Site icon अग्नि आलोक

महाभारतयुगीन जन्म आधारित जाति-व्यवस्था का समसामयिक निहितार्थ

Share

 पुष्पा गुप्ता

आज जातीय अस्मिता के झंडाबरदार तो बहुत मिलेंगे, भ्रामक जातीय श्रेष्ठताबोध के शिकार भी गाहे-बगाये मिल जाएँगे। महाभारत काल तक जन्मना जाति-व्यवस्था के औचित्य पर गम्भीर सवाल उठने लगे थे। इसके बावजूद आज तक इसका जीवित रहना भारतीय इतिहास की एक अबूझ पहेली है। 

   द्वैतवन में अकेले घूमने निकले भीम को पर्वत की कंदरा में आहार की प्रतीक्षा में बैठे एक विशालकाय अजगर ने जकड़ लिया। भीम के लौटने में विलम्ब से चिंतित युधिष्ठिर उनके पद-चिह्नों के सहारे उस कंदरा तक पहुंचे। युधिष्ठिर द्वारा भीम को छोड़ने का आग्रह करने और परिचय पूछे जाने पर अजगर ने स्वयं को पिछले जन्म में कुरु वंश का पूर्वज प्रतापी राजा नहुष बताया जो अहंकार के अतिरेक के कारण महर्षि अगस्त्य के शाप से इस अवस्था को प्राप्त हुए थे।

      भीम को छोड़ने के लिए अजगर-रूप नहुष ने युधिष्ठिर के सामने कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी, जिसे युधिष्ठिर ने स्वीकार कर लिया। 

अजगर (नहुष) का पहला प्रश्न :

ब्राह्मण कौन है और जानने योग्य तत्व क्या है?

युधिष्ठिर का उत्तर :

जिसमें सत्य, दान, क्षमा, शील, अक्रूरता, तपस्या एवं दया के गुण हैं वही ब्राह्मण है। जानने योग्य तत्व वह परब्रह्म है जो सुख-दुख़ से परे है (ध्यान देने योग्य है कि ये सभी गुण नैतिकता के हैं, पूजापद्धति या कर्मकांड से इनका कोई संबंध नहीं)।    

       नहुष ने दोनों प्रश्नों के उत्तर का प्रतिवाद किया। पहले उत्तर के प्रतिवाद में उन्होंने कहा :

    सत्य, दान, अक्रोध, अक्रूरता, अहिंसा और दया जैसे सद्गुण तो शूद्रों में भी पाए जाते हैं। तो क्या वे भी ब्राह्मण हैं? [दूसरे उत्तर का प्रतिवाद यहाँ प्रासंगिक नहीं है।]

युधिष्ठिर :

यदि (जन्मना) शूद्र में सत्यादि उपरोक्त सद्गुण हैं तो वह ब्राह्मण है और (जन्मना) ब्राह्मण में ये गुण नहीं हैं तो वह शूद्र है।                             

  नहुष :

यदि आचरण से ही ब्राह्मणत्व का निर्धारण संभव है तब तो जाति-व्यवस्था व्यर्थ है। 

युधिष्ठिर :

 जाति की परीक्षा बहुत कठिन है क्योंकि सभी जातियों में परस्पर इतना वर्णसंकर हो चुका है कि सभी लोग सभी जाति की स्त्रियों से संतान उत्पन्न कर रहे हैं। सभी मनुष्य वाणी में, यौन-प्रवृत्ति में और जन्म-मृत्यु में एक-से देखे जाते हैं। इस सम्बंध में श्रुति-प्रमाण भी मिलता है। ‘ये यजामहे’ [‘जो (हमलोग) यज्ञ कर रहे हैं’]—सभी जातियों का बोधक है क्योंकि यज्ञकर्ता की जाति (या वर्ण) निश्चित नहीं है। इसलिए तत्वदर्शी विद्वान सदाचार को ही निर्णायक मानते हैं, जाति को नहीं.

