दिव्यांशी मिश्रा
वस्तुत: ईसा की जीवन यात्रा मानवीय संस्कृति के बहुरंगी प्रवाह का एक अंग है. उनके जीवन के जो रहस्योद्घाटन हुए हैं , वे सभी मत – सम्प्रदायों को समीप लाकर मानव संस्कृति की श्रेष्ठता का तथा ‘एकम सदविप्रा बहुधा वदंति’ की ऋषि मान्यता का समर्थन ही करते हैं.
जिस तरह क़ुतुबनुमा सुई सदैव उत्तर की ओर ही रहती है उसी प्रकार ईश्वर प्रेमी महापुरुषगणों का मन सदा भगवान की ओर रहता है.
ईसा मसीह स्वयं अपने जीवन में भी इसी प्रकार ईश्वर के ज्योतिर्मय साम्राज्य से , कृपा – प्रेम – सेवा – त्याग के अनमोल दिव्य भावों की देन , भक्तों को देने के लिए ले आए थे.
_ईसा मसीह का इस युग के यह सन्देश है :_
“शक्ति से नहीं , बल से नहीं बल्कि आध्यात्मिक मार्ग द्वारा ही सच्ची सफलता प्राप्त हो सकती है__धन्य है वे जो गरीब , दयालु और शान्ति प्रचारक हैं और जो न्याय की खातिर दण्ड सह्या करते हैं ,क्योंकि सब मनुष्य एक ही पिता की सन्तान है.”
ईसा मसीह के प्राकट्य से, उनके दिव्य स्पर्श से जोर्डान और गंगा नदी के बीच अब सम्बन्ध प्रगाढ़ हो रहा है. समस्त प्रकार के धर्मांतरण की प्रवर्तिया और उससे प्राप्त उत्पीड़न का मृत्यु निनाद अब सुनाई देकर कहीं दूर
विलीन हुआ जा रहा है.
देह पर मन और मन पर आत्मा की वरिष्ठता का अभ्यास, स्वधर्म में प्रीति , अंतर्निहित देवता का जागरण तथा अंधत्व ( मूढ़ मान्यताओं ) का त्याग , तब ही मनुष्य, ईश्वर के सृजनकारी प्रकाश से स्पंदित हो जाएगा.
ईश्वर की यह ईशवार्ता , एक शुभ आकांक्षणीय स्मृतिरेखा खींचकर अतीत के वक्ष से वर्तमान को प्रेरित करने की महायात्रा के लिए आरम्भ हो चुकी है.
ख्रीस्त धर्म के फ्रैंच प्रोटेस्टेन्ट् की हुग्नोट
Huguenots परम्परा में जन्मे Jules Michelet ( 1794-1874 ) एक फ्रांसीसी इतिहासविद व दार्शनिक थे. उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘ The Bible of Humanity ‘ में लिखा है :
“महापुरुषों के उन जीवित जलाशयों पर, जिनमें शाश्वत शक्ति का निवास है , मनुष्य को विश्राम करना ही होगा. सांस लेनी होगी, एवम् स्नान करके व उनका पवित्र जलपान करके तरोताजा होना होगा. यदि मनुष्य उन पर्वत-शिखरों पर, जिनके एक पार्श्व में गंगा व सिन्धु की जलधाराएं प्रवाहित हो रही है और दूसरी तरफ सुरधुनी के सदृश ईरान की जलधाराएं बह रही हैं; उन जलाशयों का पता न लगा सके तो और कहां लग सकता है ?
पश्चिम अत्यन्त संकीर्ण है. ग्रीस क्षुद्र है. वहां मेरा दम घुटने लगता है. इजरायल शुष्क प्रदेश है. वहां में हांफने लगता हूं. इसलिए मैं कुछ देर के लिए एशिया व महाप्राच्य की तरफ देखना चाहता हूं. भारत महासागर के समान विशाल है. वहीं मेरा काव्य निहित है.
उस महाकाव्य में छन्दोभंग नहीं है. स्वर की विषमता नहीं है. उसमे स्वरसंगीत का स्वर्गीय माधुर्य है. वह सूर्य की सुनहरी किरणों की छटा से उज्जवल है. देवताओं के आशीर्वाद से विभूषित है. वहां निर्मल शान्ति का राज्य है और सब विरोधों व संघर्षों के ऊपर एक अनन्त माधुर्य तथा असीम भ्रातृभाव विराजमान है, जो सभी जीवित प्राणियों तक फैला हुआ है.
यह प्रेम , दया व करुणा का एक अगाध व असीम समुद्र है. मैं इतने दिनों से जिस वस्तु की तलाश में था, आज वह मुझे प्राप्त हो गई है. यह करुणा की बाइबिल है. “
भारतवर्ष की सनातन सांस्कृतिक विचारधारा में उत्कृष्ट तत्वों के सर्वोच्च लक्ष्य की उपलब्धि व अनुभूति करने हेतु संसार के अलग अलग स्थलों में निवासरत सिद्ध , सुधारक , साधक तथा विभिन्न धार्मिक परम्पराओं के ईश्वर प्रेमी मनीषियों का आगमन , भारत भूमि पर समय समय में होता रहा है.
सगुण और निर्गुण उपासकों के ईश्वर , अल्लाह , गॉड , जेहोवा आदि की शिक्षाओं में धार्मिक सहिष्णुता की सार्वभौम स्वीकृति , भारत की समन्वय सूत्रीय श्रृंखला में सर्वोच्च स्थान पा जाती है. इस प्रकट सत्य के साधन का साक्षात्कार करने , देव और उनके अतिंद्रिय जगत की संगीतमयी स्वररागीनियों को सुनने के लिए ईसा मसीह का भारत आगमन हुआ.
यहां से प्राच्य और पाश्चात्य जगत के एकसूत्र में बंध जाने की अद्भुत घटना का आरंभ होता है जिसने विश्व मानवता को प्रभावित किया.
मानव , महामानव , देवमानव , विश्वमानव की क्रमशः ईश्वर की ओर बढ़ने की यात्रा में यहां ईसा मसीह का स्मरण है.
ईसा की जीवन यात्रा संस्कृति के बहुरंगी प्रवाह का एक अंग है. उन्होंने पश्चिमी दुनिया को जो ज्ञान दिया , मनुष्य को ईश्वर का एक अंश और अविनाशी आत्मा मानने की प्रेरणा दी, वह धर्म और मानव सभ्यता की सबसे अमूल्य थाती है. ईसा जैसी दिव्य आत्माएं ऐसे युग परिवर्तन के अवसरों पर ही प्रकट हुआ करती हैं.
