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रंग_समाजिक_वर्ण_व्यवस्था_का_ड्रेस_कोड

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ऐश 

सनातन धर्म जो भारत  का धर्म नहीं था  वो आर्यो का पर्सनल धर्म था उस धर्म का कोइ नाम  भी  नहीं था  बस उनके तंत्र मन्त्र होते थे  उनकी पूजा अर्चना थी  उनके पूर्वजों के लिए, जिसका पूजा उनके वंशज  ही करते थे।

 जब आर्य भारत  आये  तो उनके पारम्परिक पूजा,वस्त्र, विधान  देख भारतीयों मे भी  नकल की इच्छा हुई क्योंकि उन्नत लोगो की नकल होना विकास प्रक्रिया है। आर्य निसंदेह आधुनिक थे  नए  परिधान नए  जीवन शैली  वाले थे  जो समाज मे एकदम अलग ही दिखते  थे.

   आर्य ब्राह्मण होते है, और उनका परम्परागत धार्मिक वस्त्र का रंग सफ़ेद होता है। सनातन इस्ट का पूजा करने वाले वंशज  को सफ़ेद कपड़ो मे ही पूजा करना होता है,,

यानि सनातनी पुजारी धार्मिक व्यक्ति को स्वेत वस्त्र पहनना था, और उनके समर्थक गृहस्थ  को पीला वस्त्र पहनना था.

समाज मे लोगो का वर्गीकरण ही कपड़ो के आधार  पर होता था जैसे,, ब्राह्मण पुजारी है  तो स्वेत कपड़े,,अन्य ब्राह्मण जो गृहस्थ  है लेकिन पुजारी नहीं तो पीला वस्त्र पहनता था, और  पीला वस्त्र मतलब वो आर्यो के समर्थन मे है उनके मित्र होने की घोषणा करते है उनके धर्म नियम परम्परा को स्वीकार करते है उनकी सत्ता को स्वीकार करते है,,

शूद्र वर्ग को तो कपड़े पहनना ही मना था, कमर के ऊपर उनको कपड़े पहनने पर रोक थी । जो पहनना चाहते  उनको टैक्स देना पड़ता था  इसी कारण शूद्र वर्ग भी  दो भाग  मे बट गए  टेक्स देने लायक शूद्र और टैक्स न देने लायक शूद्र।जो टैक्स दे सकते थे  वो ओबीसी हो गए जो नहीं दे पाए  वो महाशूद्र  हो गए।

जब महात्मा बुद्ध के समर्थक होने लगे तो उन्होंने अपना एक अलग ड्रेस कोड बनाया,, चुकि  महात्मा बुद्ध गहन विचारक  थे  तो उन्होंने रंगो के गुण को समझा  और  एक ऐसा  रंग चुना  जो मन को चंचल  होने से रोके, शांत  और स्थिरता का भाव  दे,, भगवा  रंग व्यक्ति को विचार करने मे लीन होने मे सहायक होता है इसलिए भगवान बुद्ध ने सभी  बौद्ध भिक्षु  को भगवा  चीवर  पहनने का आदेश  दिया,, ताकि देख  कर ही पता चल  जाये की कौन  बुद्ध विचार धारा  का समर्थक है।

बौद्ध भिक्षु  गृहस्थ जीवन को त्याग करने वाले लोग थे खेती करना या अन्य कार्य करना सम्भव नहीं था  और टैक्स लेना अन्यायपूर्ण कार्य मंजूर  नहीं था  तो बौद्ध भिक्षु  बने लोग और जूनियर स्टूडेंट को कुछ घंटे  गृहस्थ  लोगो से दान लेने की परम्परा डालनी पड़ी जीवन यापन हेतु।

यही से कुछ  बदमाश आलसी  और झूठे  लोग भी  बौद्ध भिक्षु  बनकर दान लेते और जीवन यापन करने लगे,,,

चुकि  पूरे भारत  मे लोग भगवान बुद्ध को इतना मानने लगे कि उनको दान देकर सुखद  अनुभूति होती थी,,,

यही जनता की नब्ज पकड़ लिए  ब्राह्मणों ने और फर्जी साधुओ  ने जो आजतक  भगवा कपड़ा पहनकर भीख  मांगना और साधु  बनकर लोगो को ठगना  रोजगार बन गया. वर्तमान मे भगवा  रंग राजनीती का रंग बन गया, और हिन्दू धर्म मे सफ़ेद पीला रंग छोड़ कर भगवा  रंग को प्रचारित किया क्योंकि भारतीयों के कितनी भी पीढ़ी  बदल जाये लेकिन उनके भगवा  भगवान बुद्ध का अंश  अचेतन  मे पड़ा हुआ है,,,

स्वामी विवेकानंद जब विश्व धर्म सम्मेलन मे गए  तो भगवा  ड्रेस इसलिए पहने क्योंकि वो बुद्ध प्रतिनिधि मंडल  के तरफ से प्रतिनिधि किये थे  क्योंकि हिन्दू शंकराचार्य ने विवेकानंद को शूद्र  कह कर उनसे प्रतिनिधित्व वापस ले लिया था।

हिन्दू सिर्फ ब्राह्मण होते है बाकी अन्य जाति हिन्दू का गुलाम, भक्त समर्थक जो भी समझे।

इसलिए सनातनी धर्म के लोगो को याद  दिलाना होगा उनका इतिहास उनका धर्म उनका धार्मिक रंग…… सफ़ेद रंग ही सनातनी  रंग है और सनातन समर्थक का रंग पीला है,, यानि ब्राह्मणों को सफ़ेद रंग और ब्राह्मणों के पूजक यानि वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र  जो भी  ब्रह्म का पुत्र बनना चाहे वो अपने पारम्परिक रंग को लेकर चले  और भगवा  रंग बुद्धिस्टो का रंग को हिन्दू का रंग कहना बंद करे 

ऐश 

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