–तेजपाल सिंह ‘तेज’
अगर सरकार निरक्षरता को ही चुन ले, तो बच्चे शिक्षा कहाँ से पाएँगे? क्या आपको पता है अगर सरकार अनपढ़ लोगों की हो, तो क्या होगा? ये अनपढ़ लोग आपके बच्चों को भी अनपढ़ बना देते हैं। मोदी सरकार में शिक्षा मंत्रालय ने भारत को निरक्षर बनाए रखने के लिए एक अनोखा फैसला लिया है। एक ऐसा फैसला जो आपके बच्चों का भविष्य बर्बाद कर देगा। जो देश का भविष्य बर्बाद करने वाला है। सरकार कहती है कि बच्चों को 9वीं कक्षा तक पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। अब वे स्कूलों में किताबें देख सकते हैं और परीक्षा दे सकते हैं।
एक खबर के अनुसार, अनपढ़ सरकार का ये फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब देश भर में बच्चों के लिए सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। गुजरात में तो 700 सरकारी स्कूल एक शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। सिर्फ़ 8 सालों में 525 स्कूल बंद हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में 27,000 से ज़्यादा स्कूल बंद हो रहे हैं। उत्तराखंड में 5000 से ज़्यादा स्कूल बंद हो रहे हैं। राजस्थान और हरियाणा में हज़ारों सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं। देश की जनता सरकार से पूछ रही है कि स्कूल क्यों बंद किए जा रहे हैं? जब स्कूल बंद होंगे तो उनके बच्चों को कौन पढ़ाएगा? इस सवाल का जवाब मोदी सरकार ने दे दिया है।
मोदी सरकार कहती है कि आपके बच्चों को पढ़ाई की जरूरत नहीं है। आपके बच्चों को बिना पढ़े ही पास कर दिया जाएगा। अब आपके बच्चे स्कूलों में किताबें खोलकर परीक्षा दे सकेंगे। और वो अच्छे नंबरों से पास हो जाएँगे। मोदी सरकार भारत में अनपढ़ लोगों का एक समूह बनाना चाहती है। एक ऐसा समूह जो अडानी और अंबानी के खेतों में काम कर सके। और अमीरों के लिए बंद मजदूरों की तरह काम कर सकते हैं।
भारतीय सभ्यता और लोकतंत्र की आत्मा शिक्षा में बसती है। शिक्षा न केवल ज्ञान प्राप्ति का साधन है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मसम्मान, अधिकार-बोध और स्वतंत्रता का अहसास कराती है। जब समाज के हर वर्ग तक शिक्षा पहुँचती है, तभी लोकतंत्र जीवंत और मजबूत बनता है। यही कारण है कि संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को सामाजिक न्याय और समानता का आधार माना। लेकिन आज़ादी के आठ दशक बाद भी भारत में शिक्षा के क्षेत्र में गहरी विषमताएँ दिखाई देती हैं। सरकारी स्कूलों का लगातार बंद होना, शिक्षा का निजीकरण, और अब “ओपन बुक असेसमेंट” जैसे निर्णय यह संकेत देते हैं कि शिक्षा को उसकी मूल संवैधानिक और सामाजिक भूमिका से भटकाकर केवल औपचारिकता बना दिया जा रहा है।
यह स्थिति विशेष रूप से हाशियाकृत आबादियों के लिए खतरनाक है। क्योंकि अशिक्षा केवल व्यक्तिगत अभाव नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक गुलामी का रास्ता खोलती है। इतिहास गवाह है कि अशिक्षित समाज तानाशाही का सबसे आसान शिकार होता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत को जानबूझकर निरक्षर बनाए रखने की साजिश रची जा रही है, ताकि लोकतंत्र की जगह सत्ता की निरंकुशता स्थापित हो सके?