जब मानवता, विकास क्रम की एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर कदम रखती है और आगामी परिस्थितियों की जानकारी न होने के कारण शंकाकुल होने लगती है. उसी समय पर मानवता का मार्ग प्रदर्शन करने के लिए दैवी आत्माओं का अवतरण हुआ करता है. इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि महापुरुष ईसा मानव सभ्यता की प्रगति के मार्ग में एक प्रमुख प्रकाश स्तम्भ थे.
उनका जीवन, उदाहरण और कार्य , गत दो हज़ार वर्षों में सैकड़ों , करोड़ों व्यक्तियों को उच्च जीवन का मार्गदर्शन करा चुका है और कितने ही भूखंडों को जो घोर अन्धकार में प्रथक पड़े थे, उसने काया पलट कर दी. ईसा के उदाहरण से ही अनुप्राणित होकर आज भी हजारों महापुरुष गिरे – पड़े लोगों के उद्धार के लिए आत्म त्याग का उच्चतम आदर्श दिखलाकर मानवता को अग्रसर कर रहे हैं.
इसीलिए यदि हम यह कहें कि ईसा के एक ‘ अवतार ‘ के प्रभाव से आज हजारों ‘ अंशावतार ‘ संसार का भार अपने कन्धों पर उठा कर चल रहे हैं तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं. जो व्यक्ति प्राणों का समस्त मोह त्यागकर अफ्रीका के भयंकर जंगलों और प्रशांत महासागर के अदम्य टापुओं के नर मांसाहारी लोगों के बीच जाकर उनको मानवता की शिक्षा देते हैं, साथ ही रोग, शोक अभावों को दूर करने का भी प्रयत्न करते हैं, और इसके बदले में स्वयं वहां अस्वस्थ होकर अपना बलिदान कर देते हैं, ऐसे ‘ देवदूत ‘ का कार्य करने वालों को ‘अवतार’ कहा जाए तो क्या अनुचित है?
ईसा की वास्तविक दर्शन तथा उनके शारीरिक आकृतिबंध की गवेषणा में प्रवृत्त हो हम अब यहां उनके कायिक गठन पर दृष्टिपात करेंगे.
लिपिबद्ध विवरणों में यीशु ख्रीस्त, यहूदी जाति में जन्मे हल्की स्वर्ण आभा लिए गेहुंए रंग के थे. उनके मुख पर सदा पूर्णता , गम्भीर विनम्रता व बाल सुलभ प्रसन्नता रहा करती थी. उनका चेहरा कुछ बड़ा था.
वे घनी दाढ़ी से शोभित थे. उनकी नाक लम्बी किन्तु कुछ चपटी थीं. उनका कद पांच फीट से कुछ ऊपर था. उनके वजन का मापन प्राप्त न हो सका है.
वे खूब हष्ट पुष्ट तथा स्वाभाविक रूप से सुगठित शरीर के थे. उनकी आंखे बड़ी और काली रंग की थीं तथा केश घुंघराले थे.
वे दृढ़ कदमों से राजोचित भाव से चला करते थे. वे ग्रीक , हिब्रू , लैटिन तथा अरामीक भाषाएं बोला करते थे. उनका कंठ स्वर मृदु और ललित था. भारत में रहकर उन्होंने संस्कृत , पाली , कश्मीरी , तिब्बती तथा अन्य भारतीय भाषाए सीखी थीं.
जान पड़ता है कि ‘ ईसा ‘ इब्रानी शब्द ‘ येशुआ ‘ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ है होता है मुक्तिदाता. ‘ मसीह ‘ शब्द को हिंदी शब्दकोश के अनुसार ‘अभिषिक्त’ मानते हैं. यूनानी भाषा में
‘ खीस्तोस’ कहा जाता है. अतः पश्चिमी देशों में उन्हें ‘यीशु ख्रीस्त ‘ कहा जाने लगा.
इस तरह ख्रिस्तान शब्द प्रचलित हुआ. बाद में यही शब्द, ‘ क्रिश्चियन ‘ हो गया. संस्कृत शब्द ‘ ईशस् ‘ ही जीसस हो गया है. यहूदी सम्प्रदाय इस शब्द को ही ‘ इशाक ‘ कहते हैं.
अरबी भाषा में ‘ जीसस ‘ को ‘ ईसस ‘ कहा गया है. ‘ जीसस क्राइस्ट ‘ नाम भी उनके अनुयायियों ने ही दिया है. यूरोप में ‘ क्राइस्ट ‘ शब्द प्रचलित हो गया. इसका संस्कृत में अर्थ होता है– मूल तत्व.
ईसा मसीह के विषय में श्री वेदव्यास रचित भविष्य पुराण में वर्णन प्राप्त होता है. संभवतः यह पुराण सातवीं शताब्दी में लिखा गया था. इस पुराण में ईसा मसीह का जन्म, उनकी हिमालय यात्रा और तत्कालीन कुषाण सम्राट शालिवाहन से भेंट की कथा वर्णित है.
भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व के तृतीय खण्ड के द्वितीय अध्याय में विस्तार से लिखा है :
एकदा तु शकाधीशो हिमतुंगम समाययौ||
हूंणदेशस्य मध्ये वै गीरिस्थम् पुरूषम शुभम्|
दर्दश बलवान्नाजा गौरांगम श्वेतवस्त्रकम||
को भवानिती तम प्राह स होवाच मुदान्वित:|
ईशपुत्रम च माम विद्धि कुमारीगर्भसंभवम||
मलेच्छधर्मस्य वक्तारम सत्यव्रत परायणम|
इति श्रुत्वा नृप: प्राह धर्म: को भवतो मत:||
श्रुत्वोवाच महाराज प्राप्ते सत्यस्य संक्षये|
निर्मर्यादे मलेच्छदेशे मसीहोंहम समागतह||
ईशामसी च दस्युनाम् प्रदुर्भूता भयंकरी|
तामहम म्लेच्छत: प्राप्य मसीहत्व मुपागत:||
मलेच्छेशु स्थापितो धर्मो मया तच्छुरुणु भूपते|
मानसं निर्मलं कृत्वा मलम देहे शुभाशुभम्||
नैगमनम जपमास्थाय जपेत निर्मलम परम|
न्यायेन सत्यवचसा मनसैक्येन मानव:||
ध्यानेन पूजयेदीशम् सूर्यमंडल संस्थितम|
अचलोयम प्रभु: साक्षात्तथा सूर्योचल: सदा ||
तत्वनाम् चलभूतानाम कर्षण: स समंततह|
इति कृत्येन भूपाल मसीहा विलयम गता||
ईश मूर्तिहरदि प्राप्ता नित्यशुद्धा शिवंकरी|
ईशामसीह इति च मम नाम प्रतिष्ठितम||
इति श्रुत्वा स भूपालो नत्वा तम् म्लेच्छ पूजकम्|
स्थापयामास तम तत्र म्लेच्छस्थाने हि दारुणए||
स्वराज्यम प्राप्तवान् राजा हयमेधचीकरत|
राज्यम कृत्वा च षष्टचब्दम् स्वर्गलोक मुपाययौ||
स्वर्गते नृपतो तस्मिन्नयथा चासित्तथा श्रुणु||
भावार्थ –
एक समय की बात है, वह शकाधीश शालीवाहन हिमशिखर पर गया. उसने हूंण देश के मध्य स्थित पर्वत पर एक सुन्दर पुरुष को देखा. उसका शरीर गौरवर्ण था और वह श्वेत वस्त्र धारण किए था. उस व्यक्ति को देखकर शकराज ने प्रसन्नता से पूछा _ आप कौन हैं?
