शशिकांत गुप्ते
सीतारामजी आज सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म मेरा नाम जोकर का यह गीत गुनगुना रहें थे। इस गीत के गीतकार हैं,प्रख्यात गीतकार स्व.नीरजजी
ए भाई ज़रा देखके चलो,
आगे ही नहीं पीछे भी
दायें ही नहीं बायें भी
ऊपर ही नहीं नीचें भी
यह फ़िल्म इस फ़िल्म नाटकीय रोमांस है। मुख्य कथानक ने एक विदूषक का रोल अदा किया है।
फ़िल्म के निर्माता राजकपूर को फिल्मी दुनिया का शो मेन ही कहा जाता था।
इस गीत में दुनिया को एक सर्कस कहा है।
इनदिनों दुनिया सर्कस है या नहीं? यह कहना असंभव है,लेकिन देश की राजनीति में सर्कस जरूर दिखाई दे रही है।
सन 2014 में एक नए शो मेन का उदय हुआ है?
यह सर्कस संस्कार,संस्कृति और राष्ट्रवाद का जामा ओढ़ कर दिखाई जा रही है।
इस सर्कस में ना तो कोई रिंग मास्टर है,ना ही पशुओं के करतब दिखाए जा रहें हैं।
इस सर्कस में अजबगजब जादुई करिश्मे जरूर दिखाए जा रहें हैं।
यहाँ आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे,विभिन्न अपराधियों,बेतरतीब वाहन चलकर राहगीरों को परलोक पहुँचाने वालों को पाकसाफ बनाया जाता है।
और जो कोई सवाल करेगा?
उसपर तरह तरह की जाँच एजेंसियों से जाँच की जाएगी।पड़ौसी देश पाक चले जाने की धमकी दी जाएगी?
सर्कस शुरू होने के पूर्व विज्ञापन किए गए। ना तो खाऊंगा ना ही खाने दूंगा। इस स्लोगन में यह स्पष्ट नहीं किया गया कौन सी चीज ना खाऊंगा ना ही खाने दूंगा। कारण अंदरखाने तो मेजवानी अनवरत चल ही रही है।
ऐसा विरोधियों का आरोप है।
कोई हरतरह से भ्रष्टतम भी हो,एक बार इस सर्कस के तंबू में प्रवेश कर लेता है,उसके सारे पाप धुल जातें हैं।
मैने सीतारामजी से पूछा यह सब होता कैसे है?
सीतारामजी ने जवाब दिया हर किसी के लिए सम्भव नहीं हैं।इसके लिए जन्म कुंडली में नव के नव ग्रह ही बलवान होने चाहिए।
कहावत हैं न जिसके नो के नो ग्रह बलवान होतें हैं ……?
यही तो ये नई सर्कस है।
उक्त गीत की ये पंक्तियां बहुत महत्वपूर्ण है।
कैसा है करिश्मा,कैसा खिलवाड़ है
जानवर आदमी से ज्यादा वफादार है
खाता है कोड़े भी रहता है भूखा भी
फिर भी वो मालिक पर करता नहीं वार है
और इंसान यह-माल जिसका खाता है
प्यार जिससे पाता है,गीत जिसके गाता है
उसी के सीने में भोकता कटार है
इस कहावत के साथ पूर्ण विराम।
ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखतें है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

