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भूरिया के पुत्र विक्रांत पर दांव लगाने में लगी कांग्रेस…?

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भोपाल। (हिन्द न्यूज सर्विस)। वर्षों से आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले की राजनीति कर रहे कांतिलाल भूरिया की राजनीति से क्षेत्र के लोगों को कितना लाभ हुआ यह तो वह भलीभांति जानते हैं यही नहीं इन्हीं भूरिया की स्वयंभू आदिवासी नेता होने की राजनीति में आदिवासियों की राजनीति पनप रहे असंतोष के चलते जयस जैसे संगठन का भी क्षेत्र में उदय हुआ, तो वहीं आदिवासी बाहुल्य झाबुआ, अलीराजपुर ही नहीं बल्कि धार, बड़वानी जैसे आदिवासी बाहुल्य जिलों में अपने पुत्र मोह के चलते आदिवासी युवा नेताओं की राजनीति को उभरने न देने के चलते उनका भी शोषण हुआ, ऐसे तमाम मुद्दे हैं जिनके चलते झाबुआ ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों के आदिवासी झाबुआ की राजनीति से असंतुष्ट हैं लेकिन अपने पुत्र मोह के चलते जहां इन जिलों के युवा आदिवासी नेताओं को बडऩे नहीं दिया तो वहीं वर्षों से शासकीय सेवा से निवृत्त होकर वर्तमान सांसद जीएस डामोर जैसे अधिकारी ने कुछ ही महीनों की राजनीति के चलते कांतिलाल भूरिया के पुत्र विक्रांत भूरिया जिन पर दिग्विजय सिंह ने दोहरी राजनीति करके ऐसे युवा विक्रांत भूरिया अपने पिता की तरह राजनीति करने वाले विक्रांत भूरिया को विधानसभा में चुनाव में हार का स्वाद चखाया था, तो वहीं लोकसभा में उनके पिताश्री की स्वार्थी राजनीति का धराशायी कर आज वर्षों तक शासकीय सेवा में रहे डामोर रतलाम-झाबुआ के संासद हैं, इतना सब होने के बाद भी कांग्रेसी नेताओं में न तो कांतिलाल भूरिया की राजनीति के प्रति मोह भंग हुआ और न ही अपने पिता की तरह स्वयंभू होने की राजनीति करने वाले विक्रांत भूरिया की आज स्थिति यह है कि उनके ही परिवार की कलावती भूरिया के निधन होने से रिक्त जोबट विधानसभा के होने वाले उपचुनाव में क्षेत्र के उन तमाम प्रतिभाशाली नेताओं को दरकिनार करते हुए कांतिलाल भूरिया के ही पुत्र विक्रांत भूरिया पर कांग्रेस दांव लगाने जा रही है,

