-सुसंस्कृति परिहार
सनातनी यानि अब कथित तौर पर हिंदूवाद और हिंदुत्व के नाम पर वोट अर्जित कर सत्ता पर काबिज विश्वगुरु जी का जो चेहरा इन दिनों गाहे-बगाहे सामने आता है।वह एक बड़ी सोच के करीब लगने लगता है। जबकि उनकी मंशाएं और सोच संघ की उपज हैं जो कूट कूट कर उनमें भरी हुई हैं! वे अपनी पत्नि को उनके रहमो-करम पर छोड़ देते हैं वे स्वतंत्र होती हैं तथा अपना रास्ता खुद बा खुद बनाती हैं। जसोदा बेन के साथ ऐसा ही हुआ वे भाई के घर वापस चलीं गईं और सरकारी नौकरी कर अपने को स्थापित किया। पति की मोहताज नहीं रहीं। लेकिन हिंदू पत्नी की तरह श्रंगार करती रहीं तलाक की ज़रूरत कभी महसूस नहीं की। हिंदू वादी इसे किस दृष्टि से देखते हैं मुझे तो विश्वगुरु का यह स्वरुप कतई पसंद नहीं है।
एक और उनका चेहरा तब नज़र आता है जब वे घर परिवार को छोड़कर शाखाओं में जाने लगे जहां से उनका पारिवारिक रिश्ता ना के बराबर रहा। मौज और जिम्मेदारी विहीन ज़िंदगी का मजा अलग ही आनंद देता है। वे विश्व से अपने को जुड़ा महसूस करने का दिखावा करते हैं। जहां गए वहां उनका ही परिवार मिलता गया।वे सबके होते चले गए।भले वे उन्हें अपना ना मानें सबको गले लगाया। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई,सिख, बौद्ध में अंतर नहीं किया।ऐसी ही कुछ विशेषताएं ऊंची सोच वालों में मिलती हैं। वे एक देश नहीं हमेशा पूरी दुनियां की बात करते रहे । जहां से उनके लाड़ले अडानी के व्यापार के रास्ते खुले।
एक और जो चेहरा विश्वगुरु का सामने आता है वह कतई हिंदू संस्कारों वाला नज़र नहीं आता। तो क्या अयोध्या में राममंदिर निर्माण और उससे जुड़े पूर्व के तमाम कारनामे सिर्फ ढकोसले थे। बाबा विश्वनाथ मंदिर बनारस हो या केदारनाथ बाबा के दरबार में जो कुछ प्रर्दशित हुआ वह सब भी नाटकीय था। असलियत तो उस समय सामने आई जब उनकी माताजी हीराबेन परलोक गमन कर गई। पांच भाइयों में सबसे बड़े भाई सोमा भाई से अन्तिम संस्कार का हक छीनकर तीसरे नंबर के पुत्र नरेन्द्र भाई ने संस्कार किया जबकि माताजी सोमा भाई के पास ही रहती थीं। माताजी की याद तो, प्रधानमंत्री बनने के बाद ईवेंट की तरह सामने जन्मदिन पर आती थी बहरहाल हिंदू धर्मानुसार बड़े पुत्र के मौजूद ना रहने पर यह हक सबसे छोटे पुत्र को मिलता है लेकिन अपने मंत्रीमंडल जैसी तानाशाही की तरह का व्यवहार इस दुखद अवसर भी देखने को मिला।कर्मकांडी चुप बैठे रहे।यह कैसा हिंदुत्व है?क्या अब जो दमदार होगा उसे ही ये अधिकार मिलेगा। कुछ तो बोलो कर्मकांडियो।
इससे बड़ा गुनाह तो विश्वगुरु ने यह भी कर दिया कि अपनी पत्नी जसोदाबेन पर पहरा बैठा दिया गया कि वे बड़नगर जाकर अपनी सासु मां का दर्शन भी नहीं कर पाईं। ऐसा तो समाज में लड़ते-झगड़ते परिवारों में भी नहीं देखा जाता। दुख के समय सभी लोग शामिल होते हैं। यहां यह प्रश्न उठता है कि अपने पहले लोकसभा चुनाव में जसोदाबेन को अपनी पत्नी लिखने वाले ने सिर्फ और सिर्फ उनका नाम फार्म रिजेक्ट ना हो इस आशंका में भर दिया क्योंकि इससे पूर्व विधायक चुनाव में पत्नी का नाम गुरु ने कभी नहीं लिखा। इस विषय पर उनके तमाम भाई वगैरह भी चुप रहे।ये कैसा और कौन सा धर्म मानते हैं कि घर के सदस्यों की इस तरह उपेक्षा की गई।