उसने कहा _
‘ मैं ईशपुत्र हूं और कुमारी के गर्भ से उत्पन्न हुआ हूं _ मैं म्लेच्छ ( ख्रिस्तान/क्रिस्तान ) धर्म का प्रचारक और सत्यव्रत में स्थित हूं ‘
राजा ने पूछा _ आप का कौन सा धर्म है?
ईश्वर पुत्र ने कहा –
महाराज! सत्य का विनाश हो जाने पर मर्यादा रहित म्लेच्छ देश में मैं मसीह बनकर आया और दस्युओं के मध्य भयंकर ईशामसी नाम से एक कन्या उत्पन्न हुई उसी को म्लेच्छो से प्राप्त कर मैंने मसीहत्व प्राप्त किया.
मैंने म्लेच्छो में जिस धर्म की स्थापना की है, _ उसे सुनिए –
‘सबसे पहले मानस और दैहिक मल को निकालकर शरीर को पूर्णतः निर्मल कर लेना चाहिए. फिर इष्टदेव का जप करना चाहिए. सत्य वाणी बोलनी चाहिए, न्याय से चलना चाहिए और मन को एकाग्र कर सूर्यमंडल में स्थित परमात्मा की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर और सूर्य में समानता है. परमात्मा भी अचल है और सूर्य भी अचल है. सूर्य अनित्य भूतों के सार का चारों ओर से आकर्षण करते हैं.
हे भूपाल ! ऐसे कृत्य से वह मसीहा विलीन हो गई, पर मेरे ह्रदय नित्य विशुद्ध कल्याणकारणी ईश मूर्ति प्राप्त हुई इसीलिए ईशा मसीह मेरा नाम प्रतिष्ठित हुआ.’
यह सुनकर राजा शालीवाहन ने उस म्लेच्छ पूज्य को प्रणाम किया और उसे दारुण म्लेच्छ स्थान पर प्रतिष्ठित किया तथा अपने राज्य मे आकर उस राजा ने अश्वमेध यज्ञ किया और साठ वर्ष राज्य करके स्वर्गलोक चला गया.
सनातन वैदिक संस्कृति में प्रमुख प्रमुख अठारह पुराण शास्त्र आदि में ‘ भविष्य पुराण ‘ का स्थान अन्यतम है.
इसमें भविष्य काल में घटित होने वाली घटनाओं का वर्णन सूक्ष्मता से किया गया है. अतः यह ज्ञात होता है कि ईसा के जन्म ग्रहण से बहुत पूर्व ही भविष्य पुराण में महर्षि वेदव्यास ने पुराण ग्रंथ लिखते समय ईसा मसीह तथा उनके द्वारा आरम्भ किए गए ख्रीस्त धर्म के विषय में लिख दिया था. यह पुराण भारतवर्ष के वर्तमान समस्त आधुनिक इतिहास का आधार है.
इसके प्रतिसर्गपर्व के तृतीय तथा चतुर्थ खण्ड में इतिहास की महत्त्वपूर्ण सामग्री विद्यमान है. इतिहास लेखकों ने प्रायः इसी पुराण शास्त्र का आधार लिया है. भविष्य पुराण के अनुसार, इसके श्लोकों की संख्या पचास हजार के लगभग आंकी जाती है, किन्तु वर्तमान में कुल चौदह हज़ार श्लोक ही प्राप्त होते हैं.
भविष्य पुराण उच्चकोटि का ग्रन्थ है. विषय-वस्तु , वर्णनशैली तथा काव्य-रचना की द्रष्टि से इसकी कथाएँ रोचक तथा प्रभावोत्पादक दीख़ पड़ती है.
ईसा जैसी दिव्य आत्माएं ऐसे युग परिवर्तन के अवसरों पर ही प्रकट हुआ करती हैं , जब मानवता विकास क्रम की एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर कदम रखती है और आगामी परिस्थितियों की जानकारी न होने के कारण शंकाकुल होने लगती है.
उसी समय मानवता का मार्ग प्रदर्शन करने के लिए दैवी आत्माओं का अवतरण हुआ करता है. वैज्ञानिक विकास क्रम के अनुसार भी उस समय भूमध्य सागर के आस पास के देशों में ऐसी परिस्थिति हो गई थी कि कोई महामानव आकर लोगों का पथ प्रदर्शन करे. ऐसे संकट काल में ईसा का आविर्भाव हुआ. उन्होंने उत्तरी पेलेस्टाइन के ‘ नाजरथ ‘ नामक स्थान में जन्म लिया.
ईसा मसीह के जन्म के समय भारत से तीन बौद्ध विद्वान उनके दर्शन करने गए थे तथा उस अद्भुत शिशु का नाम उन्होंने ‘ ईसा ‘ रखा था. संस्कृत में ईसा शब्द का अर्थ भगवान होता है. एक अन्य मत अनुसार भारत के हिमालय क्षेत्र में स्थित एक बौद्ध मठ में उन्हें ‘ ईशा ‘ नाम प्राप्त हुआ जो कि मालिक या स्वामी उपाधि को निर्देशित करता है.
‘ ईश ‘ अथवा ‘ ईशान ‘ शब्द भगवान शंकर से सम्बंधित है. ईसा मसीह ‘ एसेन सम्प्रदाय ‘ में सम्मिलित हुए थे. ये एसेन , भारतीय योगियों की तरह परमात्मा का सानिध्य और आत्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना किया करते थे और इसके लिए एकांत स्थानों में बैठकर ध्यान मग्न हो जाते थे. ऐसेन शब्द ईशान ‘ से निकला है जो भगवान शिव का नाम है. शिवजी के उपासक को ईशानी कहा जाता है और उसी से ‘ऐसेन’ की उत्पत्ति हुई है.
भूमध्य सागर में नेपल्स और पोर्ट सईद के बीच क्रीट द्वीप स्थित है. यहीं ईसाई धर्म का प्रादुर्भाव हुआ था. यहां सूक्ष्म रूप में अब भी ‘ थेरापुट ‘ नामधारी ऋषितुल्य सिद्ध संतो का निवास स्थान है.
( उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कुछ अंगरेज पुरातत्वविदों को क्रीट द्वीप में उत्खनन कार्य करते समय ऐसी अनेक सामग्री तथा धरोहरें मिली जिससे ईसाई धर्म की उत्पत्ति से सम्बंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली थी )
थेरापुत्त या स्थविरपुत्र , अद्वैत दर्शन के अनुयाई तथा वैराग्य प्रवण और उदार मतावलंबी होते हैं. ( थेरावाद एक प्राचीन बौद्ध सम्प्रदाय का नाम भी था ) इस ऐसेन सम्प्रदाय का आदर्श और तत्व , हिन्दू धर्म के एकेश्वरवाद सिद्धान्त की तरह ही है और इसका प्रचार ईसाई धर्म द्वारा विभिन्न साहित्यादी में मुद्रित किए जाने से हुआ है.
थेरापुट , ऐसेन सम्प्रदाय और नाजरीन सम्प्रदाय के मत के मिश्रण से ईसाई धर्म के विभिन्न दार्शनिक और सांप्रदायिक पहलुओं की रचना का आरंभ माना जाता है. मिस्र के सिकंदरिया नगर में भारत , मिस्र और यूनान की विचारधाराओं का जो सम्मिलन घटित हुआ उसने ईसाई धर्म के रूपायन में प्रमुख भाग लिया था.
बौद्ध धर्म का उदय होने पर महाराज अशोक ने समस्त एशिया में बौद्ध प्रचारक भेजकर उनका सन्देश प्रचारित कराया था. उस समय तक ईसाई और मुसलमान धर्मो की उत्पत्ति नहीं हुई थी और बौद्ध धर्मोदेशक अफगानिस्तान , ईरान , अरब होते हुए एशिया की अन्तिम पश्चिमी सीमा तक पहुंच गए थे जहां कि पेलेस्टाइन देश स्थित है. उनके उपदेशों से प्रभावित होकर वहां के कुछ साधक भी भारतवर्ष आने लगे थे और बौद्ध तथा ब्राह्मण गुरुओं से आध्यात्मिक साधना की जानकारी प्राप्त करने लगे थे.
ऐसेन सम्प्रदाय ऐसे ही साधकों ने स्थापित किया था जो कि ईसा के समय में कुछ अप्रकट रूप में अपना काम कर रहे थे , क्योंकि यहूदी जाति अपने सिद्धान्तों में सदा से कट्टर होती आई है और वह अपने मजहब पर किसी बाहरी धर्म का प्रभाव पड़ना सहन नहीं कर सकती.
ईसा मसीह अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा पूर्ति के लिए हिन्दी ऐसेन लोगों से परिचित हो गए थे और उनकी साधना में भाग लेने लगे थे.
महात्मा ईसा सच्चे साम्यवादी थे__उन्होंने सब लोगों को मिलकर परिवार की तरह रहने और एक चूल्हे पर रोटी खाने की आज्ञा दी और अपने अनुयाइयों की ‘ सहयोग समिति ‘ बनाकर इस प्रथा को कार्यरूप में परिणत कर दिया. सा मसीह ने अपनें यहां की भाषा और स्थिति के अनुरूप बौद्ध दर्शन और वैदिक दर्शन के सिद्धान्तों का प्रचार , प्रतिपादन अपने ढंग से किया.
उनके उत्तराधकारियों ने उनकी शिक्षाओं का नामकरण अपने गुरु के नाम ‘ ईसा – धर्म अथवा ‘ ईसाई धर्म ‘ कर दिया. वस्तुत: भारतीय दर्शन का विचार ही ईसाई धर्म के रूप में विकसित हुआ.
आज योरोप का अधिकांश भाग उसी प्रकाश से लाभान्वित हो रहा है. ईसा मसीह द्वारा भारत आकर उच्चस्तरीय तन्त्र साधना सीखने एवम् हिमालय में तपस्यारत रहकर दुर्लभ योग सिद्धियों को सीखने का प्रमाण उनकी धर्मनीति को दर्शित करते ग्रन्थ – Sermons on The Mount में प्राप्त होता है. इस ग्रन्थ में उपनिषदों कि शिक्षाओं का भाव लिपिबद्ध है.
ईसा मसीह ने जब अपने जीवन के तेरहवें वर्ष में प्रवेश किया तो उनके परिवार में उनके विवाह संपन्न कर दिए जाने कि बात जोर पूर्वक चल पड़ी. किन्तु ईसा की इक्क्षा आत्मज्ञान प्राप्त करने की ओर थी , विवाह की ओर बिल्कुल न थी.
वे अपनी चौदह वर्ष की आयु में सौदागरों के एक समूह के साथ घर से पलायन कर सिंध आ गए , यह उनका भारत वर्ष की भूमि पर प्रथम पदार्पण था. श्रीयुत ईसा यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर वे मुग्ध हो गए थे.
नदी और विशालकाय पर्वत , शोभित और श्यामल वृक्ष लता गुल्म आदि से आच्छादित भारत की धरती उन्हें बड़ी मनोरम और नयनाभिराम लगी थी.
तीन ओर से उत्ताल सागर , पूर्व में बंग सागर, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिन्द सागर , समुद्र में छोटे बड़े प्रस्तर द्वीप ( शैल ) , यह उन्हें सुन्दर लगे.
ईसा मसीह तक्षशिला विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं , वहां उन्होंने बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था और पांच नदियों के पंजाब प्रांत में जैन संतो के साथ समय व्यतीत किया. आगे बढ़ते हुए वे श्री जगन्नाथ पुरी पहुंच गए. वहां उन्होंने अनेक वर्षों तक ब्राह्मण गुरूओं से वेद , उपनिषद तथा मनुस्मृति की शिक्षा छह: वर्ष तक ग्रहण की.
इन शिक्षाओं को उन्होंने अपनी भाषा में अनुवाद कर उन्हें वहां पिछड़ी जातियों व शूद्रों को प्रशिक्षित करने लगे. क्रमशः उन्होंने राजगृह , काशी आदि तीर्थों की छह: वर्षीय यात्रा संपन्न कर कपिलवस्तु में प्रवेश किया.
वहां उन्होंने बौद्ध धर्म शास्त्रों का अध्ययन किया तथा परीव्रज्या करते हुए दुर्गम हिमालय के कुमाऊं , तिब्बत और लहासा के बौद्ध मंदिरों में रखे गुरुओं की रचनाओं , पांडुलिपियों का अध्ययन किया तथा नेपाल में उन्होंने छह: वर्ष व्यतीत बौद्ध धर्मो के ग्रन्थ अध्ययन में व्यतीत करते रहे.
