-तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारत का संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के सपनों, आकांक्षाओं और संघर्षों की जीवित अभिव्यक्ति है। यह दस्तावेज़ हमें न केवल शासन की रूपरेखा देता है बल्कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों को भी स्थापित करता है। फिर भी, संविधान के अस्तित्व में आने के बाद से आज तक यह सवालों और संघर्षों के बीच निरंतर जूझता रहा है।
संविधान निर्माण: एक ऐतिहासिक मील का पत्थर:
भारतीय संविधान का निर्माण 1946 से 1949 के बीच संविधान सभा में हुआ। 2 वर्ष 11 माह 18 दिन की लंबी बहस और विचार-विमर्श के बाद 26 नवंबर 1949 को इसे अंगीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इसे “एक जीवंत दस्तावेज़” कहा था, जिसे समय और परिस्थिति के अनुसार संशोधित किया जा सकता है। संविधान में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं, जो आज संशोधनों के बाद 470 से अधिक अनुच्छेद और 12 अनुसूचियों में विस्तृत हो चुकी हैं।
भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। यह केवल शासन की संरचना का दस्तावेज नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का परिणाम है। इसमें लोकतंत्र, समानता, न्याय और स्वतंत्रता के आदर्शों को मूर्त रूप दिया गया है। किंतु संविधान के लागू होने के 75 वर्ष बाद भी यह सवाल और संघर्षों से घिरा हुआ है।
संविधान निर्माण और उसकी विशेषताएँ
· संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ और 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंगीकृत किया गया।
· 26 जनवरी 1950 से यह लागू हुआ।
· डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान का शिल्पकार माना जाता है।
· मूल संविधान में 395 अनुच्छेद, 22 भाग और 8 अनुसूचियां थीं।
· आज यह 470 से अधिक अनुच्छेद और 12 अनुसूचियों में विस्तृत हो चुका है।
प्रमुख विशेषताएँ:
1. संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य (प्रस्तावना, 42वाँ संशोधन 1976)।
2. मूल अधिकार (अनुच्छेद 12-35)।
3. राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 36-51)।
4. स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)।
5. अर्ध-संघीय ढाँचा (Quasi-Federal)।
संविधान से जुड़े मुख्य सवाल
Ø समानता बनाम सामाजिक विषमता
· अनुच्छेद 14-18 समानता और अस्पृश्यता उन्मूलन की गारंटी देते हैं।
· लेकिन जातिगत भेदभाव, महिला असमानता और आर्थिक विषमता आज भी प्रश्न बने हुए हैं।
· मंडल आयोग और आरक्षण नीति इन्हीं विषमताओं से निपटने का प्रयास है।
Ø धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न
· अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता देते हैं।
· संविधान ने धर्मनिरपेक्षता को राज्य की नीति बनाया, परंतु राजनीति में धर्म का बढ़ता हस्तक्षेप इस सिद्धांत को चुनौती देता है।
· एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) केस में सुप्रीम कोर्ट ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) बताया।
Ø केंद्र बनाम राज्य अधिकार
· संविधान संघीय होते हुए भी केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाता है।
· राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) का बार-बार दुरुपयोग हुआ।
· 1980 के दशक तक राज्यों की सरकारें गिराने में इसका राजनीतिक इस्तेमाल व्यापक रहा।
· सुप्रीम कोर्ट ने एस.आर. बोम्मई केस में इस पर रोक लगाने की कोशिश की।
Ø लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रश्न
· अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति, संगठन, आंदोलन, निवास और पेशे की स्वतंत्रता की गारंटी है।
· लेकिन आपातकाल (1975-77) में यह अधिकार निलंबित कर दिए गए।
· केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) ने स्पष्ट किया कि संविधान की “मूल संरचना” (Basic Structure) को बदला नहीं जा सकता।
Ø न्यायपालिका की स्वतंत्रता:
· न्यायपालिका संविधान की रक्षक है।
· लेकिन कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव समय-समय पर उठता रहा है (जैसे NJAC बनाम Collegium विवाद)।
Ø संविधान और संघर्ष सामाजिक न्याय का संघर्ष
· दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और महिलाएँ अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्षरत हैं।
· आरक्षण नीति, महिला आरक्षण विधेयक (2023) इसी संघर्ष का परिणाम है।
Ø आपातकाल का संघर्ष (1975-77)
· 42वें संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को सीमित किया गया।
· इसने दिखाया कि राजनीतिक सत्ता संविधान की आत्मा को भी दबा सकती है।
Ø आर्थिक नीतियाँ बनाम समाजवाद
Ø संविधान की प्रस्तावना में “समाजवादी” शब्द है।
Ø लेकिन 1991 के बाद उदारीकरण और निजीकरण ने समाजवाद की दिशा बदल दी।
Ø अल्पसंख्यक अधिकार और बहुसंख्यकवाद का संघर्ष
· शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 30) अल्पसंख्यकों को विशेष अधिकार देता है।
· फिर भी सांप्रदायिक तनाव संविधान की धर्मनिरपेक्षता को चुनौती देता है।
