डॉ. विकास मानव
_विश्व के प्राचीन इतिहास में ऐतरेय ब्राह्मणग्रंथ, जिसे ऋगवेदीय ब्राह्मण भी कहा जाता है; के अनुसारः-_
*ओ३म् आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति।। (१/१)*
तात्पर्य यह है कि ब्रह्माण्ड की उत्त्पत्ति के पूर्व इस ओ३म् नाम से जाना जाने वाले आत्मा के सिवाय कुछ भी नही था जिसमे ईक्षण शक्ति ने ही ईक्षण किया कि(नु=मै) लोकान् सृजा अर्थात् लोकों की रचना करूँ।
ईक्षत यानी चेष्टा करना तो एक चेष्टा करनेवाली एक शक्ति विद्यमान थी जिसे आगे चलकर कारण अथवा बीज कहा गया। इसका मतलब यह हुआ कि यदि अध्यात्म की भाषा मे समझा जाय तो न तो यह सत् था न असत् था।
लेकिन अलग-अलग स्थानों पर इसे अलग-अलग माना गया है, क्योंकि अन्य कोई था ही नही तो सब कल्पना ही है।
पर कोई कारण यानी शक्ति थी जिसे ब्रह्म अनामय अज भगवन्ता भी कह सकते हैं, इसके नाम पर मतभेद हो सकता है किन्तु इसके होने मे कोई मतभेद नही है इसलिए न्यायसूत्र/१/१/४०/ के अनुसार ईश्वर तो है ही।
वर्णज्ञान के पश्चात इसे यही नाम दिया गया।
_इस विषय पर तमाम मतभेदों के बावजूद पाश्चात्य जगत् के दार्शनिक विधायी हैं :_
द्वैतारक परिकल्पना के अनुसार इमैनुएल काण्ट(१७५५) लाप्लास(१७९६) टी.सी.चैम्बरलीन(१९०५) एच.एन.रसेल आदि वैज्ञानिकों ने माना है कि यह घटना एक बड़े विस्फोट का परिणाम है। इस विस्फोट से ही पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश अपने वर्तमान स्वरूप मे आए।
यह सब वह कल्पनाएं है जो वैदिक दर्शन (ब्राह्मण-ग्रन्थों) की कल्पना के करोड़ो वर्ष बाद की हैं, चैतन्य मानव(Homosapiens) करोड़ो वर्ष पूर्व अस्तित्व मे था।
इसलिए हम यह मानते हैं कि जो
सइमाँल्लोकानसृजत यानी जिसने इस लोक का (ब्रह्माण्ड) का सृजन किया वह कोई और ही है. क्योंकि अम्भो=द्युलोक से ऊपर के लोक,(ऐतरेय/१/२) तो सत्यलोक है और सत्य तक किसी की पहुँच नही है.
हम लोग सप्तलोकों मे से भूर्भुवः स्वः अधिक तीन लोकों तक पहुँच सकते हैं/जान सकते हैं।
केवल आत्मविद्या/ब्रह्यविद्या ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा महः, तपः, जनः और सत्यः को जाना जा सकता है(अनुभव मे).
(यह चिंतन केवल ‘स्व’ के जिज्ञासुओं/साधकों के लिए है, नास्तिक, कर्मकाण्डी, कथावाचक और पौराणिक मूर्खों के लिए नहीं, क्योंकि चेतना इसका आश्रयस्थल ही नही है.)
🍃चेतना विकास मिशन :

