आखिर कांग्रेस को गुजरात से देश को यह संदेश देने की जरूरत क्यों पड़ी?
नई दिल्ली: देशभर में अपनी जमीन की मजबूती पाने की कोशिश में लगी कांग्रेस जब पिछले एक दशक में गुजरात से निकली ‘मोदी-शाह’ की जोड़ी की चाणक्य नीतियों की काट नहीं ढूंढ पाई तो उसने इस किले का तिलस्म तोड़ने के लिए उसी गुजरात का रुख किया, जिसकी धरती से निकले गांधी और पटेल जैसे नायकों ने आजाद भारत के सपने को साकार करने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी।

कांग्रेस ने बीजेपी के खिलाफ अपनी लड़ाई को सिर्फ राजनैतिक या सत्ता पाने कोशिश तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि गुजरात की धरती से उन्होंने कांग्रेस बनाम बीजेपी-संघ की विचारधारा की लड़ाई को अंग्रेजाें की दमनकारी विचारधारा के खिलाफ लड़ाई जैसा तक करार दिया। साबरमती तट पर हुए कांग्रेस के 84वें अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने बाकायदा ऐलान किया कि जिस तरह से आजादी की लड़ाई में कांग्रेस अंग्रेजों व संघ के खिलाफ लड़ी, उसी तरह से आज भी कांग्रेस बीजेपी-संघ की सांप्रदायिक व विभाजनकारी सोच से लड़ रही है। कांग्रेस यहीं नहीं रुकी, उसने अपनी इस लड़ाई को आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम तक दे डाला।
सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस को गुजरात से देश को यह संदेश देने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल, आजादी की लड़ाई में गुजरात की अपनी एक अहम भूमिका रही। इसने महात्मा गांधी, सरदार पटेल, दादाभाई नौराेजी जैसे कई महानायक दिए, जिन्होंने न सिर्फ अंग्रेजाें के खिलाफ अपने अपने तरह से लड़ाई को अंजाम दिया, बल्कि जिनकी सोच ने कहीं न कहीं आजाद भारत के सपने को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाई।
इसके अलावा, जिस तरह से केंद्र में पीएम मोदी नीत सरकार के आने के बाद से बीजेपी द्वारा महात्मा गांधी, पटेल व अंबेडकर जैसे तमाम महानायकों की विरासत पर दावा जताने की कोशिश होती रही, कभी मोदी के ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के जरिए गांधी के प्रतीक को अपनाना हो या फिर केवड़िया में सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा स्थापित कर एकता नगर की परिकल्पना को साकार करना हो या फिर अंबेडकर के जीवन से जुड़े पांच स्थलों को पंच तीर्थ का नाम देना, बीजेपी आजादी व आजाद भारत के इन महानायकों को विरासत से खुद को जोड़ने की कोशिश करती दिखी।
इतना ही नहीं, इस दौरान बीजेपी की तरफ से लगातार इस बात को रेखांकित व प्रचारित किया गया कि कैसे नेहरू गांधी की कांग्रेस सरकारों में गांधी को छोड़ इन बाकी सारे नायकों की अनदेखी हुई या फिर नेहरू व गांधी परिवार से इनकी कभी बनी नहीं। पिछले एक दशक में देश, खासकर युवा पीढ़ी के भीतर पैठ रही इस सोच को काउंटर करने के लिए कांग्रेस ने बाकायदा एक रणनीति बनाकर बीजेपी के इस प्रचार को काटने की योजना बनाई। इसमें जहां कांग्रेस गुजरात की तरफ मुड़कर एक बार फिर अपने उन महानायकी विरासत से जुड़ने की कोशिश करती दिखी, जिसने देश के स्वतंत्रता आंदोलन को अपने अपने तरीके से धार दी थी तो वहीं कांग्रेस ने सरदार पटेल पर एक प्रस्ताव लाकर बाकायदा सिलसिलेवार ढंग से उस मिथ्या प्रचार को काटने की कोशिश भी की, जहां कहा गया था कि नेहरू व पटेल में आपस में बनती नहीं थी या उनमें मतभेद थे।
सरदार पटेल की 150वीं जयंती के आयोजन का ऐलान