फिर वे हिमालय पार कर लाहौर होते हुए सिंध प्रांत पहुंच गए. अन्त में कई देशों की यात्रा करते हुए जगह – जगह उपदेश देते हुए पश्चिम की ओर चले गए और अन्ततः पर्शिया होते हुए तीस वर्ष की आयु में वे अपने देश , पेलेस्टाइन वापस आकर वर्षों के आध्यात्मिक शिक्षण को अपने आत्मीय लोगों के मध्य प्रचारित करने लगे.
ईसा की इन शिक्षाओं को उनके चार शिष्यों – जॉन, ल्युक, मैथ्यू और मार्क ने ‘ नव व्यवस्थान ‘ संहिता में वर्णित किया है.
नाजरथ निवासी श्रीयुत ईसा मसीह के दिव्य जीवन पर लिखी गईं विभिन्न अख्याईकाओं के प्रति गहन श्रद्धा भाव है..
उनके जीवन दर्शन पर लिखित ग्रंथावलीयों में उच्चतर भाष्य ( Higher or Historical criticism ) तिहास एवम् साहित्य की दृष्टि से बाइबिल के विभिन्न अंशो की रचना , रचना – रचना काल तथा उनकी प्रामाणिकता के सम्बन्ध में विचार करने वाला साहित्य कहलाता है. पवित्र ग्रन्थ अर्थात् (Textual or Verbal criticism) बाइबिल के वाक्य एवम् शब्द राशि सम्बन्धी चर्चा से इसके प्रथक एवम् उच्चतर होने के कारण इसे ‘ उच्चतर भाष्य ‘ कहा गया है.
लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थित ‘ हेमिस मठ ‘ ईसा की दिव्य स्मृतियों से विजड़ित है. वे यहां रेशम मार्ग ( Silk Route ) से भारत आए थे. यह मठ इसी मार्ग में अवस्थित है.
इस मठ में ईसा मसीह ने सिद्ध निष्णांत गुरुओं के संरक्षण में शास्त्र अध्ययन और साधना करते हुए अनेक वर्ष व्यतीत किए थे. यहां उन्होंने पाली भाषा सीख ली थी. यहां उन्हें ‘ निर्वाण ‘ पद का गुह्य रहस्य ज्ञान प्राप्त हुआ था. लहासा के सबसे बड़े बौद्ध मठ में ताड़पत्र पर पाली भाषा में लिपिबद्ध प्राचीन दुर्लभ पांडुलिपि ग्रन्थ देखने को मिले__वह ईसा के जीवन से सम्बंधित हैं__हेमिस मठ में रखी पांडुलिपि , ईसा के जीवन के अज्ञातवास से सम्बंधित हैं.
उत्तर भारत स्थित विंध्याचल तीर्थ के निकट ईसा मसीह की भारत यात्रा और यहां रहकर योग की शिक्षा प्राप्त करने के सम्बन्ध में कुछ दस्तावेज नाथ सम्प्रदाय के योगियों के मठ में प्राप्त होते हैं.
इस मठ में योगियों के पास एक अति प्राचीन ‘ नाथ नामावली ‘ नाम की हस्तलिखित पांडुलिपि सुरक्षित रखी है. इस पांडुलिपि में ‘ ईशनाथ ‘ के नाम से ईसा कि समस्त जीवनी वर्णित है.
ईसा मसीह ने भारत में प्राय: सभी स्थानों में परिव्रजन कर वृहद भारत का दिग्दर्शन किया था. उन्होंने अपने भारतवर्षीय निवास काल में बारह वर्ष की आयु से लेकर तीस वर्ष की आयु तक अथाह ज्ञान , अलौकिक सिद्धियां और अपूर्व शान्ति की अवस्था को प्राप्त कर लिया था.
हिन्दू व बौद्ध धर्म के गंभीरतम स्थलों का अनुसंधान कर वे ,यहां के जन्मगत संस्कारों की अनिवर्चनीय सुन्दरता , साधुता तथा सरलता से प्रभावित हुए थे.
तीस वर्ष की उम्र में जब ईसा मसीह भारत से येरूशलम पहुंचे तो भेाैतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों से संपन्न महामानव बनकर पहुंचे__ ईसा जैसे तेजपुंज व्यक्ति के आध्यात्मिक आकर्षण का इतने समय तक छिपा रह पाना असम्भव था.
वे ऐसे सत्य अन्वेषी थे कि जहां रहते वहीं लोगों का ध्यान आकर्षित करते थे. उनकी इस आध्यात्मिक क्षमता से प्रभावित होकर लोगों कि भारी भीड़ सदैव उन्हें घेरे रहती थी. अपने मिशन का प्रचार करते हुए तीन वर्ष से कुछ अधिक ही बीते थे कि विरोधियों ने उन पर ईश निन्दा का आरोप लगाकर सूली पर चढ़ा दिया और घोषणा कर दी कि ईसा की मृत्यु हो गई किन्तु ईसा यौगिक शक्ति से समाधि अवस्था में चले गए थे तथा लोगों ने समझा कि वे मृत हो गए.
ईसा को जिस कब्र में रखा गया था, देखने पर वह खाली मिला. चमत्कार स्वरूप वे जीवित होकर गैलीलिया पर्वत पर चले गए जैसा कि बाइबिल में उल्लेख है कि , वहां पर ( अपने ) शिष्यों से मिलने के बाद वे लुप्त हो गए.
क्रूसविद्घ किए जाने एवम् पुनर्जीवित होकर अन्यत्र चले जाने के बाद उनका उपचार जड़ी बूटियों द्वारा किए जाने का उल्लेख हेमिस मठ में रखे दस्तावेजों में लिखा मिलता है , तथा ज्ञात होता है कि ईसा मसीह ने बौद्ध धर्म के अतिरिक्त नाथ सम्प्रदाय में भी दीक्षा ग्रहण की थी.
एक विवरण अनुसार पाया जाता है कि ईसा मसीह ने स्वयं को क्रूस विद्घ किए जाने के समय अपने प्राण समाधि में लगा दिए थे. वे समाधि में चले गए थे , जिससे लोगों ने समझा कि वे मृत हो गए हैं. उन्हें मृत समझकर कब्र दी गई.
नाथ सम्प्रदाय के महाचेतना नाथ , यहूदियों से बहुत क्रोधित थे क्योंकि ईशानाथ उनके शिष्य थे. महाचेतनानाथ ने ध्यानावस्था में देखा कि ईशानाथ को कब्र में बहुत कष्ट हो रहा है.
तब वे अपनी स्थूल काया को हिमालय में छोड़कर इसराइल पहुंचे और ईसानाथ को कब्र से निकाला. उन्होंने ईशानाथ को समाधि से जाग्रत किया.