परिणामत: संतुष्ट हुए अजगर ने भीम को मुक्त कर दिया, फिर युधिष्ठिर ही उससे तत्वज्ञान पर प्रश्न करने लगे…अंतत: पूर्व-निर्धारित शाप के शमन की शर्त पूरी होने पर नहुष का शाप कट गया और वे स्वर्गलोक चले गये। 

     तो बात आकर टूटती है वर्णसंकर या रक्तमिश्रण पर। गर्भनिरोधक के चलन के पूर्वकाल को दृष्टि में रखें तो मनुष्य का जैसा स्वभाव है, और स्त्री-पुरुष दोनों में यौन-आकर्षण का जो विवेकातीत, अतिक्रामक और प्रकृत रूप है, किसी भी समाज का दीर्घकालीन सहजीवन अपरिहार्य रूप से वर्णसंकरता को जन्म देता है। जितना प्राचीन सहजीवन, वर्णसंकरता का उतना ही विस्तार।

       हमारा सहज अनुभव है कि समाज में कितने भी कठोर और दृढ़ीभूत विभाजन हों, वर्जित यौन-सम्बंध इन विभाजनों की दीवारें तोड़ देता है। जातीय विभाजन, अस्पृश्यता तक, इसके आड़े नहीं आ पाते।  

अंतर्जातीय, विवाहेतर यौन-सम्बंध के सर्वग्रासी प्रभाव को छोड़ दें, तो भी महाभारत काल में वर्णसंकर के कई कारक थे। अनुलोम अंतर्जातीय विवाह तो मान्य थे ही, नियोग प्रथा भी प्रचलित थी जिसमें जात्येतर पुरुष की सहभागिता अपरिहार्य रूप से वर्णसंकरता को जन्म देती थी। 

       हस्तिनापुर के महाराज शांतनु ने धीवर-कन्या सत्यवती पर आसक्त होकर उससे विवाह करने की ठान ली। उनकी पहली पत्नी गंगा से उत्पन्न पुत्र देवव्रत उनके वैध उत्तराधिकारी और घोषित युवराज थे। सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि वे सत्यवती का विवाह शांतनु से तभी कर सकते हैं जब सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही उत्तराधिकारी बने। देवव्रत ने प्रतिज्ञा की कि वे उत्तराधिकार की माँग नहीं करेंगे।

       सत्यवती के पिता फिर भी नहीं माने, उन्होंने तर्क दिया कि देवव्रत नहीं, तो देवव्रत का पुत्र ज्येष्ठाधिकार के नियम से उत्तराधिकार की माँग कर सकता है। पितृभक्त देवव्रत ने तब एक कठिन (भीष्म) प्रतिज्ञा कर डाली–वे आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे। 

        धीवर-कन्या सत्यवती से शांतनु का विवाह हुआ और दो पुत्र उत्पन्न हुए—चित्रांगद (ज्येष्ठ) और विचित्रवीर्य (कनिष्ठ)। इस तरह  चित्रांगद  सिंहासन के उत्तराधिकारी थे। किंतु उन्होंने युवावस्था में प्रवेश भी नहीं किया था कि पिता शांतनु की मृत्यु हो गई। सत्यवती की सहमति से भीष्म ने चित्रांगद का राज्याभिषेक कराया।

       गंधर्वों के साथ हुए एक युद्ध में जल्दी ही चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हो गए। तब भीष्म ने विचित्रवीर्य को राजगद्दी पर बिठाया। हो सकता है, धीवर माँ की संतान होने से विचित्रवीर्य के विवाह को लेकर कुछ अड़चन रही हो। तो काशिराज द्वारा अपनी तीन पुत्रियों—अम्बा, अम्बिका, और अम्बालिका–के लिए आयोजित स्वयंवर में महा पराक्रमी भीष्म रथासीन होकर अकेले ही पहुँच गए और शाल्व-नरेश राजा शाल्व-सहित सभी उपस्थित राजाओं को परास्त कर, तीनों कन्याओं का अपहरण कर हस्तिनापुर ले आये और सत्यवती के सामने प्रस्तुत कर दिया।

       अम्बा ने जब बताया कि वह शाल्व से प्रेम करती है और उन्हीं का वरण करनेवाली थी तो भीष्म ने उसे शाल्व के पास भेज दिया और अम्बिका व अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य से करा दिया। अतिशय विषय-सेवन के कारण विचित्रवीर्य को युवावस्था में ही क्षयरोग हो गया और वे भी चल बसे।

कुरु राजवंश के अस्तित्व के इस संकट की स्थिति में राजमाता सत्यवती ने सौतेले पुत्र भीष्म को विचित्रवीर्य की दोनों विधवा रानियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्नकर राजवंश की रक्षा करने की आज्ञा दी। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का हवाला देते हुए माँ के आज्ञा-पालन में असमर्थता जताई।

      तब राजमाता सत्यवती ने विवाह-पूर्व उन पर आसक्त हुए ऋषि पराशर से उत्पन्न अपने पुत्र कृष्ण द्वैपायन व्यास का स्मरण किया और उनके आने पर उन्हें विचित्रवीर्य के ‘क्षेत्र’ में पुत्र उत्पन्न करने की आज्ञा दी। व्यास तैयार हो गए। समागम के समय अम्बिका द्वारा काले-कलूटे व्यास को देखकर आँखें बंद कर लिए जाने से उसके पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध हुए।

