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नफरती बोलों के बिना सांप्रदायिक ताकतें जिंदा नहीं रह सकतीं

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,मुनेश त्यागी 

     हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतों के जहरीले संगठनों के लोगों में विपक्षी पार्टियों के लिए और खासकर मुसलमान के लिए नफरत के जहर भरे बोल बोलने की होड सी मची हुई है। कपिल मिश्रा, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, साध्वी ऋतंभरा और कई सारे तथाकथित धार्मिक गुरु, धार्मिक मांऐं और साधु सन्यासी अपने पिछले काफी दिनों से अपने भाषणों से समाज और देश में सांप्रदायिक और जातिवादी जहर घोल रहे हैं। अब इसी जहरीली मुहिम को बीजेपी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने आगे बढ़ाया है, जब उसने बीएसपी के संसद के लिए मुल्ला, कटवा जैसे नफरत भरे और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया है। यही काम हमारा मीडिया और टीवी चैनल्स द्वारा, काफी दिनों से जनता में नफरती बोल बोलकर किया जा रहा है और जनता में जहर फैलाया और घोला जा रहा है।

    भारत में इन नफरती बोलों का निशाना, अधिकांशत: भारत के अल्पसंख्यक यानी मुसलमानों को बनाया जा रहा हैं। ये साम्प्रदायिक ताकतें आए दिन, अल्पसंख्यकों का अपमान करते रहते हैं, उनकी बेइज्जती करते रहते हैं, उनके खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते रहते हैं और इतिहास से काटकर उनके खिलाफ भांति भांति के बोल बोलते रहते हैं। इनके नारे देखिए,,,,

देश के गद्दारों को 

गोली मारो सा””’ को।

मुसलमानों का एक स्थान 

कब्रिस्तान या पाकिस्तान।

और अब,,,,

कटवे और मुल्ले।

    यहां पर सवाल यह उठता है कि आखिर इन नफरती बोलों और भाषा का फायदा किसे हो रहा है? अगर हम गौर से देखें तो इन नफरती बोलो का फायदा हमारे देश के सत्ताधारी पूंजीपतियों को, सांप्रदायिक नेताओं को, सांप्रदायिक राजनीतिक दलों को, सांप्रदायिक हिंदूवादी ताकतों को और संगठनों को हो रहा है क्योंकि ऐसे शब्द बोलकर जनता के बीच हिंदू मुसलमान के नाम पर नफरत भरी जाती है और आमतौर से हिंदू जनता को मुसलमान के खिलाफ भड़काया और उकसाया जाता है।

    आखिर इन नफरती बोलों की मुहिम का क्या मकसद है? गौर से देखने पर इस नफरत भरी मुहिम का केवल और केवल एक मकसद है कि इस देश का  पूंजीपति लुटेरा वर्ग और हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ताकतें किसी भी तरह से सत्ता पाना चाहती हैं और ये सत्ता में बने रहना चाहती हैं। इसके लिए वे किसी भी तरह  से जनता की एकता को तोड़ना चाहती हैं, जनता को हिंदू और मुसलमान में बांटना चाहती हैं और वे चाहती हैं कि हमारी जनता इन्हीं नारे के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाए और वह लगातार मुसलमानों से नफ़रत करती रहे। नफरती बोलों का केवल और केवल यही मकसद है।

     यहां पर सवाल उठता है कि जहर फैलाने के नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ और नफरत ही बोलों को प्रचारित प्रसारित करने वाले चैनलों और व्यक्तियों के खिलाफ समय से, जरूरी कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? सरकार मूकदर्शक क्यों बनी हुई है? क्या वह इन नफरती बोलों का प्रचार-प्रसार करके वोट लेने और सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने ही नहीं चाहती है?

     यह सब देश, समाज और जनता के हित में नहीं है। भारतवर्ष के हित में नहीं है। संवैधानिक मूल्यों गणतंत्र, जनतंत्र, संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी मूल्यों के खिलाफ है। यह सब समाज के आपसी सामंजस्य और भाईचारा बनाए रखने के प्रावधानों के खिलाफ है। सरकार को इन्हें रोकने के लिए सख्त कानून कानून बनाने होंगे और इन्हें समय से पुख्ता सजा देनी होगी।

     इस सब की हकीकत क्या है? आज हालत यह है कि अधिकांश टीवी चैनलों पर पूंजीवादी ताकतों का नियंत्रण है। वे अपनी सत्ता और सरकार को बनाए रखने के लिए, जनता की एकता को तोड़ना चाहते हैं, धर्म के आधार पर जहर फैलाकर जनता की एकता तोडे रखना चाहते हैं ताकि जनता बुनियादी मुद्दों जैसे राजनीति, सरकार, सत्ता, रोटी, रोजी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बात न कर सके, इनकी मांग न कर सके और इस प्रकार इसी धर्मांधता की, साम्प्रदायिकता की और साम्प्रदायिक राजनीतिक ताकतों द्वारा नफरत फैलाने की राजनीति में उल्झी रहे। 

