अग्नि आलोक

एक क्रांतिकारी सुखदेवराज की छत्तीसगढ़ कथा

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कनक तिवारी

1971 की दीपावली के आसपास दुर्ग नगरपालिक निगम द्वारा बनाए जा रहे इन्दिरा मार्केट के शिलान्यास का कार्यक्रम था। इसमें भाग लेने तत्कालीन रक्षा उत्पादन राज्यमंत्री विद्याचरण शुक्ल दुर्ग आये। सुखदेवराज के विद्याचरण शुक्ल को लिखे एक पत्र के अनुसार यह घटना 10 नवम्बर की है। कार्यक्रम स्थल के ठीक सामने सुखदेवराज बुखार से थके हारे रोग शैय्या पर पड़े थे। उस दिन अचानक बारिश हुई थी और कार्यक्रम स्थल तथा सुखदेवराज के निवास के बीच कीचड़ ही कीचड़ था। आयोजकों की नीयत नहीं थी कि उनके अतिथि सुखदेवराज से मिलने जायें। स्थानीय नेताओं को सुखदेवराज के महत्व से लेना देना नहीं था। मैंने विद्याचरण जी से जिद की कि उन्हें क्रान्ति के सेनानायक से मिले बिना स्वल्पाहार ही नहीं करना चाहिए। उन्हें यह बात चुभ गई। कीचड़ से लथपथ जूतों में रेंगते रोशनी और अन्धेरे की आंख मिचौली के बीच मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने सुखदेवराज की रोग शैय्या पर बैठकर बातचीत की। शुक्ल की सक्रियता के कारण सुखदेवराज की पेन्शन भी जल्द ही स्वीकृत हो गई, जो अन्यथा अटकी पड़ी थी। इसी सिलसिले में सुखदेवराज ने विद्याचरण शुक्ल से मुलाकात के दस दिन बाद एक पत्र दुर्ग के कलेक्टर को लिखा था। मार्च 1972 में दिये गये आवेदन पत्र पर कलेक्टर के कार्यालय में कोई सन्तोषजनक कार्यवाही नहीं हुई। इस पर झल्लाकर सुखदेवराज ने लिखा ‘‘किस्सा मशहूर है कि फिरदौसी कवि को ईरान के शाह ने पेन्शन मंजूर की थी। पेंशन के मोहरे फिरदौसी को तब मिले जब उनका जनाज़ा उठ रहा था। आशा है कि आपके आॅफिस में कार्यवाही में इतनी देर न लगेगी।‘‘ विद्याचरण शुक्ल से चर्चा के बाद सुखदेवराज की पेंशन के सिलसिले में मैंने दिल्ली जाने का कार्यक्रम बनाया था। वे मुझसे चिढ़ गये। उनका कहना था कि यशपाल के द्वारा उनके विरुद्ध लिखे गये लेख का उत्तर देना पेंशन मिलने से ज्यादा ज़रूरी है। वे इस विषय में मुझसे ही सलाह लेकर लिखना चाहते थे। कुछ कारणों से मैंने नवभारत के संवाददाता का कार्य छोड़ने का फैसला किया था। सुखदेवराज चाहते थे मैं पत्रकारिता नहीं छोडूं। मुझसे पूछे बिना उन्होंने नवभारत के सम्पादक को पत्र लिखा कि यह बेहतर होगा कि कनक तिवारी को नवभारत का काम करते रहने दिया जाए। 

एक बात का अफसोस मुझे है। शऊर नहीं आया कि सुखदेवराज की आवाज को रिकार्ड किया जाये। जो काम ब्रिटिश हुकूमत नहीं कर सकी वह काम यदि मैं टेप रिकार्डर से करने कहता तो सुखदेवराज मेरा क्या बिगाड़ लेते। उनकी यादें वक्त के चेहरे पर पड़ती झाइयों की तरह हैं। उनकी यादें तालाब के शांत जल में फेंके गये कंकड़ से उत्पन्न हलचलों की तरह हैं। ये मिट रही हैं। मोमबत्तियों या दीपकों की तरह ये यादें बियाबान में कब जलती हैं, कब बुझती हैं, कोई नहीं जानता। सुखदेवराज, भगतसिंह, भगवतीचरण वोहरा, चन्द्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अश्काफउल्लाह आदि शीर्ष क्रान्तिकारियों की तरह यादों के आसमान पर रोशन सितारों की तरह दर्ज़ हैं। ‘जब ज्योति जगी‘ नामक उनकी पुस्तक उनका प्राणवान दस्तावेज है। 

