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*बाल समय समय रवि भक्ष्य लियो : हनुमान के सूर्यभक्षण का संज्ञान

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डॉ. विकास मानव

   _क्या वास्तव मे प्रातःकालीन सूर्य्य को हनुमानजी ने निगल लिया? करते हैं इस मिथक की पड़ताल वेद-शास्त्रों में ही :_

वारुणी उपनिषद् का पहला मञ्त्र :
एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः।

अर्थात् आत्मा ने आकाश की रचना कि और आकाश से वायु तथा वायु से अग्नि की उत्त्पत्ति हुई।
किसी मञ्त्र मे यह कहा गया है कि,,रघुपति प्रिय भक्तं वातजातम नमामि,,अर्थात् वायु प्रजाति के थे हनुमानजी यानी उत्त्पत्ति क्रम मे इनकी उत्त्पत्ति अग्नि( सूर्य्य) से पहले की मानी जा सकती है, यह एक तथ्य है।

ऋग्वेद/१/८९/१०/ मे वर्णित है :
अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता सपिता स पुत्रः।
विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्।।

इसमे अदिति का अर्थ उत्त्पत्तिविनाशरहिता किया गया है।
अत्र(द्यौ) इत्यादिनां कारणरूपेण प्रवाहरूपेण वाsविनाशित्वं मत्वा दिवादीनामदितिसंज्ञा क्रियते। और श्रीमदभगवत्गीता अ०/४/१/ मे श्रीकृष्ण ने भी कहा है किः-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
सन्धिविच्छेद से अर्थ बनता है कि-प्रोक्तवान्+अहम्+अव्ययं। यानी जिसका व्यय नही होता/क्षय नही होता उस सूर्य्य से मैने यह योग कहा, यह दुसरा तथ्य है।

व्यावहारिक मत,:
कल (बीता हुआ) जब इस शहर पर तूफान का कहर बरसा तो बिजली गायब हुई, लग रहा था घर द्वार सब उड़ जाएंगे।
चारो ओर धूल बरस रही थी, तो इसका कारण तो वायु ही था। अब यदि ठीक से समझें तो सूर्य्य विभिन्न गैसों का एक समूह है, लेकिन इसमे प्रकाश है इसलिए वेद की ऋचा मे जो,,द्यौ,,शब्द प्रयुक्त हुआ है उससे सूर्य्य के बारे मे सोचा जा सकता है, लेकिन सूर्य्य जड़ है तो श्रीकृष्ण यानी,,सुक्ष्मातिसुक्ष्मं तथा चेतनोश्चेतनानां,,यह श्रुति है।
तो महाचैतन्य ने जड़ से कैसे कहा? यदि मान लें कि सूर्य्य अविनाशी होने के कारण अदिति है तो सूर्य्य की उत्त्पत्ति वायु से हुई, यह पहला तथ्य है, दोनो तथ्यों मे Contradiction होता है।
वैसे भी जो पैदा होता है उसका विनाश (गीता/२/२२) निश्चित है और यह भी कि सृष्टि का इस कल्प के बाद विनाश निश्चित है तो सूर्य्य अविनाशी कैसे हुआ? अविनाशी तो केवल परमात्मा है।

यदि कल का तूफान एक बड़े क्षेत्र मे बड़ी तवाही मचाता, घर गिर जाते, बिजली के खंबे उखड़ जाते, रेल की पटरियाँ उखड़ जातीं, इन्टरनेट ठप्प हो जाता, सड़कें उखड़ जातीं, वृक्ष सड़क पर गिर जाते, आवागमन ठप्प हो जाता, खाने पीने का सामान नही मिलता, सूर्य्य धूल से ढ़क जाता तो हम तो यही कहते कि वायुदेव ने सब कुछ निगल लिया।
;| ऐसे मे कोई पुस्तक लिखी जाय और कहा जाय कि वायुपुत्र हनुमानजी ने सूर्य्य को भी निगल लिया तो ऐसा कहने मे क्या हर्ज है?

यह ठीक है :
Communication gap से उत्पन्न अज्ञान से हम तूफान को बकासुर/शम्बरासुर जैसा कुछ नाम दे देते, लेकिन घटना तो असत्य नही है।
ब कल त्राहि त्राहि मच गयी तब,,देवन आन करी विनती तब छाँड़ि दियो रवि कष्ट निवारो,,क्यों नही कहा जा सकता?

 *वैज्ञानिक मत :*

यदि हम कोई ऐसा टेलीस्कोप बना लें जिससे सारे ब्रह्माण्डों को देख सकें तो पाएंगे कि इस छोटी सी घटना ने जो हमे चिन्तन के लिए प्रेरित किया, तो ज्ञात हो जाएगा कि, ऐसी अनेक घटनाएं Universe मे प्रतिपल घट रही हैं, अनेको सूर्य्य, ग्रह, नक्षत्र, तारे, ब्रह्माण्ड इस Universe मे बन रहे हैं, बिगड़ रहे है, अंतरिक्ष मे प्रतिपल पृथिवी से भी बड़े-बड़े भूकम्प आ रहे है, यानी विनाश और सृजन का कार्य्य चल रहा है।
किसी कथा या कल्पना को सतही तौर पर देख सुनकर उसका मजाक नही उड़ाया जाना चाहिए बल्कि,,श्रोतव्यो, मन्तव्यो, निदिध्यासितेव्य,,(बृ०उ०/२/४/५) का आश्रय लेना ही चाहिए। वायु कुछ क्षणों के लिए या अधिक क्षणों के लिए सूर्य्य/प्रकाश को ढ़क सकता है, ढीबरी युग आ जाए तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी.
[लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक है)

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