जबकि क्षेत्र के लोग इस बात से भलीभंाति परिचित हैं कि चाहे विक्रांत भूरिया स्वयंभू आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया की राजनीति के चलते कांग्रेस के नेता उन्हें महत्व देते हों लेकिन क्षेत्र में न तो उनका और न ही उनका कोई प्रभाव नहीं है, हाँ यह जरूर है कि पिता-पुत्र राजनीति के चलते क्षेत्र के आदिवासियों का जमकर शोषण करने में लगे हुए हैं, ऐसे एक नहीं अनेकों उदाहरण हैं झाबुआ के निवासी कांतिलाल भूरिया की राजनीति के चलते इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि जिन आदिवासी मतदाताओं की बदौलत वह प्रदेश से लेकर केंद्र तक प्रभावशाली पदों पर रहे हैं लेकिन उनके इस कार्यकाल में झाबुआ और उनका कितना विकास हुआ इससे भी वह भलीभांति परिचित हैं जहां तक अपने पिताश्री की तरह राजनीति करने वाले विक्रांत भूरिया की बात करें तो यह सभी जानते हैं कि उनके द्वारा संचालित निजी चिकित्सालय में किस तरह का खेल होता है और वह सरकारी जिला चिकित्सालय में पदस्थ राजनीति के प्रभाव के दबाव के चलते डॉक्टरों के द्वारा जो सेवायें उनके चिकित्सालय में दी जाती हैं इसकी पोल भी एक बार खुल चुकी है जब एक गर्भवती महिला का प्रसूति का मामला आया था उसको लेकर जो विवाद हुआ था उसके बाद डॉ. विक्रांत भूरिया को अपने अस्पताल को बंद करने की पोस्ट सोशल मीडिया पर डाली थी लेकिन उसके कुछ दिनों बाद क्षेत्र के एक प्रभावशाली नेता का चरणवंदन करने के बाद वह अस्पताल चंद दिनों में ही फिर से शुरू क्यों किया गया इस रणनीति को भी क्षेत्र के लोग तरह-तरह के चर्चायें चटकारे लेकर करते नजर आते हैं, स्वर्गीय कलावती भूरिया के निधन के बाद रिक्त जोबट विधानसभा के उपचुनाव को लेकर डॉ. विक्रांत भूरिया को कांग्रेस का प्रत्याशी बनाये जाने की जो चर्चायें इन दिनों चल रही हैं उसे लेकर क्षेत्र के प्रभावशाली युवा नेताओं में काफी असंतोष व्याप्त है और यदि इस असंतोष को खत्म नहीं किया गया तो फिर वह स्थिति भी आ सकती है कि जिस प्रकार से वर्षों तक प्रदेश की शासकीय से सेवानिवृत्त होकर चंद दिनों में कांतिलाल भूरिया की स्वार्थी राजनीतिक के चलते उनके पुत्र चंद दिनों की राजनीति में ही पराजित का स्वाद डामोर ने चखाया था, ऐसा ही इतिहास पुन: जोबट में न दोहराया जाये इसको लेकर जिले के कांग्रेसी नेता चिंतित हैं और वह अपनी रिक्त हुई जोबट विधानसभा सीट पर डॉ. विक्रांत भूरिया की उम्मीदवारी को लेकर विरोध जता रहे हैं लेकिन कांग्रेस की परम्पराओं के अनूरूप नेताओं के पुत्रों और रिश्तेदारों को महत्व देने की जो परिपाटी है उसको चलते कांग्रेस का जो हश्र हुआ है वह हश्र अब पुन: शायद जोबट में देखने को मिल सकता है क्योंकि आदिवासियों के स्वयंभू नेता होने का दावा करने वाले कांतिलाल भूरिया की कार्यशैली से लोगों में असंतोष तो है ही अब वही परिपाटी उनके पुत्र के द्वारा चलाई जा रही है जिसको लेकर क्षेत्र के युवा आदिवासी कांग्रेसी नेताओं में असंतोष व्याप्त है, अगर यही स्थिति रही तो जो कांग्रेस दमोह में भाजपा को करारी हार का स्वाद चखाकर उत्साहित होकर आज भी उसी चुनाव के पैटर्न पर आगामी उपचुनाव लडऩे का ढिंढोरा पीट रही है लेकिन उसे नहीं पता कि दमोह उपचुनाव कांग्रेस की नीतियों से नहीं बल्कि जयंत मलैया और शिवराज के चहेते मंत्री भूपेंद्र सिंह की कार्यशैली की वजह से भाजपा को करारी हार शिकस्त का सामना करना पड़ा था, शायद इसी भ्रम में कांग्रेस उत्साहित होती नजर आ रही है? यदि आदिवासियों के स्वयंभू नेता कांतिलाल भूरिया के पुत्र विक्रांत भूरिया को जोबट विधानसभा उपचुनाव में वह जोबट सीट हासिल करने का वह ख्वाब देख रही है तो वह ख्वाब उनका टूटने में देर नहीं लगेगी?

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