भारतीय क्रान्ति के आन्दोलन में मध्यप्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। चन्द्रशेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, भगवान दास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर का जन्म मध्यप्रदेश में हुआ। विश्वनाथ वैश्म्पायन और सुखदेवराज छत्तीसगढ़ में आकर रहे। सुखदेवराज के अधिकांश सहयोगी उत्तरी मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली और पंजाब में रहे। क्या वजह थी सुखदेवराज परिव्राजक की तरह घूमते भटकते मध्यप्रदेश के हमारे कस्बे में आये? सुखदेवराज से हमने कभी साफ साफ नहीं पूछा लेकिन लगता यही रहा है कि उनका पारिवारिक जीवन ऐसा नहीं था कि वे बहुत सुखी रहे हैं। कोई शून्य था जो भरा नहीं। लांछनों से पीड़ित सुखदेवराज ने मुझसे यह भी कहा था कि यदि हत्यारों की गोली से मर जाना ही क्रान्तिकारी होने का सबूत हो, तब अपने योगदान को लेकर मुझे कुछ नहीं कहना है। हम चूंकि मुट्ठी भर लोग थे इसलिए हमारी रणनीति के तहत यह पहली कोशिश होती कि हमें अपनी जान की हिफाजत करनी है। दुश्मन की गोली के हम तभी शिकार हों, जब ज़िन्दा रहने की सभी सूरतें खत्म हो जायें। बेतकल्लुफ सुखदेवराज को घन्टों गप्प लड़ाने, खाने पीने में कभी परहेज़ नहीं होता था लेकिन बाद बाद में तबीयत खराब रहने से खानपान को लेकर आत्मसंयमी और संकोची हो चले थे। कभी फरमाइश करते काॅफी पिलाइये। मैं कुछ खा भी लूंगा। कभी मन न होने पर बार बार आग्रह करने पर मना कर देते। 

वे यह महत्वपूर्ण बात भी बताते कि क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारी के बाद अक्सर पुलिस की भी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि उनसे उल्टे सीधे सवाल पूछे। भगतसिंह की कुर्बानी के बाद तो फिज़ा ही बदल गई। जन जागृति का जबरदस्त सैलाब आया। ‘हमें लगा अब हमारा ज़माना आ रहा है। सरकारी गवाहों में भी हमारे खिलाफ, न्यायालयों में बयान देने की हिम्मत नहीं होती थी। एक डर भी भर गया था उनमें कि सरकारी गवाह बनकर शायद ज़िन्दा रहना मुश्किल हो जायेगा। पुलिस के लिए हमारे खिलाफ, मुखबिर और सरकारी गवाह ढूंढ़ना मुश्किल होता जा रहा था। किसी में राय साहबी के खिताब का आकर्षण नहीं बचा था।‘ सुखदेवराज यह सब बयान करते फड़कने लगते थे। जब वे कहते कि क्रान्तिकारियों की हिम्मत की वजह से राष्ट्रीय चरित्र बना और इसमें भगतसिंह का बहुत बड़ा हाथ था। आज़ाद देश में पुलिस के मुखबिर बनने की एजेन्सियां लोग ठेके पर चला रहे हैं। किस तरह इन क्रान्तिकारियों ने चट्टानों पर नंगे पैर दौड़ने का अभ्यास किया होगा। 

स्थानीय स्तर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आयोजनों का मौसम बने घूमते थे। कस्बे से लेकर जिला स्तर के राजनीतिक नेता मुख्य अतिथि और अध्यक्ष की आसंदी आरक्षित किये रहते थे। इन सब मंचों पर सुखदेवराज की स्थानीय सामाजिक स्वीकृति नहीं थी। वे आस पास के राजनीतिक नेताओं को बहुत अधिक सम्मान, आशा और संवाद की दृष्टि से नहीं देखते थे। समाजवाद की ओर झुके हुए भारतीय क्रान्तिकारियों का सोच जिस तरह की राजनीतिक व्यवस्था में संगति ढूंढ़ता था, वह सब भारतीय आजादी ने कहां दिया। वे बताते थे कि क्रान्तिकारियों के संगठन को राजनीतिक नेताओं से बहुत अधिक मदद नहीं मिलती थी। ऐसी मदद की क्रान्तिकारियों को अपेक्षा नहीं थी लेकिन क्रांति के समवेत प्रयत्नों को अवश्य थी। राजनीतिक नेताओं के बदले ऐसी स्वाभाविक मदद ब्रिटिश हुकूमत की निगाह बचाकर सैनिक, विद्यार्थी और किसान वगैरह खतरे उठाकर भी करते थे। कई अज्ञात लोग भी मदद करते थे। कभी कभी पुलिस उन पर हमारे मेज़बान होने के कारण कहर बरपाती थी। तब भी ये लोग टूटते नहीं थे। कनखियों में अर्थवान मुस्कराहट की शरारत लिये राजनीति के सूरमाओं पर फब्तियां करते हुए सुखदेवराज कहते हैं ‘‘आदमी का चरित्र उसके चेहरे पर लिखा नहीं होता, वह तो मुसीबतों के समय उजागर होता है। यदि इस देश के अवाम ने क्रान्तिकारियों को समर्थन नहीं दिया होता तो इतिहास हमें केवल आतंकवादियों के रूप में चित्रित करता।‘‘ 

