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सहकारिता तपस्वी लक्ष्मण माधवराव इनामदार

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प्रदीपजी पाल, लेखक, लखनऊ
सहकारिता तपस्वी लक्ष्मण इनामदार का जन्म वर्ष 1917 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के खटाव गांव में हुआ था। भारतीय पंचाग के अनुसार इनकी जन्म की तिथि को ऋषिपंचमी थी। वह एक संत की तरह अपने ऋषि तत्व को जीवन जीकर चरितार्थ करते रहे। यह इनके महान त्यागी तथा उज्जवल चरित्र से सदैव मेल खाता रहा। इस अवसर पर एक गीत की पंक्ति इस महापुरूष के सम्मान में प्रस्तुत है – निर्माणों की पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूले, स्वार्थ साधना की आंधी में हम वसुधा का कल्याण न भूले।


लक्ष्मणराव जी को वकालत की पढ़ाई करने की वजह से वकील साहब के नाम से संबोधित किया जाता रहा। वह स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राष्ट्र को संस्कारित करने में ताउम्र पूरे मनोयोग से लगे रहे। इन्हांेने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हक में अदालत में डटकर दलील देने का आड़े वक्त पर अनुकरणीय कार्य किये। संघ अबाध गति से राष्ट्र निर्माण का काम करता रहे इसमें लक्ष्मणराव इनामदार का योगदान विस्मरणीय है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी शुरूआती जीवन में ही संघ तथा स्वयंसेवी लक्ष्मणराव जी के तपमय तथा सेवामय जीवन के प्रभाव में आ गए थे। मोदी जी ने उनकी अनुशासित जीवनशैली को लम्बे समय तक काफी नजदीक से देखा था। लक्ष्मण राव जी का व्यायाम से दिनचर्या आरंभ करना, ज्यादा से ज्यादा लोगों से पूरी आत्मीयता के साथ मिलना, उनको सदैव याद रखना और अनुशासित रहकर अथक मेहनत करना जीवन का मूलमंत्र था। इस जीवन शैली को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक सच्चे साधक के रूप में खुद के जीवन में भी पूरी तरह आत्मसात कर लिया था।


