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*नागरिकों को न्याय नहीं मिल रहा है भारत में न्यायालयों से?*

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सनत जैन

भारत में न्यायालयों से नागरिकों को न्याय नहीं मिल रहा है? न्यायालय अब अन्याय के प्रतीक के रूप में हैं। सरकार जिस तरह से नियम कायदे और कानून बना रही है। उसके कारण मुकदमों की संख्या भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ती जा रही है। भारत की न्यायालयों में सबसे बड़ी मुकदमेबाज सरकार है। सिविलकोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बाद विभिन्न न्यायाधिकरण, नियामक आयोग, लोक अदालत जैसे न्याय के कई द्वार आम जनता के लिए खोल दिए गए हैं। लेकिन यह सभी नागरिकों के लिए एक बड़ी मुसीबत बने हुए हैं।

तारीख पर तारीख मिलती है, समय पर न्याय नहीं मिलता है। 2024 में लोक अदालत में 10.45 करोड़ मामले लंबित थे 2023 में 8.53 करोड़ तथा 2022 में 4.19 करोड़ मुकदमे सुनवाई के लिए आए थे। दावा है, लोक अदालत में अभी तक 23 करोड़ मुकदमों का निपटारा किया गया है। सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट और जिले की अदालतों में अभी भी 5.3 करोड़ मामले लंबित हैं।

विभिन्न ट्रिब्यूनल, नियामक आयोग और अन्य न्यायाधिकरणों की बात अलग है। उनके बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। न्यायालयों में फर्जी मुकदमों की बाढ़ आई हुई है। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में अब शपथ पत्र का कोई औचित्य नहीं रह गया है। झूठा शपथ पत्र देने पर सरकार पर कभी कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा कभी दिखता नहीं है। हां कोई कमजोर व्यक्ति यदि गलत शपथ पत्र दे देता है, तो उसको जरूर हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट से दंडित कर दिया जाता है। जेल के 70 फ़ीसदी कैदी अंडर ट्रायल में जेलों में बंद है। आम आदमी की बहुत बड़ी कमाई मुकदमे बाजी में खर्च हो रही है।

पुलिस, वकील, जज और पेशी में आने जाने में आदमी अपने जीवन की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च कर रहा है। उसके बाद भी जैसे एक बार न्यायालय का भूत लग जाता है, तो वह आसानी से पीछा नहीं छोड़ता है। एक बार पेशी शुरू होती है, तो कई वर्षों तक खत्म नहीं होती है। अदालत में सबसे बड़ी मुकदमे बाद अब सरकार बन गई है। विद्युत मंडल, नगर निगम, राज्य सरकारें पुलिस के मुकदमे अदालते में पहुंच रहे है। अदालत में जजों की संख्या मुकदमों के अनुसार तय नहीं होती है।

जो स्वीकृत पद हैं, उनमें भी 30 से 40 फ़ीसदी पद हमेंशा खाली पड़े रहते हैं। सही मायने में सरकार जो नियम कायदे कानून बनाती है, वही मुकदमों को बढ़ाने वाले होते हैं। नियम एवं कानून में इतने बट किंतु परंतु रहते हैं, जिसके कारण भ्रष्टाचार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। न्यायालयों में लंबे समय तक न्याय नहीं मिलने के कारण अब लोग अन्याय का शिकार हो रहे हैं। आम आदमी के मौलिक अधिकारों को लगातार सीमित किया जा रहा है। हर क्षेत्र में सरकारी दखलदांजी बढ़ती चली जा रही है। न्यायालय मैं बैठे जज असंवेदनशील हैं।

न्यायालयों में भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। जमानत और स्टे के रूप में भारी भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी देखने को मिल रही है। जिसके कारण लोग कहने लगे हैं, न्यायालय जाने से न्याय तो मिलता नहीं है। इसलिए जो हो रहा है, उसे या तो स्वीकार कर लो, लड़ोगे तो जो है वह भी खत्म हो जाएगा। हाल ही में राहुल गांधी ने एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा, वोट चोरी के मुद्दे पर वह सबूत के साथ अपना पक्ष नेता प्रतिपक्ष के रूप में रख चुके हैं। देश में अन्य संवैधानिक संस्थाएं हैं, उनकी भी जिम्मेदारी है, वह भी अपने कर्तव्य का पालन करें। यह कहकर एक तरह से उन्होंने न्यायपालिका और अन्य जांच एजेंसियों को निशाने पर लिया। श्रीलंका बांग्लादेश और नेपाल में न्यायपालिका के प्रति लोगों का गुस्सा फूटा है। न्यायपालिका पर जब तक आस्था और विश्वास रहेगा तभी तक वह अस्तित्व में रहेंगे। जिस तरह से न्यायपालिका सरकार और पूंजीपतियों के हित में काम करती हुई दिख रही हैं।

आम आदमी पूरी तरह से न्याय के मंदिर में उपेक्षित है। 5-5 साल से बिना किसी चार्जशीट के युवा और छात्र जेलों में बंद है। गरीबों को न्यायालय से न्याय नहीं मिल रहा है। गरीब सरकार और सक्षम लोगों के उत्पीड़न का शिकार हो रहा है। सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट अपने दिए गए निर्णय का पालन सरकार से नहीं करा पा रहे हैं। न्यायालयों में जिस तरह से वंशवाद, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अकर्मणयता असंवेदनशीलता तथा संविधान के प्रति गैर जिम्मेदारी देखने को मिल रही है। उससे न्याय पालिका की पहचान आम लोगों के बीच है। न्यायालयों की कार्यप्रणाली में सरकारों का हस्तक्षेप बढ़ रहा है। न्याय की देवी की आंखों से काली पट्टी हटा दी गई है। अब खुली आंखों से न्यायाधीश न्याय कर रहे हैं। मनचाहा न्याय उन्हीं लोगों तक पहुंच रहा है, जो समाज में सक्षम है।

न्यायालय की तराजू का एक पलडा सरकार, नेताओं और पूंजीपतियों की ओर झुका नजर आता है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बैठे हुए जज सरकार के खिलाफ फैसला देने से डरते हैं। सरकार जो चाहती है, उसी तरह के निर्णय आने लगे हैं। वर्तमान स्थिति में न्यायपालिका को अपने अस्तित्व को बचाए रखना है, तो उसे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को समझना होगा। जिस तरह से भीड़तंत्र खुद न्याय का प्रतीक बन रहा है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के साथ-साथ यूरोपीय देशों में भी भीड़ तंत्र की ताकत अब न्याय करती हुई दिख रही है।

भारतीय न्यायपालिका को वर्तमान स्थिति में गंभीरता के साथ विचार करना होगा। सरकार को भी सोचना होगा, नियम और कानून का पालन, जनता नहीं करेगी तो ऐसी स्थिति में सरकारों का भी, अपना वजूद बनाए रखना संभव नहीं होगा। भारत की न्यायपालिका को संविधान एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है। आशा है, न्यायपालिका संविधान प्रस्त जिम्मेदारी का ईमानदारी के साथ पालन करेगी।

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