शैलेन्द्र चौहान
साहित्यिक दुनिया का एक असुविधाजनक लेकिन अनदेखा न किया जा सकने वाला सच यह है कि स्वप्रचार के सुव्यवस्थित प्रबंधन के ज़रिये कुछ लेखक अपनी रचनात्मक क्षमता से कहीं अधिक प्रतिष्ठा अर्जित कर लेते हैं। यह प्रक्रिया आकस्मिक नहीं होती; इसके पीछे एक सुनियोजित रणनीति, संपर्क–जाल और समय के बौद्धिक माहौल की गहरी समझ काम करती है।
साहित्य मूलतः आत्मसंवाद और सामाजिक विवेक की साधना है, किंतु जब लेखक की केन्द्रीय चिंता रचना नहीं बल्कि दृश्यता बन जाती है, तब साहित्य धीरे–धीरे प्रदर्शन में बदलने लगता है। स्वप्रचार यहाँ केवल आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति नहीं रहता बल्कि वह एक ऐसी प्रबंधकीय कला बन जाता है जिसमें पुरस्कार, मंच, गोष्ठियाँ, समीक्षाएँ और सोशल–मीडिया की उपस्थिति योजनाबद्ध ढंग से एक–दूसरे को पुष्ट करती हैं। लेखक स्वयं को नहीं बल्कि अपने “ब्रांड” को प्रस्तुत करने लगता है।
आलोचना की भूमिका ऐसे समय में निर्णायक होनी चाहिए थी परन्तु दुर्भाग्य से आलोचना का एक हिस्सा भी इस प्रबंधन का उपकरण बन गया है। कुछ आलोचक परस्पर–हित की संरचना में लेखकों की प्रशंसा को “सैद्धांतिक भाषा” में लपेटकर प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार की प्रशंसा पाठकीय विवेक को संबोधित करने के बजाय प्रतिष्ठा निर्माण में सहायक होती है। यहाँ मूल्यांकन नहीं, मान्यता का अभिनय होता है।
इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि साहित्यिक गुणवत्ता का मापदंड धुँधला पड़ने लगता है। जो लेखक चुपचाप, निरंतर और ईमानदारी से लिख रहा है, वह हाशिये पर चला जाता है, जबकि स्वप्रचार में दक्ष लेखक केंद्र में स्थापित हो जाता है। इससे साहित्य का लोकतांत्रिक चरित्र क्षीण होता है और वह एक सीमित बौद्धिक कुलीनता के कब्ज़े में चला जाता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर आत्म–उल्लेख स्वप्रचार नहीं होता। लेखक का अपने समय में हस्तक्षेप करना, अपने विचारों को स्पष्टता से रखना, आवश्यक भी है। समस्या तब पैदा होती है जब आत्म–उल्लेख, आत्म–स्तुति में और आत्म–स्तुति, संगठित प्रचार में बदल जाती है। तब रचना नहीं, लेखक स्वयं “घटना” बन जाता है।
ऐसे माहौल में पाठक की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उसे मंच, पुरस्कार और शोर–शराबे से परे जाकर रचना को पढ़ना होगा— उसकी भाषा, दृष्टि, सामाजिक संवेदना और कलात्मक जोखिम को परखना होगा। साहित्य का भविष्य प्रचार–प्रबंधन से नहीं, बल्कि उसी पुरानी कसौटी से तय होगा—क्या यह रचना समय के मनुष्य से कोई सच्चा संवाद कर पाती है या नहीं।
स्वप्रचार से अर्जित प्रतिष्ठा भ्रामक और अस्थायी होती है जबकि साहित्यिक मूल्य समय की कठोर परीक्षा में ही स्थापित होते हैं। इतिहास बार–बार गवाही देता है कि जिन लेखकों की प्रशंसा प्रबंधन ने की, वे अक्सर भुला दिए गए; और जिन्हें उनके समय ने अनदेखा किया, वही आगे चलकर साहित्य की असली आवाज़ साबित हुए।
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