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चिंतन ! महंगाई के खिलाफ सड़क पर

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-चंद्रशेखर शर्मा

टीवी पर खबर थी कि कांग्रेस ने भोपाल में महंगाई के खिलाफ आंदोलन किया। देखा कि पुलिस कांग्रेसजनों को पानी की बौछार से खदेड़ रही थी। सच कहूं तो जाने क्यों दिल को प्यारी सी खुशी महसूस हुई ! पानी की बौछार से बहते कांग्रेसजनों को देखकर नहीं, बल्कि आंदोलन को लेकर। 
असल में मेरी जानकारी में तो नहीं कि 2014 के बाद कांग्रेस को छोड़कर कोई और दल कभी महंगाई के खिलाफ सड़क पर उतरा है ! कोई चाहे तो मुझे इस मामले में ‘करेक्ट’ कर सकता है। यद्यपि सड़क पर उतरने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी और दायित्व कांग्रेस का ही बनता है। आखिर वो देश की सबसे पुरानी, देश पर सबसे ज्यादा राज करने वाली और विपक्ष या प्रतिपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है। हां, इसमें रत्ती बुराई न और न कोई देर हुई है अगरचे वो विपक्ष वाले चाल, चलन और चरित्र को लेकर भाजपा से कुछ सीखने का कष्ट करे ! जो हो। कुल मिलाकर कांग्रेस के इस आंदोलन से दिल को एक विलग संतोष और खुशी हुई कि पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों से देश का एक बड़ा वर्ग तनाव तो यकीनन महसूस कर रहा है ! महंगाई काबू से बाहर क्यों हो रही है और यह कब तक रहेगी, उस वर्ग को इस बारे में ज्यादा जानकारी न। न सरकार की तरफ से कोई आश्वासन है ! जाहिर है कांग्रेस का महंगाई पर मैदान पकड़ना उस आश्वासन की उम्मीद बढ़ाता है। 
मालूम हो कि यही कांग्रेस राजस्थान के उदयपुर में चिंतन शिविर करने जा रही है। अभी चंद दिनों पहले ही चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस आलाकमान के सामने रणनीतियों का प्रेजेंटेशन दिया था। जाहिर है उसमें भी चिंतन के बिंदु थे। सो माना जा सकता है कि उदयपुर का यह शिविर कुछ अलग चिंतन वाला होना मुमकिन है। यह परिणाममूलक हो तो और बेहतर।
बहरहाल अपने पास कांग्रेस के लिए सिर्फ एक बिन मांगी सलाह है। सो यह कि वो जहां तक हो सके, ऐसे कामों, बयानों और हरकतों से बचे जिससे हिंदू सेंटिमेंट हर्ट हो ! ठीक है कि उसे अपने मुस्लिम वोट बैंक की फिक्र लाजमी है, लेकिन पिछले अनेक चुनाव नतीजों ने बताया है कि यह वोट बैंक अब उसके लिए उतना विश्वसनीय नहीं रहा है ! उसके कई कारण हो सकते हैं अलबत्ता एक कारण खुद कांग्रेस की पतली हालत या दुर्दशा और करिश्माई नेतृत्व का अभाव है। वो करिश्माई नेतृत्व, जो लगभग हर दौर में पार्टी की सबसे बड़ी ताकत रहा और जिसके करिश्मे से पार्टी ने विगत में कई चुनाव फतह किए। यदि तुलना करें तो अभी भाजपा को यही नेतृत्व नरेंद्र मोदी की सूरत में सुलभ है। सो कांग्रेस को पहले तो वैसे नेतृत्व की तलाश करनी चाहिए और दूसरी बात यह कि जो वोट बैंक आपसे छिटक चुका है, उसकी फिक्र और उसके लिए कुछ करने की इच्छा को अभी मुल्तवी रखिए। उसके लिए हिन्दू सेंटिमेंट को हर्ट करने का फॉर्मूला कभी कारगर रहा होगा, लेकिन हालात गवाह हैं कि गुज़श्ता बरसों में यह फॉर्मूला बहुत नुकसानदायक और मूर्खतापूर्ण साबित हुआ है ! उचित लगे तो इस पर चिंतन कीजियेगा। शिविर के लिए शुभकामनाएं।-चंद्रशेखर शर्मा

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