महाप्रभु ईसा को जन्म ग्रहण किए प्राय: दो हज़ार साल बीतते हैं. इतने दीर्घ समय में अन्तिम वस्त्र जैसे स्मृति वस्तुओं का इतने समय तक स्थिर रह सकना असम्भव प्रतीत होता है क्योंकि इतने पतले ताने – बाने इतने मजबूत नहीं होते हैं कि इतने लम्बे समय के ऋतु प्रभाव को वे सहन कर सकें.
इस सम्बन्ध में एक चमत्कार स्तर का प्रभाव यह पाया गया कि ईसा को क्रूस पर से उतार कर जिस अन्तिम वस्त्र में लपेटा गया वह अभी भी सुरक्षित है.
इतना ही नहीं , उनके शरीर में कीलें ठोकने और कोड़े मारने से जहां तहां रक्त निकला था वहां वहां उस वस्त्र पर रक्त के धब्बे मौजूद हैं.यह वस्त्र चार मीटर लम्बा और एक मीटर चौड़ा है. इसे इस प्रकार लपेटा गया कि लम्बाई में पूरा शरीर ढंक जाए और पीठ की तरफ से उसे आगे लाकर छाती पर पुनः दुहरा कर दिया गया.
रक्त के निशान इस प्रकार बने हैं कि एक व्यक्ति को सीधा लिटाकर इस कपड़े को लपेटा जाए तो निशान ठीक वैसे ही लगेंगे जैसे कि उस पर इन दिनों बने हुए हैं.
यह वस्त्र पादरियों , गिरिजाघर और शाही खानदानों के कब्जे में इस प्रकार बना रहा जिससे उसमें कोई चोरी या जालसाजी न बन सके. तब से अब तक उस वैसे ही पवित्र भाव से माना और सुरक्षित रखा जाता रहा है. हाथ से बुने हुए वस्त्र के वैज्ञानिक पर्यवेक्षण के लिए बहुमूल्य उपकरण जुटाए गए.
Doctor John. H. Tailor ने इस शोधकार्य का पूरा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया. वैसे उनकी सहायता के लिए इससे सन्दर्भ रखने वाले छत्तीस वैज्ञानिक और भी थे. इन सभी को भलीभांति जांच परख लिया गया कि वे किसी धार्मिक पक्षपात से ग्रस्त तो नहीं है ?
पश्चात् ऐसे यंत्र , उपकरणों का प्रयोग किया गया जो सामान्य रासायनिक क्रियाओं से नहीं , वरन् किरणों के आधार पर रंग और रक्त का नए और पुराने का अन्तर करती थी__इस सन्दर्भ में कोई साठ प्रयोग हुए और वे संसार के मूर्धन्य समझे जाने वाली विभिन्न विषयों के प्रवीण पारंगतों के हाथ से गुजरे पर सच्चाई एक ही रही.
ईसा जैसे दृढ़ और सत्य परायण थे, उनका प्रमाण चिन्ह भी उतना ही प्रामाणिक निकला. यह हाथ का बुना वस्त्र अभी और एक हजार वर्ष सुरक्षित रह सकता है. अब तक इतनी लम्बी आयु किसी वस्त्र को नहीं मिली. रक्त के दाग़ भी ऐसे ही हैं मानो उन्हें लगे कुछ दशाब्दीयां ही बीती हों. सत्य के स्थायित्व कि यह अद्भुत प्रामाणिकता है.
Barringbone Linen नामक इस वस्त्र को Shroud of Turin कहा जाता है.
वर्तमान में यह वस्त्र , Cathedral of Saint John the Baptist, Turin, ( Italy ) में सुरक्षित रखा है. कैथोलिक चर्च श्राइन , वस्त्र को एक पवित्र अवशेष के रूप में मान्यता देता है.
सदा से भारत ही , ईसा मसीह का कार्य – कारण तथा लीला संदोह था. वे भारतमय हो गए थे. जिस समय ईसा मसीह को क्रूसविद्ध किया गया उस समय भारत के कुछ साधकों को अपने ह्रदय में अति कष्ट अनुभव हुआ था. क्रूसविद्घ होने के पश्चात ईसा मसीह पुनर्जीवित हो गए और अपनी मां ‘ मरियम मेरी ‘ तथा कुछ शिष्यों के साथ तक्षशिला होते हुए भारत में प्रवेश किया.
उन दिनों बृहत्तर भारत की सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान तक फैली हुई थीं. काश्मीर में ‘ मूरी ‘ नामक गांव में मरियम मेरी का स्वर्गवास हुआ था. वर्तमान में भी उस स्थल में मरियम मेरी का समाधि स्थल स्थापित है.
जिन दिनों ईसा मसीह ने भारत में दूसरी बार प्रवेश किया उस समय उत्तरी भारत में राजा शालीवाहन ( सन 39 से 50 ई. ) का शासन था. राजा गोपानन्द का ( सन 49 से 82 ई. ) एवम् कुषाण राजा कनिष्क का ( सन 78 से 103 ई. ) तक शासन था. कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर इंडो सिथियन राजवंशों की राजधानी थी. वहां अनेक धार्मिक , सांस्कृतिक , बौद्धिक और राजनीतिक संस्थाए थीं. ग्रीक और भारतीय दर्शन अपने चरम उत्कर्ष पर थे. उसी काल में महाराजा कनिष्क ने श्रीनगर से बारह किलोमीटर दूर ‘ हारान ‘ में विविध धर्मावलंबियों की एक महासभा बुलाई थी जिसे ‘ Counsel of Haran ‘ के नाम से जाना जाता है.
उस महासभा में विख्यात मनीषी व आयुर्वेद के ज्ञाता नागार्जुन के साथ ईसा मसीह भी उपस्थित थे.
ईसा मसीह के कश्मीर निवास काल से घनिष्ठ रूप से जुड़े कुछ सूत्र हैं :
लंदन स्थित ‘ British Museum ‘ में कुषाण कालीन मुहर को सुरक्षित रखा गया है. इसे भारत के कश्मीर से लाया गया था.
इस मुहर रूपी ईसाइयों की स्मृति चिन्ह में एक उच्च पदस्थ शक , घोड़े पर विराजित है तथा उसके हाथ में पवित्र ‘ क्रूस ‘ है. मुहर पर ‘ R_A ‘ अंकित है जिसका अर्थ राजा है. यह ‘ पदवी ‘ इंडो – सीथियनों ने धरी थी. हाथ में क्रूस पकड़ने का अर्थ दर्शित करता है कि यह पहली शताब्दी की एक ईसाई की है. पगड़ी मध्य एशिया की है.
