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चित भी पट भी और…भी मेरा

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी सन 1717 में जन्मे प्रख्यात कवि गिरधरजी रचित उपदेशक कुंडलियों का अध्ययन कर रहे हैं।
मैं जब उनसे मिलने गया तब वे मानव में समाहित गुण और अवगुण के अंतर को शब्दों में स्पष्ट करती कवि गिरधर रचित कुंडली पढ़ रहे थें।
गुनके गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा-कोकिला, शब्द सुनै सब कोय।
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबे सुहावन।
दोऊ को इक रंग, काग सब भये अपावन।।
कह गिरिधर कविराय, सुनौ हो ठाकुर मन के।
बिन गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुनके
।।
सीतारामजी को मैने पूछा आज गिरधर कवि की रचनाओं को पढ़ने का कोई विशेष कारण है?
सीतारामजी ने कहा अठारवी सदी के कवि कितने आदर्शवान,और सद विचारों के कवि थे।
उपर्युक्त रचना में कवि ने मानव के गुण की महिमा के महत्व को समझाया है।
संभवतः अठारवी सदी में प्रचार माध्यमों का प्रचलन नहीं था? अठारवी सदी में देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष चल रहा था।
अपने देश का अपना संविधान नहीं था। देश की जनता को वाणी की स्वतंत्रता का अधिकार संवैधानिक रूप से प्राप्त नहीं हुआ था।
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए असंख्य देशभक्तों ने शहादत दी और असंख्य देश भक्तों ने विदेशी हुकूमत की जेलों में यातनाएं भोगी।
आज हम स्वतंत्र है। लेकिन दुर्भाग्य से आज अवगुण के असंख्य प्रसंशक हो गए हैं।
गुणवान तो हंसी के पात्र बन गए हैं।
झूठों का बोलबाला है। जो सच्चा है, उसे प्रमाणित करना पड़ रहा है?
झूठे लोग बगैर सबूत के दोषारोपण करते हुए, हंगामा कर अपने मानवीय कर्तव्य से विमुख होते हुए,सिर्फ और सिर्फ स्वयं को विघ्नसंतोषी प्रमाणित कर रहे हैं।
यह उनकी निराशा
(frustration) का ही तो प्रमाण है।

चित भी मेरी पट भी मेरी,अंटा मेरे बाप का इस कहावत को चरितार्थ करते हुए।
कहावत अर्थ है जब बेशर्मी अपना ली तब लज्जा क्या
आज यही लोग सबूत मांगने के लिए हंगामा कर रहे हैं।
इनदिनों कोयल को सिर्फ वाणी की स्वतंत्रता के पक्षधर ही सुनते हैं। वाणी की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वाले कौवों के झुंड जैसे कर्कश आवाज में काव काव ही करते हैं।
सीतारामजी ने आज एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात बताई,पिछले एक दशक से कौवे बहुत क्रोधित हैं और निराश भी हैं।
कारण झूठ बोलने वालों की तादाद की तुलना में कौवों की संख्या कम है और एक ही व्यक्ति यदि बार बार झूठ ही बोलेगा तो उसे कौवे कितनी बार और कहाँ कहाँ काटेंगे।
कौवे भी शर्म महसूस कर रहें हैं।
कौवे अब इस गाने को सुनते ही नहीं है। झूठ बोले कौवा काटे काले…
कौवों का कहना है कि जिनका तन उजला और मन काला है उनसे सावधान रहो।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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