्य देना होता है। इस त्योहार को लेकर तरह-तरह के दावे हैं। इसे वैदिक धर्म से लेकर बौद्ध धर्म की परम्परा से जोड़ा जाता है। लेकिन, बिहार में यह त्योहार सभी धर्मों को अपने साथ जोड़ता है।

हाल ही के दिनों मध्यकालीन सूफी संत खिज्र खां के बारे में पढ़ते सूफियों की दरियायवी पंथ के बारे में थोड़ी जानकारी मिली। यह पंथ नदी पूजन की परम्परा से जुड़ा हुआ है।

इसका मुख्य केंद्र सिंध का कराची शहर है जो अब पाकिस्तान में है। सिंधु नदी की बेसिन के विशाल क्षेत्र में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सभ्यता विकसित हुई और यह विस्तारित होते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक आई। इस शहरी सभ्यता में नदी और जल संग्रहण को लेकर जो काम हुए थे, उसे पुरातत्व की पुस्तकों में पढ़ा जा सकता है और भारत में लोथल में इसे देखा भी जा सकता है। दरियायवी पंथ निश्चित ही इस्लाम के उद्भव से पहले का है और इसका उद्भव मेसोपोटामियां की सभ्यता से माना जाता है। कह सकते हैं कि एक बेहद प्राचीन परम्परा धर्मों के इतिहास में बना रहा।

छठ पूजा का पर्व इस साल अक्टूबर के महीने के अंत में आया है। इस पर्व के आगे आने वाले महीनों में नदी पूजा को लेकर चलने वाले त्योहारों की पूरी श्रृंखला है जो कुंभ और अर्ध-कुंभ तक चलती रहती है। यह भारत में नदी पूजन की एक मजबूत परम्परा है।

यहां सिर्फ यह रेखांकित कर रहे हैं कि दुनिया की सारी सभ्यताओं की तरह भारत में भी प्राचीन सभ्यताओं का निर्माण नदी के किनारे ही हुआ है। यह चाहे सिंधु सभ्यता हो या मगध साम्राज्य का उद्भव हो। यह परम्परा मध्यकाल तक चलती चली आई। इस समय तक भारत के सबसे बड़े-बड़े शहर नदियों के किनारे विकसित हुए।

दिल्ली में छठ पर्व पर वोट की राजनीति ने उसे लोकप्रिय होने में काफी मदद की है। आप पार्टी ने प्रवासी मजदूरों, खासकर बिहार से आये प्रवासियों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए छठ पर्व को विशेष तरजीह देना शुरू किया और घाटों के साथ-साथ यमुना की सफाई का वादा और दावा किया।

लेकिन, दावा और वादा एक चीज है, उस पर राजनीति दूसरी और यमुना की सफाई इससे अलग एक बेहद जटिल मसला है जो यहां की आर्थिक संरचना से जाकर जुड़ता है। आप पार्टी की सरकार यमुना के प्रदूषण को खत्म करने में पूरी तरह असफल रही।

भाजपा, जो वोट को तोड़कर पुनर्संयोजित करने की चाणक्य नीति की माहिर मानी जाती है, ने आप पार्टी की अरविंद केजरीवाल सरकार पर सीधा निशाना साधा। भाजपा के नेतृत्व ने दिल्ली की हवा और यमुना नदी की सफाई की बदतरी पर सीधा हमला किया और बिहार के प्रवासियों को ही नहीं, यहां के मध्य-निम्नमध्य वर्ग को भी अपने वोट बैंक में बदल देने रणनीति अपनाया।

इस दीपावली के त्योहार पर दिल्ली की हवा का क्या हाल गुजरा, यह बताने की जरूरत नहीं है। इस बार मसला सीधा भाजपा की रेखा गुप्ता सरकार की प्रदूषण बढ़ाने में सीधी हिस्सेदारी को लेकर बना।

दीपावली के चंद दिनों बाद ही छठ पर्व का दिन आ गया। यमुना के जल में न तो रसायनिक प्रवाह का आना बंद हुआ और न ही पानी को ट्रीट करने वाले प्लांट में कोई बढ़ोत्तरी देखी गई। ऐसे में, इस जल प्रवाह में झाग का बनना और उठना तयशुदा है।

इस झाग को कम करने के लिए राज्य की भाजपा सरकार रसायनों का प्रयोग और अन्य औपचारिक तौर तरीके अपनाने में लगी हुई जिससे यह दावा किया जा सके कि छठ पर्व यमुना के साफ जल में मनाया गया। इंडियन एक्सप्रेस में छपे ताज़ा आंकड़ों में इसी वर्ष के सितम्बर और अक्टूबर में यमुना नदी के जल का जो पर्यावरणीय आंकड़ा छपा है, उससे साफ है कि प्रदूषण की स्थिति कितनी बदतर बनी हुई है।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि यमुना के तट पर किसी भारीभरकम कार्यक्रम पर मनाही है और साथ ही उसमें खाद्य सामग्री, कूड़ा आदि डालना अपराध की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में छठ पर्व को यमुना के घाटों पर कृत्रिम तालाबों के जरिए ही मनाने की अनुमति दी गई है। वैसे भी प्रदूषित जल में लगातार में जल खड़े होकर पूजा करने का सीधा परिणाम स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव होगा।

दिल्ली में छठ पर्व को लेकर की गई राजनीति का सीधा संबंध अब यमुना की सफाई से जाकर जुड़ गया है। मेसोपोटामिया सभ्यता की दरियायवी सांस्कृतिक परम्परा से लेकर भारत में नदी पूजन की सांस्कृतिक परम्परा उन यादों को सहेज कर रखा हुआ जिसमें मनुष्य का सीधा संबंध अपनी प्रकृति से था। प्रकृति और मुनष्य का यह आपसी संबंध हजारों साल से हमारे साथ चलता आया है।

इन संबंधों पर मनाये जाने वाले त्योहार अपनी मूल प्रकृति में एक सच्चे संबंध की मांग कर रहे हैं। वोट की विभाजनकारी, झूठे दावे और कब्जाकारी राजनीति इन सच्चे संबंधों पर जिस तरह चढ़कर सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं, वह आज के समाज, राजनीति और अर्थशास्त्र का नतीजा है।

छठ पर्व में निहित सांस्कृतिक परम्परा ने न सिर्फ पिछली आप पार्टी की सरकार की यमनुा नदी की सफाई की राजनीति को उधेड़ कर रख दिया था, इसने इस बार भी भाजपा की राज्य सरकार के दावों को तार-तार कर दिया है। पत्रकारों का एक छोटा ही समूह सही, उसने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका अदा किया है।

दिल्ली में छठ पर्व का सांस्कृतिक पुनर्पाठ यमुना नदी और उसके पर्यावरण के पाठ में बदल गया है। यद्यपि यह पाठ दिल्ली से सुदूर रहने वाले समुदाय की सांस्कृतिक आकांक्षाओं के साथ सामने आया है। 

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