इनामदार जी में पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से सहकारिता तथा सहकार के गुण बाल्याकाल से ही विकसित हुए थे। सहकार में सबके साथ मिलकर रहने, चलने और जीने की बात प्रमुख है। सहकारिता में सबको साथ लेकर चलने का बीज प्रमुख तत्व है। सहकारी उद्यमिता में कोई एक मालिक नहीं होता। बल्कि सबको साथ लेकर किए गए उद्यम से मिले लाभ में सबकी बराबर की हिस्सेदारी होती है। वकील साहब के पिता श्री माधवराव इनामदार का पैतृक परिवार बहुत बड़ा था। छह बहनें थी। उनमें से चार बहनें ब्याह के बाद असमायिक विधवा होकर मायके लौट आई। उनके साथ आए बाल बच्चों की जिम्मेदारी मामा श्री माधवराव के सिर पर ही थी। पिता श्री माधवराव कैनाल इंस्पेक्टर थे। पूरी ईमानदारी से सरकारी नौकरी करने वाले उनके पिता की आय सीमित थी। फिर भी वह पूरे समभाव से इस बड़े परिवार की परवरिश अपना परम दायित्व समझकर करते थे।
लक्ष्मणराव की सात साल की उम्र में स्कूल में दाखिला लिया। सन् 1929 में सतारा के न्यू इंग्लिश स्कूल में दाखिल हुए। वर्ष 1939 में सतारा शहर में लक्ष्मणराव के एल.एल.बी. करते समय हैदराबाद निजाम के विरूद्ध आंदोलन जोरों पर था। लक्ष्मणराव ने 150 महाविद्यालयीन छात्रों के साथ आंदोलन में भाग लिया। उन दिनों सोलापुर में मार्शल ला लगाया गया, जिसमें देश भक्त मलाया शेट्टी के साथ तीन लोगों को फांसी दे दी गई। यह सब लक्ष्मणराव के बालपन से युवा होने के दौर में घट रहा था। उससे तटस्थ रहना लक्ष्मणराव और उनकी युवा मंडली के लिए संभव नहीं था। सामाजिकता और अंग्रेज के अन्याय के खिलाफ उग्र होती संवेदनशीलता जोर पकड़ रही थी। इसे देख-सुनकर वह अक्सर मंडल के साथियों से कहते स्वतंत्रता संग्राम में हमें अपनी आहुति बढ़चढ़ कर देने के लिए हर पल पूरी तरह तैयार रहना चाहिए।
देश भक्ति से भरे लक्ष्मणराव इनामदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डा. केशव हेडगेवार के संपर्क में आए। संघ की स्थापना 27 सितंबर सन् 1925 में विजयादशमी के दिन डा. केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी। डा. हेडगेवार से दीक्षा लेकर उन्होंने संघ कार्य में अपने पूरा जीवन को समर्पित कर दिया। बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है। संगठन भारतीय संस्कृति और नागरिकों के मूल्यों को बनाए रखने के आदर्शों को बढ़ावा देता है। संघ निःस्वार्थ भाव से स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रकार से मानव जाति की सेवा कर रहे हैं। वर्तमान में केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की यह पैतृक संस्था है। 1943 में महाराष्ट्र के अनेक युवक एक वर्ष के लिए संघ के प्रचारक बने। उनमें से एक वकील साहब को गुजरात में नवसारी नामक स्थान पर भेजा गया। संघ प्रचारक के रूप उनका एक वर्ष से लेकर जीवन की अंतिम सांस तक सहकारिता यौद्धा की तरह जीने का सिलसिला चलता रहा। 1952 में वह अपने त्याग तथा कठोर परिश्रम के बलबुते गुजरात के प्रांत प्रचारक बने। उनके परिश्रम से अगले चार साल में वहां 150 शाखाएं हो गयीं। वे शरीर, मन, मस्तिष्क तथा आत्मा को बलिष्ठ तथा संतुलित रखने के लिए आसन, व्यायाम, ध्यान, प्राणायाम तथा साप्ताहिक उपवास आदि का निष्ठा से पालन करते थे।
अस्सी के दशक में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सहकारी आंदोलन में शामिल होने के लिए “सहकार भारती” नामक प्रकल्प की शुरूआत की तो वकील साहब उसके पहले अखिल भारतीय महासचिव बनाए गए। देशवासियों में सहकार की भावना जगाने में वकील साहब की भूमिका अति महत्वपूर्ण थी। सहकार भारती की आज देश के 400 जिलों और 725 ताल्लुकाओं में मजबूत इकाईयां हंै। सहकारी आंदोलन से जुड़े तमाम हस्तियों ने महसूस किया कि आने वाले दिनों में सहकार भारती जल्द ही खुद को देश की अग्रणी सहकारी संस्था के तौर पर परिवर्तित कर लेगी। वकील साहब के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए अगले दस साल में सहकार भारती को सहकारिता क्षेत्र