ऐसा नहीं था कि सभी राजनीतिक नेता क्रान्तिकारियों से निरपेक्ष और विमुख थे। उमाशंकर दीक्षित, मेहर अली, आचार्य कृपलानी और पुरुषोत्तम दास टंडन वगैरह उनकी मदद अक्सर करते रहते। क्रान्तिकारी इन सबको हिम्मत वाले आदमी मानते थे। सुखदेवराज, मेहर अली की याद करते करते बताते थे कि एक बार उन्होंने पूछा-किस तरह क्रान्ति और हिंसा के रास्ते पर चलकर भारत आजादी हासिल कर सकता है। भले ही हम आप क्रान्तिकारियों को सिर झुकाकर सलाम करते रहें। सुखदेवराज ने उत्तर दिया कि क्रान्ति गणित की प्रक्रिया नहीं है। क्रान्ति भावनाओं का विस्फोट है। भारत की लड़ाई की प्रतिक्रिया तो आप देख रहे हैं। भावनात्मक विस्फोट तो हम सघन करते जा रहे हैं। आप क्रान्ति की इस गतिमयता को समझ तो पा रहे हैं। मेहर अली ने सर झुकाकर इस साध्य के प्रति भी अपना मौन समर्थन प्रकट किया। उचित पुस्तकालय, संस्थाओं और विचार केन्द्रों के अभाव के कारण सुखदेवराज घन्टों यहां वहां परिचितों की दूकानों और घरों पर सहजता से बैठे रहते। ये वे अड्डे थे जो उन्हें सोहबत दे सकते थे। उन्हें साथ बिठाए रख सकते  थे। उनके प्रति सम्मान भी प्रकट करते थे लेकिन उनको बौद्धिक प्रेरणात्मक हथियार के रूप में उपयोग नहीं कर सकते थे इसलिए सुखदेव तकरीबन एक दशक दुर्ग में अजूबा बनकर रहे और चले गये। 

चन्द्रशेखर आज़ाद से उनका उतना प्रगाढ़ परिचय नहीं था। भगवतीचरण वोहरा के कारण चन्द्रशेखर आज़ाद से उनका परिचय 1930 में लाहौर में फरवरी मार्च की रात हुआ था जब वे दोनों सुखदेवराज से मिलने पहुंचे। आज़ाद ने अलबत्ता सुखदेवराज के बारे में यह जानने की कोशिश की कि वह बंदूक से अच्छा निशाना लगा सकते हैं कि नहीं। सुखदेवराज ने हंसते हुए मुझे बताया कि मैंने आज़ाद को उत्तर दिया था, ‘‘अच्छा था या बुरा, ठीक ही लगता है।‘‘ आज़ाद ने यह भी पूछा था कि क्या सुखदेवराज कुश्ती लड़ सकते हैं। बकौल सुखदेवराज ‘काॅलेज में सान्डर्स वध हुआ था और हत्या से संबंधित लोगों ने अपनी सायकल डी ए वी काॅलेज के होस्टल में सुखदेव राज के कमरे के पास छोड़ दी थी। आज़ाद किसान की तरह था। किसी बनिए लाला की तरह पोशाक पहने मुझे हष्ट पुष्ट दिखाई दिया। उनकी बात करने का कायदा मुझे बहुत पसन्द नहीं आया। फिर भी मुझे लगा कि यह साधारण आदमी नहीं है। उसमें गहरा अपनापन है और प्रभावित करने की जबरदस्त क्षमता है।‘

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