कांग्रेस द्वारा आगामी 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की 150वीं जयंती के आयोजन का ऐलान भी उसी विरासत पर फिर से अपने दावे काे पुख्ता का करने की एक कवायद है। कांग्रेस की ओर से इन महानायकों पर दावे की बात ही नहीं की गई, बल्कि कांग्रेस ने बाकायदा इन दोनों नेताओं के विचारों को आधार बनाकर आगे बढ़ने और कांग्रेस की विचारधारा में इनकी सोच के प्रभाव को रेखांकित करने की कोशिश की होती दिखी।
साबरमती के तट से निकले ‘न्याय पथ’ प्रस्तावों के जरिए इन्हें सामने रखने की कोशिश की गई। फिर चाहे राष्ट्रवाद, अखंडता व बहुलतावाद पर कांग्रेस के प्रस्ताव की बात हो या सामाजिक न्याय व अल्पसंख्यकाें को उनके हक देने की बात… कहीं न कहीं यह पटेल व गांधी के विचारों से प्रेरित साेच के प्रतिबिंब थे। कांग्रेस इन्ही प्रतिबिंबों, विचारधारा व अपने मिशन गुजरात के सहारे बीजेपी को हराने का दावा कर रही है। राहुल गांधी ने अधिवेशन के सत्र को संबोधित करते हुए दोटूक कहा कि अगर विचारधारा की इस लड़ाई में बीजेपी व संघ को कोई हरा सकता है तो वह कांग्रेस ही है। वहीं कांग्रेस समझ रही है कि बीजेपी को हराना है तो सबसे पहले उसे उसके सबसे मजबूत किले गुजरात को ही भेदना होगा।
मिशन गुजरात
लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 240 पर रोकने के बाद इंडिया गठबंधन के दलों के लोकसभा नेता बने राहुल गांधी ने पीएम मोदी व गृहमंत्री के सामने खुली चुनौती दी थी कि वह अगली बार गुजरात जीत कर दिखाएंगे। उसके बाद से कांग्रेस गुजरात के अपने इस मिशन पर लग गई है। साल 2017 में सत्ता के लगभग करीब पहुंच चुकी कांग्रेस एक बार फिर अपने समूची ताकत लगाकर उस आंकड़े को पाने की कोशिश में लगी है, जिसके सहारे वह न सिर्फ बीजेपी के तीन दशक के सत्ता के किले में सेंध लगा सके, बल्कि मोदी व शाह से उनकी जमीन छीन सके। हालिया सत्र में उसने गुजरात को लेकर लाए गए अपने प्रस्ताव में तीन स्तर पर अपनी योजना का खाका खींचा।
- पहला, उसने गांधी-पटेल जैसे नायकों की अपनी विरासत को नए सिरे से दावा पेश करने की कोशिश की। आजादी के इन लड़ैयों को लेकर कालांतर में बीजेपी व संघ की तरफ से कांग्रेस के भीतर अंतर्विराेध व आपसी मतभेद को रेखांकित करने की कोशिश की गई, उस प्रचार को काटने की रणनीति पर काम शुरू किया।
- दूसरा, कांग्रेस ने जहां एक ओर आजादी के बाद कांग्रेस शासन में हुए गुजरात के विकास के कामों को सामने रखने की कोशिश की गई, गांधीनगर को राजधानी बनाना हो या आनंद में दूध सहकारिता क्रांति की शुरुआत, सरदार सरोवर परियोजना, आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की शुरुआत को कांग्रेस को अपनी सरकार की देन बता रही है। तीसरा, कांग्रेस ने पिछले तीन दशक में विभिन्न मोर्चों पर बीजेपी सरकार की नाकामियों को गिनाया, जिसमें जिसमें बच्चों व महिलाओं में कुपोषण, बेरोजगारी, पेपरलीक, भ्रष्टाचार, शिक्षा व स्वास्थ्य की स्थिति, किसानों व छोटे उद्यमियों की समस्याओं का जिक्र किया।
- तीसरा, कांग्रेस ने तमाम मुद्दों को लेकर अपनी आगामी योजना का खुलासा किया, उसके सरकार आती है तो वह गुजरात में सामाजिक न्याय के लिए काम करने के साथ-साथ गुजरात की मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए काम करेगी, यूथ के लिए रोजगार मुहैया कराने से लेकर नशामुक्ति के लिए काम करेगी तो वहीं दलितों, आदिवासियों व महिलाओं के लिए भी योजनाएं लेकर आएगी। उसेन शिक्षा व स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता बताया।
- चुनाैती भी कम नहीं
