अग्नि आलोक

*कामरेड होमी दाजी:उनके भाषण संसदीय इतिहास के दस्तावेज  बने*

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( लेख छपने हेतु – 5 सितंबर को इंदौर के लोकप्रिय पूर्व सांसद और मजदूरों के नेता कॉमरेड होमी दाजी का जन्मदिन है। चूंकि यह वर्ष उनकी शती का वर्ष है इस अवसर पर इंदौर की कुछ संस्थाएं इसे मना रही है। जिसमें मुख्य वक्ता कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राज्य सभा सांसद श्री दिग्विजय सिंह हैं। इस अवसर पर यह लेख)

विजय दलाल

*नये गगन में नया सुर्य जो चमक रहा है*

यह विशाल भूखण्ड आज जो दमक रहा है 

मेरी भी आभा है इसमें।*

जब हम कामरेड होमी दाजी जैसी शख्सियत को याद करते हैं तब कवि नागार्जुन की कविता के ये लाइनें भी याद हो उठती है।

आज हम ऐसी लोकप्रिय नेता जिसने अपना सारा जीवन जनसंघर्ष के लिए होम किया। सर्वहारा वर्ग के साथ आमजन के हर सवाल के लिए संघर्ष करते हुए अपनी आहुति दी ।ऐसे जनता के लोकप्रिय नेता कामरेड होमी दाजी की हम जन्मशती मना रहे हैं। उनका जन्म बंबई में 5 सितंबर 1926 को हुआ था। 1930 की भीषण आर्थिक मंदी से प्रभावित बदहाल और गरीबी की हालत में उनके पिता नौकरी की तलाश में इंदौर आये।

उनके पिता की आर्थिक हालत इतनी कमजोर थी कि स्कूल की फीस और किताबों का खर्च भी वहन नहीं कर सकते थे।

लेकिन होमी दाजी की पढ़ाई की प्रबल इच्छा को देख कर एक स्कूल के प्रधानाचार्य ने  क्लासरूम के बाहर बरामदे में बैठने की अनुमति दे दी । 

 किताबें खरीदने को पैसे नहीं थे। इसलिए  उन्होंने किताबों की दुकान पर ही नौकरी कर ली। उस समय इंदौर की सेकंडरी परीक्षा के लिए अजमेर बोर्ड और कालेज शिक्षा के लिए इंदौर के कालेज आगरा विश्वविद्यालय के अंतर्गत आते थे उन्होंने एम.ए. की परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया और एलएलबी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की।

होमी दाजी जब 16 वर्ष के थे तब उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में प्रतिभागी बनने से हुई थी।उस आंदोलन में मार भी खाई। उसके बाद देश के पहले छात्र संगठन  ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़े। ठीक उसी समय इंदौर में छात्र आंदोलन में पूर्व जस्टिस गोवर्धन लाल ओझा(सुप्रीम कोर्ट),ओमप्रकाश रावल (पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश सरकार),महेंद्र भटनागर(प्रसिद्ध एवं वरिष्ठ अधिवक्ता ), कन्हैयालाल डूंगरवाल(पूर्व विधायक समाजवादी पार्टी)और छगनलाल दलाल(ख्यात मार्क्सवाद के शिक्षक और ट्रेड यूनियन नेता) बाद में दाजी के साथी रहे,जैसे लोग भी उनके साथ छात्र आंदोलन में सक्रिय थे।  इंदौर में कपड़ा मिलों में 30 हजार से ज्यादा मजदूर असंगठित हालत में काम कर रहे थे।  कामरेड एस.ए.डांगे के नेतृत्व में बंबई के टेक्स्टाइल उद्योग में गिरनी कामगार यूनियन बन चुकी थी । 1943 में ही इंदौर में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन  हुआ था । इंदौर में कामरेड लक्ष्मण खंडकर, दिवाकर , दत्तात्रेय सरमंडल , भगवान भाई बागी , अनंत लागू जो दाजी के अभिन्न मित्र तो थे ही दाजी को पार्टी में लाने में भी उनकी अहम् भूमिका रही व अन्य नेताओं की पहल और नेतृत्व में हुआ। 1 मई 1946 में दाजी ने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली और इंदौर के कपड़ा उद्योग के मजदूरों को संगठित करने का जिम्मा लिया।

अपनी अद्भुत वक्तृत्व क्षमता व नेतृत्व के सम्मोहन करने वाले गुणों के कारण वो जल्दी ही लोकप्रिय मजदूर नेता बन गए। सन 1957 में महज़ 29 साल की उम्र में वो विधायक बन गए।

