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कांग्रेस की शिकस्त इंडिया गठबंधन को मिली मजबूती

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हिसाम सिद्दीकी

नई दिल्ली। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शिकस्त से इंडिया गठबंधन को मजबूती मिली है। असम्बली एलक्शन के दौरान राहुल गांधी  और कमलनाथ जैसे कांग्रेस लीडरान का जो रवैय्या था, उस पर नजर डाली जाए तो साफ लगता है कि अगर इन तीनों रियासतों के एलक्शन कांग्रेस जीत जाती तो कांग्रेस लीडरान के ‘घमंड’ की वजह से इंडिया  गठबंधन   के टूटने की नौबत आ जाती। इंडिया  गठबंधन   बुनियादी तौर पर नितीश कुमार के दिमाग की उपज है जिसे ममता बनर्जी और शरद पवार की भी पूरी हिमायत मिली, लेकिन  गठबंधन   की जो तीन मीटिंगे हुई, उनमें पटना के अलावा बंगलौर और मुंबई दोनो मीटिंगों में राहुल गांधी  सोनिया गाँधी और मल्लिकार्जुन खड़गे की ही बालादस्ती (वर्चस्व) दिखी। एक तरह से कांग्रेस ने जैसे  गठबंधन  को ‘हाईजैक’ ही कर लिया था। नितीश कुमार, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और शरद पवार जैसे लीडरान ने  गठबंधन   को मजबूत करने की गरज से कांग्रेस के खिलाफ कुछ नहीं कहा। मुंबई की मीटिंग में कपिल सिब्बल जैसे सीनियर लीडर को बुलाया गया। वह मीटिंग में आए तो राहुल गांधी की नाक का बाल कहे जाने वाले पार्टी जनरल सेक्रेटरी के.सी. वेणुगोपाल ने उनसे बदतमीजी की, अखिलेश यादव ने वेणुगोपाल को डांटा तभी राहुल गांद्दी ने उन्हें खामोश किया।

पांच प्रदेशों के असम्बली एलक्शन के फौरन बाद दूसरी पार्टियों के लीडरान से राय-मश्विरा किए बगैर मल्लिकार्जुन खड़गे ने छः दिसम्बर को  गठबंधन  की मीटिंग बुलाई। ममता बनर्जी, नितीश कुमार, अखिलेश यादव और एम.के. स्टालिन ने अलग-अलग वजूहात की बिना पर मीटिंग में शामिल न हो पाने की बात कही तो यह मीटिंग सत्रह दिसम्बर के लिए मुल्तवी कर दी गई। अगर खड़गे और उनकी पार्टी ने मीटिंग की तारीख तय करने से पहले इंडिया  गठबंधन में शामिल लीडरान से मश्विरा कर लिया होता तो शायद मीटिंग मुल्तवी न करनी पड़ती। लेकिन असल मसला घमंड का है राहुल गाँधी तो चाहते है कि इंडिया  गठबंधन  मजबूती से चलता रहे, लेकिन कांग्रेस के बाकी लीडरान को इस बात का बड़ा घमंड है कि ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के बाद से राहुल गांद्दी देश के सबसे बड़े लीडर बन चुके है। अगर तीन रियासतों में कांग्रेस जीत जाती तो पार्टी लीडरान किसी से सीधे मुंह बात भी न करते। यह लोग भूल जाते है कि बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में नितीश कुमार उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, तमिलनाडु में एम.के. स्टालिन महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे के बराबर का कांग्रेस में कोई लीडर नहीं है।

कांग्रेस तीन रियासतों में एलक्शन हार गई, समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड और तृणमूल कांग्रेस की दूसरी लाइन के लीडरान ने अपने बयानात के जरिए कांग्रेस पर हमले भी किए लेकिन नितीश कुमार, ममता बनर्जी, शरद पवार सभी ने कहा कि चुनाव में हार-जीत लगी रहती है हम सब मिलकर नए सिरे से लोकसभा एलक्शन लड़ेंगे और आने वाले वक्त में जीत का रास्ता फिर निकालेंगे। नतीजे आने के अगले ही दिन बनारस में कांग्रेस का नाम लिए बगैर अखिलेश यादव ने कहा था कि एलक्शन के नतीजे आ गए, गुरूर भी टूट गया, अब हम नए सिरे से इंडिया गठबंधन को मजबूत करेंगे। इसके बावजूद अखिलेश यादव, नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव वगैरह को राहुल गांधी की बैकवर्ड सियासत पसंद नहीं आ रही है। इन सभी का कहना है कि जात की बुनियाद पर सर्वे या मर्दुमशुमारी और बैकवर्ड सियासत तो हमारा एजेंडा है। गठबंधन में कांग्रेस को तो बीजेपी में गए सवर्णों के वोट लाने की कोशिश करनी चाहिए, वह न राहुल गांधी कर रहे है और न कांग्रेस के दूसरे लीडर। अखिलेश कहते है कि अब राहुल गांधी और कांग्रेस भी जात की बुनियाद पर सर्वे की बात करने लगे है क्योंकि उनका जो वोट बैंक था वह सब बीजेपी में चला गया है जो वापस नहीं आ रहा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार तथा लखनऊ से प्रकाशित जदीद मरकज उर्दू साप्ताहिक के संपादक हैं)

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