        अम्बालिका द्वारा लज्जावश शरीर में हल्दी का लेप कर लेने से उसके पुत्र पाण्डु रोग से पीड़ित पांडु हुए। इस स्खलन की जानकारी होने पर सत्यवती ने व्यास को दुबारा अम्बिका के पास भेजा किंतु अम्बिका ने इस बार अपनी दासी (सेविका) को यह काम सौंप दिया। दासी के साथ सानंद समागम से पूर्ण रूप से स्वस्थ, धर्मपरायण और नीति-निपुण विदुर का जन्म हुआ। 

ब्राह्मण ऋषि पराशर और धीवर कन्या सत्यवती के अवैध सम्बंध से उत्पन्न व्यास निश्चय  ही वर्णसंकर कहे जायेंगे। किंतु अपने महनीय कर्म से वे ब्रह्मर्षि कहलाए। फिर व्यास के साथ समागम से उत्पन्न अम्बिका के पुत्र धृतराष्ट्र और अम्बालिका के पुत्र पांडु भी वर्णसंकर ही हुए।

       दोनों शारीरिक रूप से राज्य करने के अयोग्य होने के बावजूद इसके अधिकारी माने गए जब कि दासी से उत्पन्न परम ज्ञानी विदुर का अधिकार मंत्रणा देने तक सीमित रहा।

         कुंती तीन पाण्डवों और कर्ण की माँ थीं, इनमें से कर्ण का जन्म कुंती के विवाह से पूर्व हुआ था। कुंती नि:संतान नागवंशीय राजा कुंतिभोज की दत्तक एवं यदुवंशी राजा शूरसेन (कृष्ण के पितामह) की औरस पुत्री थी। एक बार ऋषि दुर्वासा कुंतिभोज के यहाँ पधारे। कुंती ने बड़ी लगन से उनकी सेवा की। प्रसन्न होकर उन्होंने उसे एक मंत्र दिया जिससे वह किसी भी देवता का ध्यान करने पर उसे बुला सकती थी।   

        उत्सुकता में उसने सूर्य का ध्यान किया और वे प्रकट हो गए। यही नहीं, कुंती की नाभि का स्पर्श कर उसके गर्भ में अपना अंश स्थापित कर गए। उससे कर्ण का जन्म हुआ। लोकलाज वश कुंती ने शिशु कर्ण को एक मंजूषा में रखकर गंगा में प्रवाहित कर दिया। वह शिशु भीष्म के सारथी सूत-जातीय अधिरथ को मिला।

      अधिरथ और उसकी पत्नी राधा ने ही कर्ण का पालन-पोषण किया। शुरू से उसकी रुचि सारथी-कर्म के बजाय शस्त्र-संचालन में थी। कर्ण ने हस्तिनापर जाकर   गुरु द्रोणाचार्य से अस्त्र-शस्त्र विद्या सीखी। द्रोण से प्रशिक्षित राजकुमारों द्वारा अपनी-अपनी विद्या के प्रदर्शन के दौरान कर्ण के वंश को लेकर उसमें और अर्जुन में विवाद होने पर दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश के राजा के रूप में अभिषिक्त कर दिया।

बाद में कर्ण ने स्वयं को  ब्राह्मण बताकर परशुराम से भी शस्त्र-विद्या सीखी। किंतु भेद खुल जाने पर परशुराम ने क्रुद्ध होकर उसे शाप दे दिया कि ऐन मौक़े पर उसे ज़रूरी शस्त्र का ज्ञान भूल जाएगा। 

      स्वयंवर-पद्धति से कुंती का विवाह पांडु के साथ हुआ। फिर भीष्म की सलाह पर पांडु का दूसरा, राजनीतिक विवाह पश्चिमी पड़ोसी मद्र राज्य की राजकुमारी माद्री से भी हुआ। एक दिन वन में आखेट के समय पांडु ने हिरण और हिरणी के रूप में संभोगरत किंदम ऋषि और उनकी पत्नी पर, वस्तुस्थिति जाने बिना, तीर चला दिया।

       मृत्यु की ओर बढ़ते ऋषि किंदम ने उन्हें शाप दिया–जब भी वे अपनी किसी पत्नी के साथ समागम करने को उद्यत होंगे, उनकी मृत्यु हो जायेगी। अपने कर्म के प्रायश्चित्त के मंतव्य से पांडु राज्यकर्म धृतराष्ट्र को सौंपकर, दोनों पत्नियों के साथ वन में रहने लगे। किंदम के शाप के बावजूद उनके द्वारा संतान की इच्छा व्यक्त करने पर कुंती ने दुर्वासा से प्राप्त मंत्र की बात बताकर पांडु के आग्रह पर धर्मराज, वायु और इंद्र को आवाहित कर उनके सम्पर्क से क्रमश: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को प्राप्त किया।