     वर्तमान पूंजीवादी और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ की व्यवस्था के चलते, इस नफ़रत भरी जुबान पर लगाम लगाना मुमकिन नहीं है। पूंजीपतियों की वर्तमान व्यवस्था और उनका निजाम इस नफरत भरी भाषा और बोलों के बिना जिंदा नहीं रह सकता। ये नफरती बोल इनकी लाइफ लाइन्स हैं यानी इनकी जीवन रेखाएं हैं।

      यह हकीकत भी दुनिया के सामने उजागर हो गई है कि नफरती बोल इन देशद्रोही तत्वों के रक्षा कवच बन गए हैं। इस नफरत भरी राजनीति के बिना इनकी सत्ता, सरकार और इनकी लूट कायम नहीं रह सकती। इसीलिए इन पूंजीपतियों की मोदी सरकार, इन नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ कोई भी प्रभावी और समुचित कानूनी कार्रवाई नहीं कर रही है।

    पिछले दिनों भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस नफरत भरी मुहिम पर आश्चर्य प्रकट किया है और कुछ जरूरी सवाल उठाए हैं। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि इस तरह की भाषा बोलकर, टीवी चैनल्स अपनी टीआरपी बढ़ाना चाहते हैं, वे जाति और धर्म के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं, अल्पसंख्यकों की बेइज्जती और बदनामी कर रहे हैं।  इनकी वजह से देश की दुनिया भर में बदनामी हो रही है।

     सर्वोच्च न्यायालय ने इन नफरती बोल बोलने वालों पर सख्त आपत्ति जताते हुए कहा है कि ये नफरती बोल समाज में जहर घोल रहे हैं और समाज के ताने-बाने को तोड़ रहे हैं, सामाजिक सौहार्द को खत्म कर रहे हैं। ऐसे बोल बोलने  वाले एंकरो और पार्टी प्रवक्ताओं के खिलाफ तुरंत सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। हालत इतनी खराब है कि सरकार विधि आयोग की सिफारिशों के बाद भी इन लोगों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई करने को तैयार नहीं है।

      आज सरकार की हकीकत यह है कि इन नफरत भरे बोलों के खिलाफ केंद्र सरकार मूकदर्शक बनकर खड़ी हो गई है। वह इन मामलों पर, इन नफरती बोलों पर रोक लगाने के लिए आगे बढ़ कर कार्यवाही नहीं कर रही है, सख्त कानून नहीं बना रही है। इन हरकतों को “तुच्छ मामले” बताकर इतिश्री नहीं की जा सकती। बल्कि सरकार को आगे बढ़कर इन मामलों से निबटने के लिए सख्त नियम और कानून बनाने पड़ेंगे और इन नफरत भरे बोल बोलने वालों के खिलाफ, इन तत्वों को टीवी चैनल पर आने और बोलने की मनाही करनी चाहिए।  इन पर रोक लगानी चाहिए और इनके खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

      इन नफरती बोल बोलने वालों को, सरकार को और जनता को भली-भांति समझना होगा कि हमारा कानून नफरत फैलाने की अनुमति नहीं देता और यह देश यहां पर रहने वाले सारे भारतीयों का है। यह लुटेरे पूंजीपतियों और साम्प्रदायिक ताकतों के बाप की बपौती नहीं है। यहां पर किसी के भी खिलाफ जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र, भाषा या समुदाय के खिलाफ नफरती बोल बोलकर किसी को भी लिखकर या बोलकर धमकी नहीं दी जा सकती है और नफरत फैलाई जाने की इजाजत दी जा सकती है।

      आज सरकार, कानून, राजनीतिक दलों, प्रेस,  मीडिया और टीवी चैनलों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे इन नफरती बोल बोलने वालों को तरजीह ना दें और सबके सब मिलकर भारत में संवैधानिक मूल्यों और आपसी भाईचारे के सिद्धांतों का प्रचार प्रसार करें और इन्हें आगे बढ़ाएं और पूरे भारत देश में और भारतीय समाज में, एकता, अखंडता और भाईचारे का समाज कायम करें। ऐसा करके ही हमारा देश और हमारा समाज विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।

       इन नफरती बोल बोलने वालों के खिलाफ सरकार समय से और प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रही है और इनको एक तरह से छूट दी हुई है। यह सरकार की एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है। सरकार चाहती है की नफरत की भाषा के द्वारा जनता की एकता टूटती रहे और समाज में नफरत फैलती रहे। अब यहां पर सबसे बड़ा काम जनता को करना है और वह यह कि भारत की जनता और भारत के किसान और मजदूर मिलकर इन नफरती बोल बोलने वालों का मुकाबला करें और आपसी भाईचारा कायम करके, इन देश विरोधी ताकतों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दे और देश में फैले नफरत वातावरण का खत्मा कर दे।

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