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा उसकी जनता है, और जनता की शक्ति उसकी शिक्षा से आती है। शिक्षा केवल अक्षरों को जोड़ना या किताबों का बोझ नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपनी गरिमा, अपने अधिकार और अपने भविष्य को समझने की क्षमता देती है। यही कारण है कि किसी भी शासक वर्ग के लिए सबसे आसान उपाय जनता को दबा कर रखने का यही होता है कि उसे अंधेरे में रखा जाए—निरक्षर, अचेत और बेख़बर बनाया जाए। आज भारत में जो परिस्थितियाँ बन रही हैं, वे इसी साजिश की ओर इशारा करती हैं। सरकारी स्कूलों का लगातार बंद होना, शिक्षा का निजीकरण, और अब “ओपन बुक असेसमेंट” जैसे फैसले—इन सबके पीछे एक गहरी राजनीति छिपी है। यह राजनीति न केवल शिक्षा को कमजोर करती है बल्कि हाशियाकृत और गरीब वर्गों को और गहरे अज्ञान के गड्ढे में धकेल देती है।
ओपन बुक एग्जाम कैसे होता है ?
ओपन बुक एग्जाम (Open Book Exam), एक ऐसा एग्जाम फॉर्मेट है जिसमें स्टूडेंट्स को एग्जाम के दौरान किताबें, नोट्स या बाकी चीजों (जिनकी परमिशन हो) का इस्तेमाल करने छूट होती है। स्टूडेंट्स, उन स्टडी मटेरियल की मदद से एग्जाम दे सकते हैं यानी बुक खोलकर परीक्षा लिखना। इस फॉर्मेट में स्टूडेंट्स की समझ और नॉलेज का टेस्ट होता है। साथ ही एग्जाम में ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जो तथ्यों को याद करने बजाय समझाने और प्रॉब्लम सॉल्व करने पर बेस्ड होते हैं। उदाहरण के लिए, इतिहास में कोई सवाल किसी अवधारणा को वास्तविक जीवन की स्थिति से जोड़कर पूछा जा सकता है या गणित के किसी नियम को लागू करने के लिए विश्लेषण की आवश्यकता हो सकती है। यह किसी केस स्टडी, समस्या या हो रहे बदलाव को लेकर हो सकते हैं।
पहली बार नहीं हो रही ओपन बुक एग्जाम की चर्चा:
यह पहली बार नहीं है जब सीबीएसई ओपन बुक एग्जाम लागू करने की बात कर रहा है। इससे पहले ओपन बुक एग्जाम को पायलट प्रोजेक्ट या असेसमेंट सुधारने के लिए लागू किया जा चुका है। सबसे पहले इसे 2014 में लाया गया था, लेकिन 2017-18 में यह कहते हुए इसे खत्म कर दिया गया था कि इससे छात्रों में ‘महत्वपूर्ण क्षमताओं’ का प्रभावी ढंग से विकास नहीं हुआ है।
ओपन बुक एग्जाम की जरूरत क्यों?
सीबीएसई क्लास 9 के लिए OBA के प्रस्ताव में कहा गया कि स्कूल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन- NCFSE 2023) का कहना है कि पढ़ाई में रटने से हटकर स्किल्स पर आधारित शिक्षा की ओर बढ़ना जरूरी है। ओपन बुक असेसमेंट इस बदलाव का एक अहम साधन माना गया है।
प्रस्ताव में कहा गया कि एक पायलट स्टडी में विभिन्न विषयों को आपस में जोड़ने वाले साझा मुद्दों पर टेस्ट लिया गया, जिसमें बच्चों ने अपनी किताबों/सामग्री का इस्तेमाल कर उत्तर दिए। इन नतीजों में स्कोर 12% से 47% के बीच ही रहा। इससे पता चला कि बच्चों को किताबों या स्टडी मटेरियल का प्रभावी उपयोग करने और विषयों को जोड़कर समझने में मुश्किल हो रही है।
ओपन बुक का क्या फायदा है?
कई चुनौतियों के बावजूद, टीचर्स ने कहा कि ओपन बुक मूल्यांकन से स्टूडेंट्स को फायदा होगा क्योंकि इससे बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग और वास्तविक जीवन से जुड़ी समझ विकसित होगी। साथ ही, संदर्भ के साथ उत्तर देने की क्षमता भी बढ़ेगी। पायलट प्रोजेक्ट में इन सबकी कमी देखी गई।
रटने से हटकर सोच पर जोर:
प्रस्ताव के मुताबिक क्लास 9 में OBA को हर टर्म में 3 पेन-पेपर असेसमेंट के रूप में शामिल किया जाएगा। ये आकलन मुख्य विषयों में होंगे – लैंग्वेज, मैथमेटिक्स, साइंस और सोशल साइंस। क्वेश्चन पेपर NCFSE 2023 के अनुसार होंगे ताकि बच्चे रटने की बजाय वास्तविक जीवन में ज्ञान का प्रयोग करें। यह भी कहा गया है कि पायलट स्टडी के अनुभव के आधार पर सैंपल पेपर बनाए जाएंगे, जिसमें प्रश्नों की क्वालिटी और क्रिटिकल थिंकिंग पर जोर रहेगा।
क्या है ओपन बुक असेसमेंट (OBA)?