मजदूरों के हकों के लिए जुझारू संघर्षों के कारण मजदूरों में तो बेहद लोकप्रिय तो थे साथ ही इंदौर शहर के मुद्दों पर भी हर मौके पर लड़ने के कारण शहर के नागरिकों के बीच भी अत्यंत लोकप्रिय थे। इसलिए 1962 में वो इंदौर से कांग्रेस उम्मीदवार इंटक के गंगाराम तिवारी को हराकर सांसद चुने गए।

1972 में इंदौर के मिल क्षेत्र से फिर से विधायक चुने गए।

इंदौर और मध्यप्रदेश के लिए अनवरत संघर्षों का नेतृत्व करने के कारण 1980 में उन्हें ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कॉंग्रेस (एटक) का राष्ट्रीय महासचिव चुना गया। मजदूरों के हित में अनेक कानून उनके नेतृत्व में हुए संघर्षों के ही परिणामस्वरूप बने।

पहले तो इंदौर शहर की एतिहासिक धरोहर व स्मारक राजवाड़ा को आंदोलन कर बिकने से बचाया और फिर उसके आंगन को जनता चौक नाम दिया। इंदौर नगर पालिका द्वारा सायकिलों और झुग्गियों पर टैक्स लगा रखा था उसे भी हटवाया।

इंदौर का राजवाड़ा  उनके भाषणो को सुनने के लिए अपार भीड़ का साक्ष्य तो रहा ही है संसद में दिए उनके भाषण संसदीय इतिहास के दस्तावेज भी बने। संसद में दिए उनके भाषणों के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके प्रशंसकों में से एक थे।

अपने सतत राजनीतिक जनपक्षीय कार्यों से जहां समाज के सभी तबकों में बहुत लोकप्रिय थे वहीं अपने पढ़ने – लिखने और प्रभावशाली वक्तव्यों के कारण बौद्धिक जमात में भी उनका बहुत सम्मान था।

अपने निजी जीवन में उन्होंने पहाड़ जैसे दु:ख झेले। अपने बेटे और बेटी को असाध्य रोगों के कारण उनकी जवानी में ही उन्हें खोना पड़ा।  दाजी को स्वयं अंतिम दिनों में लकवे को झेलना पड़ा इसके बावजूद अपने जीवन के अंत तक उन्होंने सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी को निभाया। इतने सारे कष्टों को सहजता से सहन करने में उनकी जीवन संगिनी कामरेड पेरिन दाजी की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। दाजी साहब के निधन के बाद वह स्वयं भी हुकुमचंद मिल के मजदूरों के मुआवजे के संघर्षों में सक्रियता से कार्य करती रही।

जुलाई 2008 में लकवे से पीड़ित होने के बावजूद अमरनाथ श्राइन बोर्ड विवाद से उपजे इंदौर में दंगों में 8 जानें गईं थी दाजी बीमारी की हालत में भी उनके घर  परिवारों को सांत्वना देने पहुंचे थे।

कॉमरेड दाजी की स्वीकार्यता कम्युनिस्ट पार्टी के दायरे तक सीमित नहीं थी। मजदूर चाहे उनकी यूनियन का सदस्य ना हो उनकी मांगों के सामूहिक मसले हो या निजी सबके लिए लड़ते थे।

एटक के राष्ट्रीय महासचिव रहते और देश के मजदूर वर्ग को संगठित करने की महती जिम्मेदारी निभाते हुए भी और इतनी व्यस्तता के बावजूद वो नियमित रूप से अपने पार्टी साहित्य के साथ लोकप्रिय पत्रिकाओं जैसे मेनस्ट्रीम और फ्रंटलाइन आदि के  पाठक थे।

इसलिए साम्प्रदायिक राजनीति, अफगानिस्तान,इराक, लेबनान से लेकर लेकिन अमेरिका तक के अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सवाल हो , कॉमरेड दाजी की पैनी राजनीतिक दृष्टि और सक्रिय हस्तक्षेप रहता था। उनकी अंतिम सांसों तक देश और दुनिया में समाजवाद कायम करने की उनकी इच्छा और प्रतिबद्धता कम नहीं हुई।

आज कॉमरेड दाजी जैसी शख्सियत और जनप्रतिबद्धता के लिए  सम्पूर्ण आहूति देने वाली प्रेरणा शक्ति को उनके शताब्दी वर्ष में याद करना इंदौर और प्रदेश की जनता का परम कर्तव्य है और उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है।

14 मई 2009 को दाजी भले ही बिदा हो गए हों मगर समाजवाद के लिए संघर्षरत लोगों के मन में बसे हुए हैं।

पेरिन दाजी अक्सर यह गीत सुनाया करती थी जो कॉमरेड दाजी का जीवन का फलसफा था ” अपने लिए जिए तो क्या जिए ,

ऐ दिल तु जी जमाने के लिए” ।

विजय दलाल

49, बीमा नगर, इंदौर 

452018

M 9425076874

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