इसी तरह कलकत्ता स्थित Queen Victoria के राजमहल में अठारहवीं सदी की कश्मीर से संग्रहित की गई , ईसा के ख्रीस्त धर्म से सम्बंधित दुर्लभ वस्तुओं को रखा गया है.
येरूशलम से भारत आने पर ईसा मसीह ने कश्मीर की घाटियों में अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत किया था.
कश्मीर से ईसा मसीह का विशेष लगाव था. उन दिनों भारत का वह भू भाग हर दृष्टि से इतना समृद्ध और खुशहाल था कि उसे धरती का स्वर्ग कहा गया था.
कश्मीर के स्थानीय लोग ईसा मसीह को ‘ युज आशफ़ ‘ नाम से सम्बोधित कर अत्यन्त श्रद्धा करते थे. वहां वे प्राय: एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रसन्न हो उपदेश करते हुए भ्रमण करते रहते थे. ईसा मसीह की प्रतिदिन की दिनचर्या में वे बहुत कम नींद लिया करते थे.
भोर में उठकर वे स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य प्रदान करते थे. सूर्य को वे ईश्वर कहा करते थे.वे नास लेकर अंतः प्रज्ञा वादियों के साथ बैठकर शास्त्र विचार करते थे. वे ध्यान मुद्रा में पद्मासन स्थिति में बैठते थे.उन्हें अनाहत नाद सुनाई दिया करता था.
श्रीईसा को ‘ इसाहिया ‘ के लेख पढ़ना प्रिय था. वे प्रतिदिन उसे बड़ी श्रद्धा से पढ़ते थे. उस लेख के निम्नांकित अंश यह उद्ध्रत किए जाते हैं –
“मेरे भीतर ईश्वरीय ज्योति प्रविष्ट हुई है__उसने मुझे गरीब लोगों को उपदेश देने के लिए मसीहा बनाया है__उसने मुझे भग्न हृदयों को सुखी करने, कैदियों को बन्धन मुक्त करने, अंधों को दृष्टि शक्ति और घायलों को सशक्त बनाने के लिए भेजा है.”
वे और भी कहा करते थे , –
“मनुष्य केवल अन्न से ही जीवित नहीं रहेगा बल्कि ईश्वर के मुख से निकलने वाले प्रत्येक शब्द से जीवित रहेगा.”
ईश्वर भाव में प्रत्यावर्तन के वास्तविक प्रेम ( Ideal patriotism ) की अभिव्यक्ति स्वरूप ईसा मसीह ने वैदिक चिन्तन धारा के एकेश्वरवाद सिद्धान्त को दैनंदिन जीवन में अपने महान कर्मो द्वारा लौकिक जीवन के साथ समन्वय करने की शिक्षा दी थी. इससे ईश्वर से अप्रभावित अनिश्ववरोपदिष्ट जन भी ईश्वर की ओर अर्थात् सत्य की ओर आकृष्ट हुए.
वे दुः खित जनों को सुख प्रदान करने के लिए प्रतिज्ञापन , रोग निवारक स्पंदन सम्प्रेषण तथा दैवी रोगमुक्ति की कामनाएं प्रतिदिन करते थे. उन्हें जड़ी बूटियों से बहुत प्रेम था. यह अलौकिक घटना है कि जड़ी बूटियां, स्वयं उन्हें अपने गुण धर्म बताकर बात किया करती थी.
श्रीनगर से कुछ दूर एक गुहा है जहां ईसा मसीह , प्राय: गहन ध्यान में डूबे हुए बहुत समय तक बैठे रहते थे. इस गुहा के द्वार पर एक सुंदर भवन निर्मित हैं. वह स्थान ‘ईश मुकाम ‘ नाम से प्रसिद्ध है. वहां मूसा का बहुमूल्य दण्ड ( छड़ी ) रखा था जो परम्परा से ईसा मसीह को मिला था. कश्मीर और अफगानिस्तान की सीमा पर एक ‘ ईसा तालाबा ‘ नामक तीर्थ स्थल है जहां अब भी प्रतिवर्ष मेला लगता है और श्रद्धालु भक्त ईसा मसीह की स्मृति में दान पुण्य करते हैं.
ईसा मसीह ने अस्सी वर्ष की आयु में कश्मीर के श्रीनगर में स्वस्थ्य शरीर से महाप्रयाण किया था. इस जगत में उनका कार्य अब पूरा हो गया था. अन्तिम काल में ईसा मसीह को ब्राह्म की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई थी. उन्होंने सभी प्राणियों को ब्रह्म की अभियक्तियों के रूप मे देखा था. यह ईसा का सांध्य संगीत नहीं था वस्तुत: वे ब्रम्ह के साथ एक्यानुभुती कर उनमें मिलित हो गए थे.
वे अपने सूक्ष्म देह मन्दिर से अब भी मानव जाति को ईश्वर से प्रेम करने का संदेश दे रहे हैं. उन्होंने देखा कि शरीर एक आवरण मात्र है , मानो वे अब गंगायात्री होने को प्रस्तुत हो रहे थे. यह श्रीईसा के सर्वज्ञ जीवन की परिसमाप्ति नहीं थीं बल्कि परिपूर्णता के दैवी अदृष्ट विधान की प्रथक प्रथक धाराएं थी जिन्होंने आत्मदर्शी अभ्यासी साधकों के बाह्य प्रकृति एवं अन्तर्जगत को प्रभावित किया था.
जिस स्थान में उन्होंने अपने प्राण त्याग किए थे वह स्थल श्रीनगर के खानयार क्षेत्र में पारम्परिक बहुस्तरीय ठोस प्रस्तर से निर्मित एक प्रासाद है , जिसे ‘ रोज़ाबल – Rauza Bal ‘ कहा जाता है, स्थित है. यहां ईसा मसीह के पद चिन्ह , एक प्रस्तर पर उत्कीर्ण हैं दूसरी ओर पवित्र ‘ क्रूस ‘ चिन्ह उत्कीर्ण है. यहूदी परम्परा अनुसार ईसा मसीह के समाधि स्थल जिसे ‘ कब्र ‘ कहा जाता है वह North – East ( उत्तर – पूर्व ) दिशा अनुसार निर्मित है. पूर्व में इस पवित्र समाधि स्थल पर लाल रंग का वस्त्र चढ़ा हुआ रहता था.
कश्मीर में ईसा मसीह ‘ यूसा आसफ ‘ नाम से प्रख्यात थे. उनके पवित्र कब्र पर यहूदी भाषा, हिब्रू में प्रस्तुत वाक्य लिखा है ,- ‘यह यूसा-आसफ़ की कब्र है जो दूर देश से यहां आकर रहा.’