ओपन बुक मूल्यांकन का मुख्य मकसद है कि स्टूडेंट्स किसी भी टॉपिक को रटे नहीं बल्कि समझकर पढ़ें। साथ ही, ओबीए (ओपन बुक असेसमेंट) के जरिए परीक्षा का तनाव कम करने पर भी जोर है। इसका मकसद यह नहीं होता है कि आपको कोई तथ्य कितना याद है बल्कि यह देखना होता है कि आप उस जानकारी का उपयोग कैसे करते हैं। इसी वजह से क्वेश्चन पेपर के सवाल भी उसी हिसाब से तैयार होते हैं। सवाल इस तरह का नहीं होता कि स्टूडेंट किताब खोलकर आसानी से नकल कर लिख दे।
ओपन बुक असेसमेंट कहां-कहां होता है?
इस सिस्टम पर कई राज्य भी काम कर रहे हैं। कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र इसे स्कूलों में खासतौर पर क्लास 9 के लिए पायलट के तौर पर शुरू कर रहे हैं या तैयारी में हैं। कोविड 19 के दौरान हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट में भी यह लागू किया गया था।
ऑन-स्क्रीन आंसर शीट चेकिंग:
सीबीएसई अब 10वीं और 12वीं क्लास की बोर्ड परीक्षाओं की आंसर शीट को चेक करने के लिए डिजिटल मूल्यांकन को अपनाएगा। बोर्ड की गवर्निंग बॉडी ने इसके लिए एक से ज्यादा उन एजेंसी चुनने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिन्हें डिजिटल मूल्यांकन का पहले से अनुभव हो। बोर्ड का मानना है कि इस कदम से समय बचेगा, गलतियां कम से कम होंगी, मूल्यांकन की सटीकता बढ़ेगी और यह सिस्टम ज्यादा पारदर्शिता लाएगा।
डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम:
डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम के तहत परीक्षकों को आंसरशीट्स स्कैन कर कंप्यूटर की स्क्रीन पर उपलब्ध कराई जाएंगी। 2014 में सीबीएसई ने क्लास 10 की और 2015 में क्लास 12 की बोर्ड परीक्षाओं में कुछ रीजनल ऑफिस में डिजिटल मूल्यांकन कर चुका है। अब इस सीबीएसई का इरादा है कि इसका व्यापक स्तर पर अपनाया जाए और सभी सब्जेक्ट की ऑनस्क्रीन मूल्यांकन किया जाए।
28 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट:
सदस्यों ने सुझाव दिया कि इसे सभी विषयों में लागू करने से पहले कुछ विषयों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में विभिन्न क्षेत्रीय कार्यालयों में आजमाया जाए। वित्त समिति ने इस प्रस्ताव को विचार-विमर्श के बाद मंजूरी दी, जिसे गवर्निंग बॉडी ने भी मंजूरी दे दी है। इस परियोजना की अनुमानित लागत 28 करोड़ रुपये है।
शिक्षा के नाम पर धोखा:
सीबीएसई द्वारा कक्षा 9 से “ओपन बुक असेसमेंट” लागू करने का निर्णय सतही तौर पर प्रगतिशील दिखाई देता है। कहा गया है कि इससे छात्रों पर परीक्षा का तनाव कम होगा और वे रटने की प्रवृत्ति से हटकर सोच और समझ पर ध्यान देंगे। लेकिन सवाल यह है कि जब ग्रामीण और गरीब इलाकों में स्कूल ही बंद हो रहे हैं, जब हजारों स्कूल एक-एक शिक्षक पर टिके हुए हैं, जब लाखों बच्चों के पास किताबें, नोट्स, इंटरनेट या संदर्भ सामग्री तक की पहुँच नहीं है—तो यह सुधार किसके लिए है? हक़ीक़त यह है कि इस योजना का लाभ केवल उन बच्चों को मिलेगा जिनके पास पहले से ही संसाधन हैं। शहरी, मध्यमवर्गीय और अमीर परिवारों के बच्चे ओपन बुक सिस्टम से आलोचनात्मक सोच सीख सकते हैं, लेकिन गांव-कस्बों के बच्चों के लिए यह “किताब देखकर पास हो जाने” का आसान रास्ता भर बन जाएगा। न सीखने का दबाव होगा, न पढ़ाई की प्रेरणा—बस औपचारिक डिग्रियां मिलती रहेंगी।
बंद होते स्कूल और बर्बाद होता भविष्य:
गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और हरियाणा तक सरकारी स्कूलों के बंद होने की घटनाएं चिंताजनक हैं। यह महज़ वित्तीय संकट का सवाल नहीं है बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षा का बोझ धीरे-धीरे निजी संस्थानों पर डाला जा रहा है। गरीब और हाशियाकृत परिवार निजी स्कूलों की भारी फीस नहीं चुका सकते, न ही वे “ऑनलाइन शिक्षा” जैसी डिजिटल सुविधाओं तक पहुँच रखते हैं। नतीजा यह होगा कि उनकी अगली पीढ़ी निरक्षर या अर्द्धशिक्षित रह जाएगी। यह परिदृश्य उस सपने को चकनाचूर कर देता है, जिसे संविधान निर्माताओं ने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर गढ़ा था।
निरक्षरता और तानाशाही का रिश्ता:
इतिहास गवाह है कि जहां जनता निरक्षर रही है, वहां तानाशाही ने गहरी जड़ें जमाईं। अनपढ़ जनता सवाल नहीं पूछती, विरोध नहीं करती और सत्ता की हर चालाकी को नियति मान लेती है। यही कारण है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ताधारी वर्ग सबसे पहले जनता को सवाल पूछने लायक शिक्षित बनने से रोकता है।
भारत में शिक्षा का यह पतन केवल संयोग नहीं है। यह उस “कारपोरेट-राजनीति गठजोड़” का हिस्सा है जो चाहती है कि करोड़ों मजदूरों की फौज तैयार रहे, जो खेतों, कारखानों और मॉल्स में बिना सवाल किए सस्ते श्रमिक के रूप में काम करती रहे। शिक्षा यदि सच में हर हाथ को हुनर और हर दिमाग को चेतना देगी, तो सत्ता की जड़ें हिलेंगी। इसलिए, अशिक्षा बनाए रखना सत्ता के लिए ज़रूरी हो जाता है। इतिहास बताता है कि निरक्षर और अचेतन समाज ही तानाशाही का आसान शिकार होता है। जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, तो सत्ता मनमानी करने लगती है। शिक्षा से वंचित करना इसलिए केवल शैक्षणिक सुधार का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के खिलाफ़ साजिश है। आज गरीब वर्गों को अशिक्षित बनाए रखने का परिणाम यही होगा कि वे बड़े पूंजीपतियों के खेतों और कारखानों में सस्ते श्रमिक बनकर रह जाएंगे, जबकि सत्ता पर कुछ गिने-चुने लोगों का वर्चस्व कायम रहेगा।
लोकतंत्र की असली परीक्षा:
आज जब सरकारें “नई शिक्षा नीति” और “ओपन बुक असेसमेंट” के नाम पर शिक्षा में सुधार का दावा कर रही हैं, तो हमें यह देखना होगा कि क्या इन कदमों से सबसे गरीब और पिछड़े तबकों तक वास्तविक शिक्षा पहुँच रही है या नहीं। अगर शिक्षा केवल कागज़ पर पासिंग सर्टिफिकेट देने का माध्यम बनकर रह जाएगी, तो यह लोकतंत्र के लिए घातक होगा।
निष्कर्षत: देश की हाशियाकृत आबादियों को निरक्षर बनाए रखना महज़ एक शैक्षणिक नाकामी नहीं है; यह एक राजनीतिक साजिश है। यह साजिश जनता को सवाल पूछने से रोकती है और सत्ता को बिना रोक-टोक अपनी मनमानी करने देती है। शिक्षा का अधिकार केवल परीक्षा पास करने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक चेतना का अधिकार है। अगर भारत को सचमुच लोकतंत्र बनाए रखना है, तो स्कूलों को बंद करने और शिक्षा को खोखला करने की बजाय हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाना ही सबसे बड़ा कार्यभार होना चाहिए।
संविधान और आंबेडकर के शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण:
संविधान और आंबेडकर के शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण को शामिल किए बिना यह लेख अधूरा रहेगा, क्योंकि भारत में शिक्षा का सवाल केवल शैक्षणिक सुधार का प्रश्न नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की रक्षा का मूल प्रश्न है।