Ø सत्ता की कथनी और करनी: संविधान पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव:
भारत का संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, परंतु इसकी प्रभावशीलता शासन करने वाली शक्तियों के आचरण पर निर्भर करती है। आज की सत्ता बार-बार संविधान की शपथ लेकर उसके मूल्यों की रक्षा का दावा करती है, किन्तु व्यवहार में अनेक ऐसे कदम उठाए जाते हैं जो संविधान की आत्मा से मेल नहीं खाते।
1. धर्मनिरपेक्षता बनाम राजनीतिक ध्रुवीकरण:
· सत्ता की कथनी: बार-बार कहा जाता है कि भारत की आत्मा संविधान है और इसमें सभी धर्मों का समान सम्मान है।
· करनी: चुनावी भाषणों, नीतियों और अभियानों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाले वक्तव्य और कदम दिखाई देते हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है, जिस पर व्यापक बहस हुई कि यह धर्मनिरपेक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
2. संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता:
· कथनी: सत्ता यह कहती है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं (चुनाव आयोग, न्यायपालिका, प्रेस, विश्वविद्यालय) स्वतंत्र और मजबूत हैं।
· करनी: व्यवहार में इन संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव और हस्तक्षेप के आरोप बार-बार लगते हैं। मीडिया की स्वतंत्रता (Freedom of Press) और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न उठे हैं।
· कथनी: सत्ता यह दावा करती है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जहां हर नागरिक को बोलने की आजादी है।
· करनी: व्यवहार में आलोचक, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और छात्र आंदोलनों पर राजद्रोह (Sedition) या UAPA जैसी कठोर धाराओं का प्रयोग होता है। यह अनुच्छेद 19 की आत्मा पर सीधा प्रहार माना जाता है।
3. समानता और सामाजिक न्याय:
· कथनी: सत्ता समान अवसर और “सबका साथ, सबका विकास” का नारा देती है।
· करनी: व्यवहार में आर्थिक असमानता बढ़ रही है। कॉर्पोरेट जगत को कर छूट और बड़े पैमाने पर निजीकरण किया जा रहा है, जिससे संविधान के समाजवादी स्वरूप पर प्रश्न उठते हैं।
4. संघवाद (Federalism):
· कथनी: सरकार बार-बार “सहकारी संघवाद” (Cooperative Federalism) की बात करती है।
· करनी: व्यवहार में राज्यों को वित्तीय संसाधनों, नीति निर्माण और संवैधानिक अधिकारों (जैसे दिल्ली राज्य और केंद्र का विवाद, पश्चिम बंगाल में केंद्र-राज्य टकराव) में उपेक्षित किया जाता है।
5. संविधान दिवस का प्रतीकवाद:
· कथनी: सत्ता 26 नवंबर को “संविधान दिवस” बड़े पैमाने पर मनाती है और डॉ. अंबेडकर का नाम बार-बार लेती है।
· करनी: व्यवहार में वही कदम उठाए जाते हैं जो सामाजिक न्याय और समानता के अंबेडकरवादी दृष्टिकोण से मेल नहीं खाते।
आज का परिदृश्य:
यथोक्त के आलोक में, आज संविधान के मूल्यों पर कई मोर्चों से दबाव है।
· लोकतंत्र के नाम पर चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का वर्चस्व बढ़ रहा है।
· प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
· समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है।
· दलित, महिला, आदिवासी, अल्पसंख्यक समुदाय आज भी समान अवसर के लिए संघर्षरत हैं।
· चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का प्रभाव बढ़ रहा है।
· मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं।
· नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और अनुच्छेद 370 हटाने जैसे कदमों ने संवैधानिक बहस को तेज किया है।
· दलित, महिला, किसान, आदिवासी आंदोलन बताते हैं कि संवैधानिक आदर्श अभी अधूरे हैं।
संविधान से जुड़े संघर्ष :
1. सामाजिक न्याय का संघर्ष – दलित, पिछड़े वर्ग, महिला और आदिवासी समुदाय लगातार अपने संवैधानिक अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत रहे हैं। आरक्षण नीति इसी संघर्ष का परिणाम है।
2. संवैधानिक संशोधन बनाम मूल भावना – आपातकाल (1975-77) के दौरान संविधान में हुए बदलावों ने मूल अधिकारों को ही खतरे में डाल दिया। इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या सत्ता संविधान से ऊपर हो सकती है?
3. लोकतांत्रिक अधिकारों का संघर्ष – नागरिक अधिकार आंदोलनों, किसान और श्रमिक आंदोलनों ने बार-बार यह जताया कि संविधान में लिखे अधिकार तब तक अधूरे हैं जब तक आम जनता उन्हें व्यवहार में महसूस न कर सके।
4. निजीकरण और उदारीकरण के दौर का संघर्ष – संविधान में समाजवादी राज्य की परिकल्पना है। परंतु आर्थिक नीतियों में निजीकरण और वैश्वीकरण ने इस आदर्श को चुनौती दी है।
यह विरोधाभास दिखाता है कि सत्ता की कथनी और करनी के बीच गहरी खाई है। संविधान को प्रतीकात्मक रूप से पूजनीय दिखाया जाता है, लेकिन उसके मूल तत्व – धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, स्वतंत्रता और समानता – व्यवहार में लगातार चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यही आज का सबसे बड़ा सवाल और संघर्ष है।
भविष्य के सवाल
1. क्या संविधान की “मूल संरचना” की रक्षा न्यायपालिका कर पाएगी? यानी क्या संविधान की मूल आत्मा को अक्षुण्ण रखा जा सकेगा?