कांग्रेस ने गुजरात को लेकर भले ही अपने इरादे जाहिर कर दिए हों, लेकिन इसे पूरा करने में चुनाैती भी कम नहीं।कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती गुजरात के लोगों के भीतर देश की सत्ता के केंद्र में बैठे अपने दो शीर्ष नेताओं नरेंद्र मोदी व अमित शाह के रूप में जो गुजराती प्राइड बैठा है, उसे चुनौती देना है। इन दशकों में दो पीढ़ियां ऐसी सामने आ चुकी हैं, जिन्होंने यहां बीजेपी का शासन ही देखा है। ऐसे में आप अहमदाबाद या गांधीनगर में युवाओं से बात कर लीजिए, आपको बीजेपी के खासे समर्थक मिल जाएंगे।
कांग्रेस की एक बड़ी चुनौती नेताओं की कमी
इसके अलावा, कांग्रेस की एक बड़ी चुनौती यहां नेताओं की कमी है। कांग्रेस के पास नेताओं की अगली पीढ़ी उस तरह से उभरकर सामने नहीं आई जो बीजेपी से लगातार मोर्चा ले सके। कांग्रेस के तमात नेता बीजेपी में चले गए, नतीजा हुआ कि कांग्रेस की सोच व उसकी लड़ाई को जमीन पर ले जाने वाले नेताओं का अकाल पड़ गया। 2017 में जिस कांग्रेस ने बीजेपी के विजयरथ को रोकने की पुरजोर कोशिश की, वहीं 2022 में देखते-देखते एक नई पार्टी आप यहां से 13 फीसदी वोट ले गई।
‘न्याय पथ’… कांग्रेस के अधिवेशन से निकला संदेश
कांग्रेस की अहमदाबाद में हुई दो दिन के चिंतन और मंथन बैठक से जो निचोड़ सामने आया, उसे पार्टी ने न्याय पथ का नाम दिया है। देशभर से आए अपने लगभग 2000 आईसीसी डेलिगेट्स के बीच कांग्रेस ने जब प्रस्तावना के रूप में अपना आगामी संकल्प सामने रखा, तो वहां मौजूद तमाम प्रतिनिधियों ने अपने दोनों हाथ उठाकर इनका अनुमोदन किया। राजस्थान के युवा नेता, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वह पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने जहां न्याय पाठ की संकल्पना सामने रखी तो वही पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद शशि थरूर ने उसका अनुमोदन किया। उल्लेखनीय है कि साबरमती के तट से कांग्रेस ने दो संकल्पनाओं के प्रस्ताव को पारित किया, जिसमें से पहले प्रस्ताव देश के लिए था, जबकि दूसरा प्रस्ताव गुजरात पर केंद्रित था।
अपने अनुमोदन में कांग्रेस के थरूर ने कहा कि उनकी पार्टी को रोष, अतीत और नकारात्मक आलोचना की नहीं, बल्कि आशा, भविष्य और सकारात्मक विमर्श वाला दल होना चाहिए। साथ ही, पार्टी को उन मतदाताओं का समर्थन फिर से हासिल करने की कोशिश करनी होगी, जो 2009 में पार्टी के साथ थे। कांग्रेस को भविष्य की पार्टी होना चाहिए, सिर्फ अतीत की नहीं। सकारात्मक विमर्श वाली पार्टी होनी चाहिए, न कि केवल नकारात्मक आलोचना की।
लगभग सात पेज के प्रस्ताव में कांग्रेस ने सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक बिंदुओं के साथ-साथ राष्ट्रवाद, विदेश नीति, सर्वधर्म, किसान, मजदूर, युवा और महिलाओं से जुड़े बिंदु और संगठन की मजबूती से जुड़े तमाम बिंदुओं पर बात की। उल्लेखनीय है कि जिस तरह से भाजपा व संघ द्वारा देश में आपके विचार को आगे बढ़ाया जा रहा है और अपनी विरोधी विचारधाराओं के राष्ट्रवाद पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, उसके मद्देनजर पार्टी ने राष्ट्रवाद पर अपना पक्ष रखने की कोशिश की।
कांग्रेस ने राष्ट्रवाद की अपनी अवधारणा को सामने रखते हुए कहा कि हमारे लिए राष्ट्रवाद का मतलब देश की भूभागीय अखंडता के साथ-साथ यहां रहने वाले लोगों का सामाजिक राजनीतिक आर्थिक सशक्तिकरण है। राष्ट्रवाद का मतलब सभी देशवासियों के लिए समान न्याय की अवधारणा और वंचित पीड़ितों शोषितों के अधिकारों की रक्षा और उत्थान के साथ-साथ भारत के बहुलतावादी स्वरूप का सम्मान है। पार्टी ने बीजेपी के राष्ट्रवाद पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस का समाज राष्ट्रवाद को जोड़ने का है तो भाजपा व संघ का समाज को तोड़ने का।