भारतीय लोकतंत्र की नींव जनता की भागीदारी पर टिकी है, और जनता की भागीदारी तभी संभव है जब हर नागरिक शिक्षित हो, जागरूक हो और सवाल पूछने की क्षमता रखता हो। लेकिन जब शिक्षा को कमजोर किया जाता है, स्कूल बंद किए जाते हैं, और बच्चों को “औपचारिक रूप से पास” कर देने की परंपरा शुरू होती है, तब यह लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने जैसा होता है। शिक्षा से वंचित करना दरअसल हाशियाकृत समुदायों को हमेशा के लिए सत्ता और संसाधनों से दूर रखने की राजनीति है।
शिक्षा के नाम पर सुधार या छलावा?
सीबीएसई की “ओपन बुक असेसमेंट” (OBA) योजना को एक शैक्षणिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह छात्रों को रटने से बचाएगा और समझ-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देगा। लेकिन सवाल उठता है कि जब देशभर में हज़ारों सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, एक-एक शिक्षक से सैकड़ों बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, और गरीब वर्गों के पास संदर्भ सामग्री, पुस्तकालय या डिजिटल साधनों की पहुँच नहीं है—तो यह सुधार किसके लिए है? असलियत यह है कि यह प्रणाली उन बच्चों के लिए तो अवसर पैदा करेगी जिनके पास पहले से संसाधन हैं, लेकिन गरीब और हाशियाकृत तबकों के लिए यह “किताब देखकर पास हो जाना” मात्र रह जाएगा। परिणामस्वरूप उनके भीतर न तो वास्तविक ज्ञान विकसित होगा और न ही सामाजिक-आर्थिक उन्नति की संभावना।
स्कूलों का बंद होना और निजीकरण की साजिश:
गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में सरकारी स्कूलों का बड़े पैमाने पर बंद होना केवल वित्तीय मजबूरी का परिणाम नहीं है। यह एक सुनियोजित प्रयास है, जिसमें शिक्षा को निजी क्षेत्र के हवाले किया जा रहा है। निजी स्कूलों की भारी फीस गरीब परिवार वहन नहीं कर सकते। ऐसे में शिक्षा धीरे-धीरे एक वर्ग-विशेष तक सीमित हो जाएगी। यानी संविधान द्वारा गारंटीकृत समान अवसर का अधिकार केवल कागज़ों पर रह जाएगा।
संविधान और शिक्षा: समानता की गारंटी:
भारत का संविधान शिक्षा को केवल ज्ञान का माध्यम नहीं मानता, बल्कि इसे सामाजिक समानता और न्याय की आधारशिला मानता है।
· अनुच्छेद 21ए (86वें संविधान संशोधन, 2002) के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा मौलिक अधिकार बनाया गया।
· अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह शिक्षा के माध्यम से समाज के कमजोर और पिछड़े तबकों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाए।
· अनुच्छेद 15 और 17 के तहत सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने की जो व्यवस्था की गई है, उसका वास्तविक क्रियान्वयन शिक्षा के बिना संभव ही नहीं है। स्पष्ट है कि संविधान शिक्षा को केवल व्यक्तिगत प्रगति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य मानता है।
डॉ. आंबेडकर और शिक्षा का दृष्टिकोण:
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने शिक्षा को “समानता और स्वतंत्रता” की कुंजी बताया था। वे मानते थे कि समाज के हाशियाकृत तबकों की मुक्ति का पहला रास्ता शिक्षा से होकर गुजरता है। उनके प्रसिद्ध नारे “शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो” में शिक्षा को सबसे पहले रखा गया है, क्योंकि उनके अनुसार बिना शिक्षा के न तो संगठन संभव है और न ही संघर्ष।