अगर साहिब को जसोदाबेन से इतना ही परहेज़ था तो तलाक क्यों नहीं लिया।एक स्त्री को तमाम ज़िन्दगी जो सजा दी गई उस पर सोचेंगे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि साहिब ने अपनी मां हीरा बा और पत्नी को सिर्फ अपनी राजनैतिक दुकान चलाने इवेंट बतौर इस्तेमाल किया पत्नि के मौलिक अधिकारों का बुरी तरह हनन किया गया।
इसीलिए तो मां को अग्नि को समर्पित करने के चंद घंटे बाद वन्देमातरम् रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाने पहुंच जाते हैं। अपनी मां के ग़म में, वे कुछ दिन भी नहीं दे पाए। हिंदू धर्म के संस्कार के मुताबिक अन्त्येष्टि करने वाला तेरह दिन तक घर नहीं छोड़ सकता।इन दिनों सूतक माना जाता है। किसी शुभकार्य को नहीं कर सकते पर गुरु तो ठहरे मनमौजी। स्त्री के। लिए वे रोना नहीं रोते भले ही वह मां क्यों ना हो ?
इससे पहले भी अशुभ मुहूर्त में अयोध्या में राममंदिर का भूमिपूजन कर देते हैं। राम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा समारोह आयोजित कर लेते हैं।केदारनाथ बाबा हों या बनारस के विश्वनाथ बाबा और महाकाल उज्जैन के कारिडोर जैसे पावन स्थलों का राजनैतिक भाषणों के लिए इस्तेमाल करते हैं। सबको धता बता कर हरदम मनमानी करते हैं। लगता है वे सिर्फ अपने मन की कहते नहीं है बल्कि करने में पीछे नहीं हैं। जिस हिंदुत्व के नाम पर लोगों को उकसाते रहते हैं वह उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।धर्म का राजनीति में सदुपयोग उनसे सीखने की ज़रूरत है।
आइए, विश्वगुरु से प्रेरणा लें कि कर्मकांडियों के पाखंड से अपने को दूर रखें जो आपका मन कहे उसे स्वीकार करें।हमारा अपना जीवन है धर्म और पाखंड के वितंडावाद में ना पड़ें। जो आया है वो जाएगा उसकी याद में समय नष्ट ना करें। तमाम रिश्ते झूठे हैं अपने काम से मतलब रखें बस। गुरु जी बड़े ज्ञानी ध्यानी है यह ज्ञान उन्हें संघ की शाखाओं से मिला,घर से भागकर तपस्या से मिला है। उसकी उपेक्षा ना करें। कर्मकांडियों को सबक सिखाएं। उन्होंने जो किया वह इनके मुंह पर तमाचा है। मां,बीबी, भाईयों और प्रजा से बढ़कर हम दो और हमारे दो हैं।भक्तों चलो हम भी बनाए हम दो और हमारे दो। समाज से बढ़कर ये साथ होता है।मगर ध्यान रखें कि प्रत्येक व्यक्ति इस ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकता।। इसके लिए विश्वगुरु जैसा षडयंत्री व्यक्तित्व अपेक्षित है।
इसे हिन्दुत्व पर चोट कहने वाले गुनहगार है कलयुग में जब आदमी मशीन बन गया हो तो फिर संवेदनाओं का क्या काम ? विश्वगुरु ने जो किया वह कल की ज़रूरत है।उनकी दूरगामी कार्य पद्धति पर शकोसुबह करना बेमानी है। जब हम जानते हैं उनकी रगों में व्यापार का लहू दौड़ रहा है तो वहां संवेदनशीलता का क्या काम। जहां फायदा देखना ही कायदा है। विश्वगुरु बनना आसान नहीं।अब तो वे अवतारी भगवान बन गए हैं।राम-रहीम, आसाराम ऐसे ही अवतारी पुरुष है । धर्म-कर्म सब व्यापार और राजनीति के अनिवार्य संसाधन हैं। विश्वगुरु इस दृष्टि से आज सबसे बड़े राजनैतिक व्यापारी हैं।इस चतुराई को सीखना आसान नहीं।

