~ पुष्पा गुप्ता (शिक्षिका)
प्रिंसिपल ने अभिभावक को बुलवाकर कहा, “आपका बच्चा नार्मल नहीं है. ये पागल है, पागल। हम इसे कैसे पढ़ाएँ.”
अभिभावक ने पूछा, “आप ऐसा कैसे कह सकते हैं श्रीमान जी ! ये कपड़े फाड़ता है. मारता- पीटता है. हर वो हरकत करता है, जो बच्चे करते हैं. ऐसा क्या है, जिससे लगता हो कि ये नार्मल नहीं है?
प्रिंसिपल : “नहीं, ये कुछ बोलते ही रोने लग जाता है।”
अभिभावक : “कोई बच्चा ज़्यादा इमोशनल हो तो इससे आप ये कह देंगे कि ये नार्मल नहीं है। आप बार-बार बच्चे को क्लास में कहते हो, ये मेंटल है, इसके साथ कोई नहीं बैठेगा। इसे सब बच्चों से अग़ल बिठाया जाता है। उसे बुरा लगता है कि वह लड़का होकर एक लड़की के साथ बैठता है।”
अभिभावक ने स्पष्ट किया :
आपको पता है, मेरा बच्चा स्कूल में आते वक्त रोता है कि मम्मी स्कूल नहीं जाऊँगा। ट्यूशन ख़ुशी- ख़ुशी जाता है, पर स्कूल के नाम से रोता है। जब इसे आपके स्कूल में डाला था तो आपने 95% का रिपोर्ट कार्ड और टेस्ट देखकर एडमिशन लिया था। मेरा बच्चा पहली क्लास में था, फिर भी 30 तक पहाड़े मुँह ज़ुबानी थे. मैथ फ़ेवरेट सब्जेक्ट था। अब आप दो का ही पहाड़ा सुनवा दो।
घर में उसकी माँ पूछती है कि बेटा पेपर कैसा हुआ, तो बोलता है- मम्मी एक नंबर तो आ ही जाएगा। वो कहती है – बेटा बस एक नंबर?
बच्चा बोलता है – चाहे एक नंबर का करो, चाहे सारा करो, मैडम का तो यही कहना है कि इसको तो कुछ नहीं आता।
एक बच्चा जब फूट-फूटकर रोए कि मैं तो इस स्कूल में जाऊँ ही नहीं। ऐसे में कमी स्कूल में है, जो उसको एक भी वज़ह नहीं दे पा रहा है कि वह स्कूल आए। उसके मन में पढ़ाई के लिए कोई चाव, कोई प्यार नहीं बचा। उस पर नालायक, रद्दी होने का ठप्पा लगा दिया. सब बच्चों से अलग बिठाया गया. पैन लेकर जाता है तो ये कहकर मैडम जी पैन ले लेती हैं कि पढ़ना तो तुझे है ही नहीं, पैन का क्या करेगा। इतनी सारी नकारात्मक बातें बच्चे के मन पर क्या असर करेंगी?
प्रिंसिपल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
अब यहाँ सोचने वाली बात है कि एक दस साल का बच्चा अपने दिल से यह मान चुका है कि टीचर ने मान लिया है कि उसे कुछ नहीं आता। जब उसे कुछ आना ही नहीं तो पढ़ना ही क्यों?
एक छोटा- सा बच्चा इतनी नकारात्मक बातें सुनकर किन मानसिक स्थितियों से गुजरता है, ये अनुमान एक टीचर नहीं लगा सकती. इससे भी बुरा क्या होगा?
अभिभावक को अंत में बच्चा स्कूल से निकालना पड़ा. वह दूसरे स्कूल में सिफ्ट हुआ. अब वह पागल नहीं है. जो बच्चा असामान्य घोषित कर दिया गया था, जो ज़ीरो पर आ गया था, वही पढ़ने लगा है।
हमें याद रखना चाहिए किसी भी बच्चे की परवरिश हमारे व्यवहार पर निर्भर करती है। बच्चे प्यार करने के लिए हैं. पहले उनसे प्रेम करना सीखिए. खुद का व्यवहार सकारात्मक बनाइए। उन पर विश्वास जताना सीखिए, फिर वे सब कुछ कर लेंगे।
दूसरा पहलू :
अधिकतर अभिभावक बच्चों पर पर्याप्त ध्यान देने के बजाय, स्कूल या टीचर्स को दोष देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं.
बच्चों का सर्वांगीण विकास स्कूल की नहीं बल्कि माता-पिता की जिम्मेदारी है। स्कूल अक्षर ज्ञान करवा सकता है, एटिकेट्स सिखा सकता है. बच्चों का बेसिक नेचर स्कूल नहीं बदल सकते।
बच्चा 24 घंटे में से कितने घंटे स्कूल को देता है? माता-पिता या अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने के बाद यह सोचते हैं कि अब सारी जिम्मेदारी स्कूल की ही है । इसी चक्कर में बच्चे का फुटबॉल बन जाता है.
पेरेंट्स और स्कूल्स दोनों को समझना होगा कि फुटबाल बनने के लिए नहीं होते बच्चे. (चेतना विकास मिशन)