आंबेडकर यह भी कहते थे — “शिक्षा ही वह हथियार है जिसके बल पर शोषित समाज अपनी गुलामी की जंजीरों को तोड़ सकता है।” आज जब सरकारी नीतियों के चलते गरीब और दलित-आदिवासी बच्चों की शिक्षा खतरे में है, तो यह आंबेडकर के सपनों और संविधान की आत्मा दोनों का अपमान है।
निष्कर्षत: देश की हाशियाकृत आबादियों को शिक्षा से वंचित करना केवल बच्चों का भविष्य छीनना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र को कमजोर करने और तानाशाही की राह खोलने का तरीका है। संविधान ने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाकर हर नागरिक को समान अवसर देने की गारंटी दी थी। डॉ. आंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक मुक्ति का पहला कदम बताया था। लेकिन जब स्कूल बंद किए जा रहे हों, शिक्षा को निजीकरण के हवाले किया जा रहा हो, और बच्चों को “बिना पढ़े पास” करने जैसी नीतियाँ लाई जा रही हों, तब यह समझना होगा कि यह एक गहरी राजनीतिक रणनीति है। यदि भारत को सचमुच लोकतांत्रिक और समानतावादी राष्ट्र बनाए रखना है, तो शिक्षा को केवल सुधार की प्रयोगशाला नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और स्वतंत्रता का सबसे बड़ा औजार मानना होगा। यही आंबेडकर की चेतावनी थी और यही संविधान का संदेश भी है।
शिक्षा का प्रश्न केवल बच्चों की परीक्षा प्रणाली का प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न है लोकतंत्र की जड़ों का, सामाजिक न्याय की गारंटी का, और उस भविष्य का जिसे आंबेडकर और संविधान निर्माताओं ने समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व पर टिका हुआ देखा था। आज जब हाशियाकृत वर्गों को शिक्षा से दूर किया जा रहा है, जब स्कूल बंद किए जा रहे हैं और बच्चों को “बिना पढ़े पास” करने जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं, तब यह साफ दिखता है कि सत्ता के लिए अशिक्षा कोई नाकामी नहीं बल्कि एक रणनीति है।
यदि भारत को तानाशाही की अंधेरी गलियों में जाने से बचाना है तो शिक्षा को हर बच्चे का वास्तविक अधिकार बनाना होगा। यह अधिकार केवल औपचारिक सर्टिफिकेट तक सीमित न रहकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, संसाधनों की समान पहुँच और आलोचनात्मक सोच के विकास तक पहुँचना चाहिए। यही संविधान का आदेश है, यही आंबेडकर का संदेश है और यही लोकतंत्र की रक्षा का सबसे बड़ा उपाय है।
संदर्भ सूची
1. भारतीय संविधान, 1950 – विशेष रूप से अनुच्छेद 15, 17, 21ए, 45 और 46।
2. 86वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 – जिसमें 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा मौलिक अधिकार बनाई गई।
3. डॉ. भीमराव आंबेडकर – भाषण और लेखन, विशेषकर “Annihilation of Caste” और उनके शिक्षा संबंधी उद्धरण।
4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) – शिक्षा सुधार और ओपन बुक असेसमेंट जैसी योजनाओं का संदर्भ।
5. नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCFSE 2023) – जिसमें रटने से हटकर कौशल-आधारित शिक्षा पर ज़ोर दिया गया।
6. समाचार स्रोत – एएनआई, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक भास्कर, द प्रिंट आदि (2025 में प्रकाशित रिपोर्ट्स जिनमें CBSE के OBA फैसले और सरकारी स्कूलों के बंद होने की सूचनाएँ दी गईं)।
7. शोध ग्रंथ –
· Krishna Kumar, Political Agenda of Education
· Jean Dreze & Amartya Sen, India: Development and Participation
· Gail Omvedt, Ambedkar: Towards an Enlightened India