ईसा मसीह के महाप्रयाण के अनेक सदियों पश्चात् विज्ञान और प्रद्योगिकी के छेत्र में संसार ने विस्मय जनक विकास किया है , जिसने जीवन शैली में सुख प्रदान कर दिया है. महापुरुषों की शिक्षाएं , सत्य – प्रेम – करुणा आज भी प्रासंगिक है. स्वर्ण – रजत – चन्दन – किमख्वाब – जरी – कम्बल – सिल्क – इत्र – धूप – औषधि प्रलेप – नील – चावल – मसाले – रत्न आदि ईश्वर की अद्भुत सृष्टि के उपहार है जो मानव जीवन की यात्रा में सहयात्री हैं.
इन विविध वस्तुओं के जनक ईश्वर है. इन सब के जनक, – ईश्वर से हमें प्रेम करना होगा.
प्राचीन भारत में ( यहां हम अधिक दूर न जाकर उन्नीसवीं सदी के सत्वगुणी और रजो गुणी समाज की तत्कालीन क्रियाकलापों , चेष्टाओं के विषय में जीवन क्रम पर वार्ता करेंगे )
ईसा मसीह और उनके भाव प्रचार तथा तत्कालीन समय के दैनिक जीवन क्रम के चित्रों को हम यहां देखने का प्रयत्न करेंगे.
भारत में सर्वप्रथम दक्षिण के क्रांगानोर में ईसा मसीह का भाव प्रचार उनके अनुगत शिष्य थामस ने किया था.
‘ थामस ‘ ने दक्षिण भारत में दुःखी असहाय और निर्धन लोगों की सब प्रकार से सेवा की थी. थामस ने मद्रास के मयलापुर में इहलीला संवरण किया था. बाद में उसके अस्थि अवशेषों को इडेसा सीरिया के जाया गया था.
वे कश्मीर के श्रीयुत राबर्ट माईकेल नामधारी शिष्य , ईसा मसीह के एक अनुयाई थे जो यौगिक साधनाएं किया करते थे. स्वप्न में उन्हें ईसा मसीह ने उन्हें कुछ उपदेशादि दिए थे इस अनुसार वे पवित्र अग्नि में ताज़ी जड़ी बूटियां डालकर वातावरण को सुगन्धित करते थे.
Allan Octavian Hume ( 1829-1912) नामक एक ब्रिटिश ईसाई भद्र पुरुष थे. इनकी बहुत उच्च अध्यात्मिक उन्नत अवस्था थी , वे वायवीय शरीर धारण कर पूज्य गुरुदेव से भेंट परामर्श करने पहुंच जाया करते थे. वे बंगाल कि एशियाटिक सोसायटी के सदस्य थे. तथा ईस्ट इंडिया कम्पनी के शाही सिविल सेवक, पक्षी विज्ञानी व वनस्पति शास्त्री थे. Hints on Esoteric Theosophy नाम से उन्होंने एक ग्रन्थ लिखा था.
प्राचीन समय में कैथोलिक ऑर्थोडॉक्स प्रोटेस्टेन्ट तथा अनेक शाखाओं के अनुरागी योरोपीय वेशभूषा ग्रहण करते थे अर्थात् कोट – सिली हुई बटनों वाली रबर युक्त कमीज़ – कॉलर – पतलून – मोजे – लैदर के बूट जूते – हैट और छड़ी – आप्टिक ग्लास – स्विस जेब घड़ी.
वे भोजन करते समय छुरी कांटे और एप्रिन का उपयोग करते थे. वे लोग तीन बार , सुबह – दोपहर और शाम को स्नान करते थे.
नवयुवक और नवयुवतियां उन दिनों The Sermons and Prayer ‘ तथा The precepts of Jesus ; a Guide to Peace and Happiness. आदि ग्रन्थ पढ़ा करते थे इनमें से एक ग्रन्थ ‘ एकेश्वरवाद ‘ का प्रतिनिधित्व करता था और दूसरा ईश प्रार्थना और ध्यान की विधियां प्रकट करता था.
ऐसे असंख्य धार्मिक स्वभाव के लोग उस समय थे जो ईसा मसीह से सीधे संबद्ध न होते हुए भी उनके अपूर्व आध्यात्मिक कृपाओं से प्रभावित थे तथा वे सभी उन्हें पवित्र आत्मा के रूप में ग्रहण करते थे , तथा तीन धाराओं में उनका जीवन चालित हुआ करता था –
(१) ईश्वर निष्ठा (२) पैगम्बर , धर्म गुरु अथवा अवतार में विश्वास (३) ग्रन्थ विशेष या धर्म शास्त्र में विश्वास.
उन दिनों हिन्दू धर्म के अनुययियों के लिए यह गौरव पूर्ण बात थी कि उनकी पवित्र भाषा संस्कृत में अंगरेजी Meyo Exclusion का कोई पर्यायवाची शब्द नहीं था , और ये बात वे अपने समवयस्क नए नए बने इंग्लिशतानी जैंटलमैंनों को बड़े गर्व से बताते थे.
संध्या समय भगवत – मनुष्य ( God – man ) का स्मरण करने के लिए प्रार्थना की स्वर लिपि देखकर
पियानो , हारमोनियम अथवा आर्गन आदि विदेशी मूल का बाजा बजा कर प्रार्थना की जाती थी. यह कर्णप्रिय होता था.
दिव्य अतिथि Divine visitor त्राणकर्ता के समक्ष सांध्य आत्मगोष्ठी में सुगन्धित मोमबत्ती ज्वालित की जाती थी. क्वेकर ( Quaker ) सम्प्रदाय के अनुयाई जनसाधारण में घूमते हुए ‘ ख्रीस्त संहिता ‘ ग्रन्थ बेचा करते थे. वे कहते थे – ‘ कौन है प्रभु की दुहाई , कृपया पढ़िए ‘
प्रार्थना ग्रहों में संगीत अनुष्ठान के प्रवर्तन के लिए कलकत्ता के डलहौजी स्क्वेयर में स्थित Harold & Co. फर्म
से जर्मन रीड के हारमोनियम मंगवाए जाते थे. नैनगिलाट , जीन तथा लिनन वस्त्रों से निर्मित कपड़ों को प्रार्थना के समय धारण किया जाता था.
William Adam ( 1796-1881 ) एक भद्र ब्रिटिश पुरुष तथा एकेश्वरवादी चर्च से सम्बंधित थे. वे उपनिषद और वैदिक ग्रंथों से अत्यन्त आकृष्ट थे. वे इनका अध्ययन करते थे और निराकार ईश्वर के ध्यान में मग्न हो भावस्थ हो जाते थे.
इन्हे भारतीय संस्कृति से प्रेम था. वे ईसा मसीह को भारत की अवतार परम्परा के अन्तर्गत उनमें श्रद्धा निवेदित करते थे. (चेतना विकास मिशन).