2. क्या सामाजिक और आर्थिक समानता व्यवहार में संभव हो पाएगी?
3. क्या लोकतंत्र महज चुनाव तक सीमित रह जाएगा या सामाजिक न्याय का वास्तविक माध्यम बनेगा?
4. क्या धर्मनिरपेक्षता केवल शब्दों तक सीमित रह जाएगी या वास्तविकता में लागू होगी?
5. क्या लोकतंत्र चुनावी राजनीति से आगे जाकर नागरिक अधिकारों की गारंटी बन पाएगा?
6. क्या नागरिकों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति पर्याप्त चेतना विकसित हो पाएगी?
हालिया सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संविधान की रक्षा
1. निजता का अधिकार (2017) – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजता, जीवन और स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) का अभिन्न हिस्सा है। यह निर्णय डिजिटल युग में नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
2. सबरीमाला केस (2018) – महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और 25 (धर्म की स्वतंत्रता) के विरुद्ध बताया।
3. दिल्ली बनाम उपराज्यपाल (2023) – सुप्रीम कोर्ट ने संघवाद की भावना को मजबूत किया और राज्यों की निर्वाचित सरकारों की शक्तियों की पुष्टि की।
4. महिला आरक्षण विधेयक (2023) – संसद ने इसे पारित किया, जिससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया।
उपसंहार की बात करें तो संविधान केवल एक किताब नहीं है, यह जीवित दस्तावेज है। इसकी रक्षा केवल न्यायपालिका, संसद या कार्यपालिका नहीं कर सकती, बल्कि इसके मूल्यों को बचाना हर नागरिक का कर्तव्य है। सवाल और संघर्ष हमेशा बने रहेंगे, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी है कि सवाल उठें और उनके समाधान खोजे जाएँ। यह न केवल शासन की संरचना देता है बल्कि समाज को न्यायपूर्ण और समानता मूलक बनाने की दिशा भी दिखाता है। किंतु संविधान की रक्षा केवल न्यायपालिका या संसद का कार्य नहीं है; इसकी रक्षा का भार हर नागरिक पर है। सवाल और संघर्ष बने रहेंगे, पर यही लोकतंत्र की असली खूबसूरती भी है।
भारतीय संविधान अपने जन्म के साथ ही सवालों और संघर्षों से घिरा रहा है। यह कभी जातीय विषमता के खिलाफ, कभी आर्थिक असमानता, कभी धर्मनिरपेक्षता, तो कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में संघर्ष करता रहा है।
आज की सत्ता की कथनी और करनी के विरोधाभास ने संविधान के सामने नए प्रश्न खड़े कर दिए हैं। संविधान दिवस पर इसकी स्तुति करना आसान है, पर उसकी आत्मा को व्यवहार में लागू करना कठिन साबित हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय दिखाते हैं कि संविधान की मूल संरचना अब भी जीवित है और न्यायपालिका उसकी रक्षा कर रही है। किंतु संविधान की अंतिम सुरक्षा केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि नागरिकों की संवैधानिक चेतना से होगी। संविधान को केवल किताबों और उत्सवों तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि इसे रोजमर्रा के जीवन और शासन में उतारना होगा। यही संघर्ष की दिशा है और यही भारतीय लोकतंत्र की असली ताक़त भी।
सारांश:- भारत का संविधान आधुनिक भारतीय राज्य का आधारभूत दस्तावेज़ है, जो समानता, स्वतंत्रता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल्यों को स्थापित करता है। किंतु इसके लागू होने के 75 वर्षों बाद भी यह अनेक सवालों और संघर्षों से जूझ रहा है। सामाजिक विषमता, धर्मनिरपेक्षता का संकट, संघीय ढाँचे की चुनौतियाँ, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर दबाव – ये सभी इसके मूल आदर्शों को निरंतर परखते रहते हैं।
वर्तमान सत्ता की कथनी और करनी के बीच विरोधाभास ने संविधान की आत्मा पर प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव डाला है। संविधान दिवस और डॉ. अंबेडकर का नाम प्रतीकात्मक रूप से याद किया जाता है, पर व्यवहार में धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और संघवाद बार-बार चुनौती पाते हैं। संविधान की अंतिम सुरक्षा केवल संस्थागत स्तर पर नहीं, बल्कि नागरिकों की संवैधानिक चेतना और सक्रिय सहभागिता पर निर्भर है। यही सवाल और संघर्ष भारतीय लोकतंत्र को जीवंत और प्रगतिशील बनाए रखते हैं।

