अग्नि आलोक

गुणसूत्र वंश के दर्शन का विज्ञान

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार

     _हमारी परंपरा के अनुसार पुत्र को कुलदीपक अथवा वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है : अर्थात गोत्र का वाहक।_

   क्या आप जानते हैं कि आखिर क्या कारण होता है कि सिर्फ पुत्र को ही वंश का वाहक माना जाता है?

   असल में इसका कारण पुरुष प्रधान समाज अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं, बल्कि, हमारे जन्म लेने की प्रक्रिया है।

*जन्म लेने की सूक्ष्म प्रक्रिया :*

       स्त्री में गुणसूत्र (Chromosomes) XX होते है और पुरुष में XY होते है।

        इसका मतलब यह हुआ कि अगर पुत्र हुआ (जिसमें XY गुणसूत्र है) तो उस पुत्र में Y गुणसूत्र पिता से ही आएगा क्योंकि माता में तो Y गुणसूत्र होता ही नही है।

     यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है।

XX गुणसूत्र अर्थात पुत्री।

अब इस XX गुणसूत्र के जोड़े में एक X गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा X गुणसूत्र माता से आता है, तथा, इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है… जिसे Crossover कहा जाता है।

जबकि पुत्र में XY गुणसूत्र होता है।

    अर्थात जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि पुत्र में Y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में Y गुणसूत्र होता ही नहीं है।

 दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारण इन दोनों गुणसूत्र का पूर्ण Crossover नहीं बल्कि केवल 5% तक ही Crossover होता है। और 95% Y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही बना रहता है।

 इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण Y गुणसूत्र हुआ… क्योंकि Y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है।

     बस इसी Y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था।

      इस तरह ये बिल्कुल स्पष्ट है कि हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है अथवा Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है।

उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र शांडिल्य है तो उस व्यक्ति में विद्यमान Y गुणसूत्र शांडिल्य ऋषि से आया है…  या कहें कि शांडिल्य ऋषि उस Y गुणसूत्र के मूल हैं।

     अब चूँकि Y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है इसीलिए विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है।

       वैदिक संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई-बहन कहलाएंगे क्योंकि उनका पूर्वज (ओरिजिन) एक ही है… क्योंकि एक ही गोत्र होने के कारण दोनों के गुणसूत्रों में समानता होगी।

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी यदि समान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी संतान, आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी।

     क्योंकि ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता एवं ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है।

     विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं।

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