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बाल दिवस विशेष

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शशिकांत गुप्ते

14 नवंबर 1889 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्में जवाहरलाल नेहरू को बच्चों से खासा लगाव था और बच्चे उन्हें ‘‘चाचा नेहरू’’ कहकर पुकारते थे। भारत में 1964 से पूर्व बाल दिवस 20 नवंबर को मनाया जाता था, लेकिन जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद उनके जन्मदिन अर्थात 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया। कई देशों में एक जून को बाल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। कुछ देश संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुरूप 20 नवंबर को बाल दिवस मनाते हैं।
देश की स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे।
बाल दिवस को आधुनिक पीढ़ी Children day कहने पर समझती है।
बच्चे के जन्म के बाद उसे बाल घुट्टी पिलाई जाती है। बालघुट्टी पिलाने से बच्चे के शरीर में रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है ऐसी मान्यता है।
बालघुट्टी के साथ बालकों में मानसिक विकास के लिए संस्कार की शब्दिक घुट्टी पी पिलानी चाहिए। संस्कार अच्छे विचारों से पैदा होतें हैं। अच्छे विचारों से तात्पर्य व्यापक सोच वाले विचार।
बालक को सर्वप्रथम भारतीय नागरिक बनाने की पहल करना चाहिए। बाद में उसे धार्मिक आचरण सिखाना चाहिए।
आज जो नन्हे बच्चें हैं,यही नन्हे बच्चे ही देश के भावी कर्णधार हैं।
इन भावी कर्णधारों को सीख देने के लिए सन 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म लंबे हाथ के इस गीत पंक्तियां प्रासंगिक होंगी। इस गीत को लिखा है,गीतकार अंजान ने। आज के माहौल को देखते हुए यह पंक्तियां सुनना,सुनाना, और समझना जरूरी है।
प्यार की राह दिखा दुनिया को
रोके जो नफरत की आंधी
तुम में ही कोई गौतम होगा
तुम में ही कोई होगा गाँधी
नन्हे मुन्ने बच्चों को संस्कार और सभ्यता सीखाने के लिए उनमें आत्मविश्वास पैदा करना बहुत आवश्यक है।
इस संदर्भ में सन 1954 में प्रदर्शित फ़िल्म बूट पोलिश के गीत की पंक्तियां प्रेरणादायक होंगी।इस गीत को लिखा है।गीतकार शीलेंद्रजी ने।
भीख में जो मोती मिले तो भी हम न लेंगे
जिंदगी में आंसुओ की माला पहनेंगे
आने वाली दुनिया कैसी होगी बच्चों हमें समझाओ
आने वाली दुनिया में सबके सर पे ताज होगा
न भूखों की भीड़ होगी,न दुखों का राज होगा

उक्त सपने को यथार्थ में बदलने के लिए बच्चों के मानस पर संकीर्णता को हावी होने से बचाना होगा। उन्हें प्यार से समझाने के लिए, गीतकार प्रदीपजी लिखे गीत की इन पंक्तियों को बार बार सुनाना चाहिए।
एक बात कहनी है,आज देश के प्यारों से
संभल के रहना अपने घर में छुपे हुए गद्दारों से
झांक रहे हैं अपने दुश्मन अपनी ही दीवारों से
जागो तुमको बापू की जागीर की रक्षा करनी है
आती है आवाज यही,मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारों से
यह गीत प्रख्यात गीतकार स्व.प्रदीपजी ने लिखा है।
लेखक ने उक्त गीत की कुछ पंक्तियां सिर्फ उध्दृत की है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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