की अव्वल संस्था बना लेने की कार्ययोजना की रूपरेखा तय की गई। वकील साहब के सहकारिता क्षेत्र में बेमिसाल योगदान को देखते हुए भारत सरकार के कृषि विभाग ने उनके नाम पर राष्ट्रीय पुरस्कार की घोषणा की है। देश कृषि सहकारिता क्षेत्र में अग्रणी काम करने वाले शख्स को यह पुरस्कार हर साल दिया जाता है।
वकील साहब के संपर्क की सच्ची तथा रोचक कहानी पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सेतुबंध के नाम से वर्ष 2000 में प्रेरणादायी पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई द्वारा किया गया था। प्रधानमंत्री मोदी जी अक्सर बताते है कि वकील साहब की दिनचर्या और व्यक्तित्व उनको सदा प्रभावित करता रहा है। ऐसे दिग्दर्शक की प्रेरक पाठशाला से निकले प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के चरित्र का दृढ़ तथा ओजस्वी दिखना असहज नहीं है। भगवत गीता के कर्मयोग में विश्वास करने वाले वकील साहब ने अपनी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने में कभी भी उपेक्षा नहीं की। उन्होंने समाज के बीच में रहते हुए एक संत, एक तपस्वी तथा एक कर्मयोगी का उच्चतम जीवन सदैव सफलतापूर्वक जीआ।
संघ के सरसंघ संचालक श्री मोहन भागवत ने सहकार भारती के एक सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा था कि सहकार भाव के सबसे बड़े प्रणेता वकील साहब थे। वसुधैव कुटुम्बकम् के विचार को जीने वाले वकील साहब का सबको अपने परिवार का मानकर चलने का स्वाभाविक स्वभाव था। उनके इस व्यापक परिवार रूपी समाज में आत्मीयता, प्यार तथा सहकार था। सहकार भारती संस्था को उन्होंने अपनी प्राण ऊर्जा से व्यापक विस्तार दिया। देश भर में हरित क्रान्ति तथा श्वेत क्रान्ति के मूल में सहकार भाव का विशेष योगदान है। वैसे तो सहकारिता विचार का जन्म विदेश में हुआ ऐसा बताया जाता है। लेकिन मेरे विचार से सहकारिता विचार का जन्म वास्तव में प्राचीन भारत के संयुक्त परिवार की मानवीय सोच से ही हुआ है।
वर्तमान में हम सहकारिता का जो स्वरूप देख रहे है वह उसका बाहरी कलेवर मात्र है। सहकारिता का वास्तविक स्वरूप उसके सहकार भाव में छिपा है। यह सहकार तथा सेवा भाव से जो आन्तरिक आनंद व्यक्ति को प्राप्त होता है उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। बस उस असीम आनंद को सेवा के दौरान महसूस किया जा सकता है। यह मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह अपने अंदर के इस संगीत को अभिव्यक्त किये बिना संसार से विदा हो जाता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने जन्म के महान उद्देश्य का समझना चाहिए। जन्म का महान उद्देश्य हर पल सेवा करते हुए अपनी आत्मा का निरन्तर विकास करना है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वकील साहब की जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर कहा था कि वकील साहब ने व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण तथा राष्ट्र निर्माण का एक सही रास्ता मानव जाति को अपने जीवन के द्वारा स्वयं जीकर दिखाया था। ये मेरा सौभाग्य रहा है कि मुझे अपने जीवन का बड़ा कालखंड उनके साथ बिताने का अवसर मिला। जवानी के अनेक वर्ष उन्हीं के मार्गदर्शन में काम करता रहा। इसलिए मेरे लिए वकील साहब का जीवन एक नित्य-प्रेरणा का स्रोत रहा है। जब मैं उनके जीवन पर एक किताब लिख रहा था 25-30 साल पहले की बात है। वकील साहब ने जिस भाव तत्व, संस्कार तत्व तथा संवेदनशीलता को सहकारिता आंदोलन से जोड़ने का आग्रह किया है। उन मूलभूत तत्वों तथा मूलभूत विचारों को साथ लेकर हम सहकारिता आंदोलन को समान भागीदारी के साथ आगे बढ़ाने के लिए कार्य करेंगे।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा कि यह एक नया भारत है, जहां युवाओं का सरनेम मायने नहीं रखता है. जो मायने रखता है, वह है उनका अपने उच्चतम कौशल से पहचान बनाने की क्षमता। प्रधानमंत्री ने कहा, न्यू इंडिया में कुछ चुनिंदा लोगों की नहीं, बल्कि हर भारतीय की आवाज सुनी जाती है। यह एक ऐसा भारत है, जहां किसी भी व्यक्ति के लिए भ्रष्टाचार कभी भी एक विकल्प नहीं है। यहां योग्यता ही आदर्श है।
प्रधानमंत्री जी का भ्रष्टाचार मुक्त न्यू इण्डिया का संकल्प सहकारिता का ही एक व्यापक विस्तार है। इस दिशा में भारत सरकार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर के अन्तर्गत अनेक योजनाआंे के लाभार्थी को पैसा सीधे उसके खाते में भेज रही है। सहकार भाव में सबके साथ मिलकर रहने, चलने और जीने की बात प्रमुख है। सहकारी उद्यमिता में कोई एक मालिक नहीं होता। बल्कि सबको साथ लेकर किए गए उद्यम से मिले लाभ में सबकी बराबर की हिस्सेदारी होती है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रान्सफर योजना का विस्तार देश के प्रत्येक वोटर तक होना चाहिए।
सहकारिता तपस्वी वकील साहब का 15 जुलाई, 1985 को पुणे में देहान्त हुआ था। देह रूप में आज वह हमारे बीच नहीं है लेकिन मानव जाति उनके वसुधैव कुटुम्बकम् से ओतप्रोत सहकार भाव से युगों-युगों तक लाभान्वित होती रहेगी। वकील साहब जैसे महापुरूष अपने त्याग, सादगी, सहकार और बलिदान से भरे लोक कल्याणकारी कार्यों से सदैव मानव जाति का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

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