       कुंती से सीखकर माद्री ने भी उसी मंत्र की विधि से अश्विनीकुमारों का आवाहन कर नकुल और सहदेव को प्राप्त किया। 

माद्री असाधारण सुंदरी थी। एक दिन उसे अंतरंग स्थिति में देखकर पांडु किंदम ऋषि का शाप भूल गये और उससे समागम के लिए व्यग्र हो उठे। उन्हें रोकने की माद्री की तमाम कोशिशें व्यर्थ गईं और वे अपने मनोरथ में सफल हो गए। तत्काल उनकी मृत्यु हो गई।

      स्वयं को पांडु के विचलन का कारण मानते हुए माद्री घोर संताप में पांडु के साथ सती हो गई। कुंती ने पांचों पांडवों के लालन-पालन का दायित्व संभाला और वे सदैव सहोदर भाइयों की तरह परस्पर स्नेह से बंधे रहे।

       स्पष्ट है कि उपरोक्त आख़्यान मिथक-संवलित है। होमर के यूनानी महाकाव्य इलियड और ओडिसी का मुख्य तत्व भी मिथकीय आख़्यान है। मिथक तथ्य से निरपेक्ष होते हुए भी हमारी सांस्कृतिक चेतना के अभिन्न अंग बनकर कालातीत रूप से जीवंत बने रहते हैं। मिथक स्थूल इतिहास न होकर चेतना की यात्रा के बहुआयामी दस्तावेज़ होते हैं जो हमारे मानस और व्यवहार को सूक्ष्म स्तर पर प्रभावित करते हैं, उनका निर्धारण और नियमन भी करते हैं।

फ़िलहाल हम जातिप्रथा के प्रत्याख़्यान में महाभारतकालीन परिदृश्य का एक तसव्वुर खोज रहे थे। इस संदर्भ में युधिष्ठिर ने वर्णसंकर का उल्लेख एक व्यापक परिघटना के रूप में किया है। एक विडंबना के तौर पर स्वयं महाभारत के अनेक महत्वपूर्ण पात्र वर्णसंकर की उपज हैं। 

        भारतीय समाज में सहजीवन से उपजी यह प्रक्रिया महाभारत-काल के बाद भी निरंतर चलती रही। माँ तथ्य होती है और पिता होता है विश्वास। इतने प्राचीन और निरंतर प्रवाहित भारतीय सहजीवन के मद्देनज़र आज कौन है जो तथ्यात्मकता के मानदंड से, पूर्ण विश्वास के साथ, कह सकता है कि वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी वर्णसंकर से मुक्त, जाति-विशेष के विशुद्ध रक्त का वाहक है।

       तो जातिगत श्रेष्ठता-बोध, जो ऊँच-नीच की भावना की गंगोत्री है, पूर्णत: निराधार है। हमारे रंग-रूप, हमारी मानसिक संरचना, हमारे बौद्धिक स्तर, हमारे स्वभाव और चरित्र में कोई प्रकृत जातीय पैटर्न नहीं मिलेगा। जातीय अस्मिता बोध भी उतना ही भ्रामक और आधारहीन है जितना जातीय श्रेष्ठता बोध क्योंकि वह इसी बोध की प्रतिक्रिया है, वह बोध भी क्रिया-प्रतिक्रिया की शृंखला से जाति-प्रथा को खाद-पानी देता है। 

अपने व्यापक अर्थ मे ‘हिंदू समाज’ आज जिस मुक़ाम पर पहुँचा है, जाति व्यवस्था की भावना और व्यवहार के पूर्ण अस्वीकार के बिना उसका भविष्य अंधकारमय है।

      विश्वास है कि वैज्ञानिक  प्रगति के साथ सूचना-क्रांति की युति जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, क्वांटम सिद्धांत और सापेक्षता सिद्धांत जैसी अनेक क्रांतिकारी अवधारणाओं की समझ का विस्तार होगा, हम जाति-प्रथा-प्रणीत अज्ञानांधकार के पूर्वाग्रहों और संकीर्णताओं से मुक्त होते जाएँगे।

      ऐसा न हुआ तो हिंदू समाज के और हमारे देश के भी भविष्य का कोई सकारात्मक पाठ उत्तरोत्तर असंभाव्य होता जाएगा।

Exit mobile version