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चीन ने हांगकांग में लोकतंत्र को फिर नुकसान पहुंचाया…. चीन की कंपनियों ने वहां 11 लाख करोड़ रु. लगाए

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पिछले सप्ताह चीन ने हांगकांग में लोकतंत्र को फिर नुकसान पहुंचाया है। यह वहां के 75 लाख लोगों के लिए त्रासदी तो है ही चीन का मर्जी थोपने का दृढ़निश्चय भी है। 1991 में सोवियत संघ का पतन होने के बाद दुनियाभर में उदार मूल्यों में उफान आया था। चीन की मनमानी इन मूल्यों के लिए बड़ी चुनौती है। आर्थिक व अन्य कारणों से कम्युनिस्ट रूस की तुलना में चीन पश्चिमी देशों से अधिक मजबूती से जुड़ा है। इससे लोकतांत्रिक विश्व के सामने सवाल है कि वह चीन के उदय के बीच कैसे अपनी समृद्धि को सुरक्षित रखे, युद्ध के खतरे को कम करे और स्वतंत्रता की रक्षा करे।

12 मार्च को अमेरिका और अन्य अमीर देशों के जी-7 ग्रुप के देशों ने हांगकांग में चीन की तानाशाही का विरोध किया है। लोग सोच सकते हैं कि 72 लाख करोड़ रु. के विदेशी निवेश वाले एशिया के फाइनेंशियल सेंटर में लोकतंत्र की मौत से दहशत फैल जाएगी। पूंजी और कारोबार बाहर चला जाएगा। इसके बजाय हांगकांग में वित्तीय गतिविधियां उफान पर हैं। वहां पश्चिमी कंपनियां जमकर निवेश कर रही हैं। मोर्गन स्टेनले और गोल्डमैन सॉक्स सबसे आगे हैं। पिछले साल हांगकांग में 79 लाख करोड़ रु. के डॉलरों का भुगतान हुआ था।

राजनीतिक दमन व कारोबार में तेजी का ऐसा ही पैटर्न मुख्य भूमि चीन में भी है। 2020 में चीन ने शिनजियांग में मानवाधिकारों को कुचला, साइबर युद्ध छेड़ा, पड़ोसियों को धमकाया और राष्ट्रपति शी को सर्वशक्तिमान नेता बनाने के प्रयासों को तेज किया है। पिछले साल बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में 11 लाख करोड़ रु. का नया निवेश किया है। इन कंपनियों ने किसी अन्य देश में इतना पैसा नहीं लगाया है। चीन ने अपने पूंजी बाजार विदेशियों के लिए खोल दिए हैं जिन्होंने 65 लाख करोड़ रु. का निवेश किया है। दुनिया की 18% जीडीपी के साथ चीन के प्रभाव के अन्य कारण भी हैं। वहां कंज्यूमर के बीच नए ट्रेंड और इनोवेशन हो रहे हैं। वस्तुओं के मूल्य और पूंजी की लागत तय होती है। यह स्थिति पश्चिमी देशों का मुंह चिढ़ा रही है।

अगर साथ खड़े होने का मौका आया तो कई देश पश्चिम की बजाय चीन का समर्थन करेंगे। चीन 64 देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। दूसरी ओर अमेरिका की भागीदारी केवल 38 देशों से है। चीन को अलग-थलग करने के बदले अमेरिका और उसके सहयोगी देश अलग पड़ जाएंगे। वैसे, दुनिया से अलग होने पर तानाशाह सरकारों की पकड़ मजबूत होती है। चीन में विदेशी निवेश से लगभग दस लाख कारोबार चल रहे हैं। 40 हजार चीनी कंपनियां दूसरे देशों में सक्रिय हैं। इनका स्टाफ व कस्टमर बाहरी दुनिया से संपर्क का माध्यम हैं। इसके अलावा लाखों छात्र और पर्यटक भी सूचना का जरिया हैं। इसलिए चीन से संबंध और संपर्क बनाए रखना सही रास्ता है। अमेरिका को ताइवान के साथ पश्चिमी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बनानी होगी। उसे इंफ्रास्ट्रक्चर, पेमेंट नेटवर्क, टेक्नोलॉजी के बेहतर विकल्प दूसरे देशों के सामने रखना होंगे। चीन की सैनिक आक्रामकता के खिलाफ क्वाड (भारत, जापान, आस्ट्रेलिया) जैसे गठजोड़ों को मजबूत बनाना पड़ेगा। हांगकांग को कुचले जाने के बाद लोकतांत्रिक देशों के लिए चुनौती ज्यादा कठिन हो गई है।

बेअसर साबित हुआ दबाव
ट्रम्प की सरकार ने पाबंदियों के जरिये चीन पर नकेल कसनी चाही थी। ये तरीके भी विफल साबित हुए हैं। अमेरिका ने हुवावे के खिलाफ तीन साल तक अभियान चलाया। लेकिन हुवावे के प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने वाले 170 देशों में से एक दर्जन देशों ने उस पर प्रतिबंध लगाए हैं। इस बीच साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए मूल्य वाली चीनी टेक कंपनियों की संख्या सात से बढ़कर 15 हो गई है।

अलग-थलग करने से बात नहीं बनेगी
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चीन के तानाशाह तौर-तरीकों पर नियंत्रण करने का एक रास्ता उसे पूरी तरह अलग-थलग करने का हो सकता है। लेकिन इसकी कीमत चुकानी होगी। ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग निर्यात में चीन का हिस्सा 22% है। पश्चिमी मैन्युफैक्चरिंग को आघात लगेगा। अमेरिका में टेक्नोलॉजी, जर्मनी में कार, ब्रिटेन में बैंकिंग, फ्रांस में लग्जरी सामान और आस्ट्रेलिया में खनन गतिविधियां चीन पर टिकी हैं। चीन को डॉलर का इस्तेमाल करने से रोकने पर वैश्विक वित्तीय संकट खड़ा हो सकता है।​​​​​​​

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